भगवान शिव
महादेव, जिनके तांडव से सृष्टि जन्म लेती है और उन्हीं में लीन हो जाती है
भगवान शिव हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में हैं, जिन्हें महादेव कहा जाता है। त्रिमूर्ति में वे संहारकर्ता हैं जो पुराने का अंत करके नए सृजन का मार्ग बनाते हैं, और शैव भक्तों के लिए वे स्वयं परमेश्वर हैं। उनकी पूजा मुख्य रूप से शिवलिंग के रूप में होती है, और भक्त उन्हें भोलेनाथ, कैलाशवासी योगी और नटराज के रूप में जानते हैं।

शिव कौन हैं?
'शिव' शब्द का अर्थ है कल्याणकारी, मंगलमय। ऋग्वेद में रुद्र एक ऐसे देवता हैं जिनसे लोग डरते भी हैं और रोग-शोक से रक्षा के लिए उन्हीं को पुकारते भी हैं। यजुर्वेद का शतरुद्रिय (श्री रुद्रम्) रुद्र को अनेक नामों से नमस्कार करता है और उन्हें 'शिव' कहकर संबोधित करता है। श्वेताश्वतर उपनिषद रुद्र-शिव को ही परम ब्रह्म बताता है। आगे चलकर शिव पुराण और लिंग पुराण जैसे ग्रंथों ने वे कथाएँ सँजोईं जिनसे आज के भक्त शिव को जानते हैं।
लोक-मान्यता में शिव त्रिमूर्ति के तीसरे देव हैं: ब्रह्मा सृष्टि रचते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार करते हैं। यह संहार विनाश के लिए विनाश नहीं है, बल्कि जीर्ण-शीर्ण को हटाकर नई सृष्टि का रास्ता खोलना है, जैसे रात भोर की तैयारी करती है। शैव परंपराओं में शिव तीन में से एक नहीं, बल्कि वही एक परमेश्वर हैं जो सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह, ये पाँचों कार्य करते हैं।
शिव में विरोधी गुण एक साथ रहते हैं। वे कैलाश पर ध्यानमग्न योगी भी हैं और पार्वती व बच्चों के साथ गृहस्थ भी। वे उग्र भैरव और काल के स्वामी महाकाल भी हैं, और एक लोटा जल व एक बेलपत्र से प्रसन्न हो जाने वाले भोलेनाथ भी। अर्धनारीश्वर रूप में उनका आधा शरीर स्त्री का और आधा पुरुष का है, जो बताता है कि शिव और शक्ति अलग नहीं हो सकते।
उनके नाम उनके स्वरूप को खोलते हैं: महादेव (देवों के देव), शंकर और शंभु (कल्याण और सुख देने वाले), नीलकंठ (नीले कंठ वाले), पशुपति (सभी जीवों के स्वामी), गंगाधर (गंगा को धारण करने वाले), चंद्रशेखर (मस्तक पर चंद्रमा वाले), त्र्यंबक (तीन नेत्रों वाले), विश्वनाथ (जगत के नाथ) और नटराज (नृत्य के राजा)।
शिव का स्वरूप: हर प्रतीक का अर्थ
शिव की मूर्ति या चित्र का हर अंग कुछ कहता है, और भक्त इन प्रतीकों को उपदेश की तरह पढ़ते हैं। नीचे वे अर्थ दिए गए हैं जो परंपरा में सबसे अधिक बताए जाते हैं; अलग-अलग आचार्य अलग पहलुओं पर ज़ोर देते हैं।
- तीसरा नेत्र
- अंतर्दृष्टि और ज्ञान का नेत्र, जो माया को भस्म कर देता है। पुराणों के अनुसार इसी नेत्र की ज्वाला से कामदेव भस्म हुए थे।
- अर्धचंद्र
- जटाओं में सुशोभित चंद्रमा, जिससे वे चंद्रशेखर कहलाते हैं। यह घटते-बढ़ते काल का प्रतीक है, जिस पर शिव का अधिकार है पर जो उन्हें बाँधता नहीं।
- जटा में गंगा
- स्वर्ग से उतरती गंगा के प्रचंड वेग से धरती फट न जाए, इसलिए शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में थाम लिया और धीरे से धारा के रूप में छोड़ा। वे असहनीय शक्ति को भी संसार के लिए सहनीय बना देते हैं।
- जटाजूट
- संसार के दिखावे से विरक्त तपस्वी का चिह्न।
- नीला कंठ
- संसार की रक्षा के लिए उन्होंने हलाहल विष को कंठ में रोक लिया, इसलिए वे नीलकंठ हैं।
- गले में नाग (वासुकि)
- भय और मृत्यु पर विजय का प्रतीक; इसे वश में की हुई सुप्त आध्यात्मिक ऊर्जा भी माना जाता है।
- त्रिशूल
- शिव का अस्त्र। इसके तीन फलकों को प्रायः तीन गुणों का, या सृष्टि-स्थिति-संहार का प्रतीक बताया जाता है, जो एक ही हाथ में धारण हैं।
- डमरू
- इसकी ध्वनि को सृष्टि का पहला नाद माना जाता है। परंपरा के अनुसार पाणिनि व्याकरण के आधार चौदह माहेश्वर सूत्र इसी डमरू के नाद से निकले।
- भस्म और व्याघ्रचर्म
- भस्म शरीर की नश्वरता याद दिलाती है; बाघ की खाल कामना और पशु-प्रवृत्ति पर विजय दिखाती है।
- रुद्राक्ष
- 'रुद्र के अक्ष' कहे जाने वाले ये मनके जप और ध्यान में धारण किए जाते हैं।
- नंदी
- हर शिव मंदिर में गर्भगृह की ओर मुख करके बैठे नंदी अटल श्रद्धा और धैर्यपूर्ण भक्ति के आदर्श हैं। वे शिव के गणों के प्रमुख भी हैं।
- शिवलिंग
- शिव का निराकार प्रतीक, जिसमें उनकी सबसे अधिक पूजा होती है। गोलाकार स्तंभ निराकार ईश्वर का और उसका आधार (योनि-पीठ) उनकी अभिन्न शक्ति का प्रतीक है।
- नटराज
- अग्नि-वलय के बीच नृत्य करते शिव: एक हाथ में डमरू, एक में अग्नि, एक पैर अज्ञान रूपी असुर पर और दूसरा उठा हुआ, मुक्ति का संकेत। तमिलनाडु की चोल कांस्य प्रतिमाओं ने इस रूप को विश्वप्रसिद्ध बनाया।
शास्त्रों की प्रमुख कथाएँ
ज्योति-स्तंभ की कथा। शिव पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा और विष्णु में विवाद हुआ कि बड़ा कौन है। तभी उनके बीच एक अनंत अग्नि-स्तंभ प्रकट हुआ। ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर गए और विष्णु वराह बनकर नीचे, पर दोनों में से कोई उसका छोर नहीं पा सका। तब उस स्तंभ से शिव प्रकट हुए और दोनों ने उन्हें प्रणाम किया। यही लिंगोद्भव की कथा है, और बारह ज्योतिर्लिंग वे स्थान माने जाते हैं जहाँ शिव ज्योति रूप में प्रकट हुए।
नीलकंठ। जब देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए क्षीरसागर का मंथन किया, तो सबसे पहले हलाहल विष निकला, जो तीनों लोकों को जलाने लगा। श्रीमद्भागवत पुराण (आठवाँ स्कंध) बताता है कि करुणावश शिव ने वह विष पी लिया और पार्वती ने उनका कंठ थाम लिया, जिससे विष वहीं रुक गया और कंठ नीला पड़ गया।
गंगावतरण। वाल्मीकि रामायण के बालकांड में कथा है कि राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए घोर तप करके स्वर्ग की गंगा को धरती पर आने के लिए मनाया। गंगा का वेग केवल शिव ही सह सकते थे; उन्होंने गंगा को जटाओं में धारण किया और फिर धीरे-धीरे धाराओं में प्रवाहित किया।
सती और दक्ष यज्ञ। शिव की पहली पत्नी सती प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। दक्ष ने अपने महायज्ञ में शिव को न बुलाकर उनका अपमान किया, तो सती ने यज्ञ-अग्नि में देह त्याग दी। शोक और क्रोध में शिव ने वीरभद्र को भेजकर यज्ञ का विध्वंस कराया। बाद की पौराणिक और तांत्रिक परंपरा के अनुसार जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वे शक्तिपीठ बने।
पार्वती और कामदेव। सती ने हिमवान की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया और शिव को पति रूप में पाने का संकल्प किया। जब कामदेव ने ध्यानमग्न शिव पर काम-बाण चलाया, तो तीसरा नेत्र खुला और कामदेव भस्म हो गए। तब पार्वती ने अपनी कठोर तपस्या से शिव को प्राप्त किया। यह कथा शिव पुराण में है और कालिदास के महाकाव्य कुमारसंभव में भी गाई गई है।
परिवार और वाहन
शिव परिवार का चित्र हिंदू घरों में सबसे प्रिय चित्रों में से है। पार्वती, जिन्हें उमा और गौरी भी कहते हैं और जिनके उग्र रूप दुर्गा और काली हैं, शिव की अर्धांगिनी और उनकी शक्ति हैं। उत्तर भारत की परंपरा में उनके बड़े पुत्र कार्तिकेय (स्कंद) हैं, जो देवताओं के सेनापति हैं और तमिल प्रदेश में मुरुगन के नाम से पूजे जाते हैं। दूसरे पुत्र विघ्नहर्ता गणेश हैं। इस परिवार का निवास हिमालय में कैलाश पर्वत है।
नंदी बैल शिव के वाहन और द्वारपाल हैं। मंदिरों में वे शिवलिंग की ओर मुख किए बैठे रहते हैं, और बहुत से भक्त अपनी मनोकामना नंदी के कान में कहते हैं, इस विश्वास से कि नंदी उसे महादेव तक पहुँचा देंगे। शिव के साथ उनके गण भी रहते हैं, और पुराणों में भृंगी जैसे भक्तों की कथाएँ भी आती हैं।
शिव की पूजा-विधि
सोमवार शिव का दिन है और बहुत से भक्त सोमवार का व्रत रखते हैं। पूरा सावन (श्रावण) मास शिव को विशेष प्रिय है, और हर पक्ष की त्रयोदशी को संध्या के समय प्रदोष व्रत रखा जाता है।
शिव पूजा का केंद्र अभिषेक है, यानी शिवलिंग पर जल चढ़ाना। अक्सर जल के साथ दूध, दही, शहद, घी और शक्कर (पंचामृत) चढ़ाकर फिर शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है। श्री रुद्रम् के पाठ के साथ किया गया अभिषेक रुद्राभिषेक कहलाता है। शिव को बेलपत्र (प्रायः तीन पत्तियों वाला), सफ़ेद फूल, धतूरा, आक के फूल, चंदन, भस्म और रुद्राक्ष प्रिय हैं। शिव पुराण की एक कथा के कारण, जिसमें केतकी ने झूठी गवाही दी थी, कई परंपराएँ केतकी का फूल नहीं चढ़ातीं। हल्दी, कुमकुम या तुलसी चढ़ाने के नियम क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हैं, इसलिए हर परिवार अपनी परंपरा निभाता है।
सबसे सरल और सर्वसुलभ मंत्र पंचाक्षर 'ॐ नमः शिवाय' है, जिसके शब्द श्री रुद्रम् से लिए गए हैं। ऋग्वेद का महामृत्युंजय मंत्र आरोग्य, रक्षा और मृत्यु-भय से मुक्ति के लिए जपा जाता है। सफ़ेद और हल्का नीला रंग शिव से जुड़े माने जाते हैं, और भक्त माथे पर भस्म की तीन आड़ी रेखाओं वाला त्रिपुंड लगाते हैं।
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
tryambakaṃ yajāmahe sugandhiṃ puṣṭivardhanam | urvārukam iva bandhanān mṛtyor mukṣīya māmṛtāt ||
अर्थ: हम तीन नेत्रों वाले, सुगंधित और पोषण बढ़ाने वाले परमेश्वर की उपासना करते हैं। जैसे पका हुआ ककड़ी का फल अपनी बेल से सहज ही छूट जाता है, वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, अमृत से नहीं। (ऋग्वेद 7.59.12, महामृत्युंजय मंत्र)
नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
namaḥ śambhavāya ca mayobhavāya ca namaḥ śaṅkarāya ca mayaskarāya ca namaḥ śivāya ca śivatarāya ca ||
अर्थ: सुख के उद्गम और आनंद के उद्गम को नमस्कार; शांति करने वाले और मंगल करने वाले को नमस्कार; कल्याणस्वरूप और परम कल्याणस्वरूप को नमस्कार। (शुक्ल यजुर्वेद, वाजसनेयि संहिता 16.41, शतरुद्रिय से; 'नमः शिवाय' का मूल)
प्रमुख पर्व
महाशिवरात्रि फाल्गुन मास (पूर्णिमांत पंचांग) की कृष्ण चतुर्दशी को आती है, जो अमांत पंचांग में माघ कृष्ण चतुर्दशी है; अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह फ़रवरी-मार्च में पड़ती है। भक्त उपवास रखते हैं, रात के चारों प्रहर जागरण करते हैं और हर प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक करते हैं।
सावन के सोमवारों पर शिव मंदिरों में भारी भीड़ होती है, और उत्तर भारत में काँवड़ यात्रा में श्रद्धालु पैदल चलकर गंगाजल लाते हैं और शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। हर महीने मासिक शिवरात्रि और दो प्रदोष आते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को कई जगह त्रिपुरारी पूर्णिमा कहा जाता है, जो त्रिपुरासुर पर शिव की विजय की याद है; इसी रात काशी में देव दीपावली मनाई जाती है और घाट दीयों से जगमगा उठते हैं।
प्रसिद्ध मंदिर
बारह ज्योतिर्लिंग शिव के सबसे पवित्र धाम हैं: गुजरात में सोमनाथ और नागेश्वर, आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में मल्लिकार्जुन, मध्य प्रदेश में उज्जैन के महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर, उत्तराखंड के हिमालय में केदारनाथ, महाराष्ट्र में भीमाशंकर, त्र्यंबकेश्वर और घृष्णेश्वर, वाराणसी में काशी विश्वनाथ, झारखंड के देवघर में बैद्यनाथ और तमिलनाडु के रामेश्वरम में रामनाथस्वामी।
इनके अलावा काठमांडू का पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल का सबसे बड़ा शिव धाम है। चोल राजा राजराज प्रथम द्वारा बनवाया गया तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है, और चिदंबरम को नटराज के नृत्य का स्थान माना जाता है। तमिलनाडु के पंचभूत स्थलों में शिव की पूजा पाँच तत्वों के रूप में होती है, और कश्मीर की अमरनाथ गुफा में हर गर्मी में प्राकृतिक हिमलिंग के दर्शन के लिए यात्री पहुँचते हैं। स्वयं कैलाश पर्वत की परिक्रमा को भी शिव-धाम की यात्रा माना जाता है।
दर्शन और शैव परंपराएँ
शैव मत, यानी वे परंपराएँ जो शिव को परमेश्वर मानती हैं, हिंदू धर्म की प्रमुख धाराओं में से है। तमिल दक्षिण में तिरसठ नायनार संतों ने शिव के भजन गाए, जो तिरुमुरै में संकलित हैं। शैव सिद्धांत सिखाता है कि जीव (पशु) मल रूपी बंधन (पाश) में बँधा है और परमेश्वर (पति) की कृपा से मुक्त होता है। कश्मीर में अभिनवगुप्त जैसे आचार्यों ने अद्वैत शैव दर्शन विकसित किया, जिसमें समूचा जगत शिव की चेतना की स्वतंत्र लीला है और मुक्ति अपने शिव-स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा (पहचान) है। कर्नाटक में बारहवीं सदी के संत बसवण्णा से जुड़े लिंगायत या वीरशैव आंदोलन ने व्यक्तिगत भक्ति पर बल दिया, जिसमें हर भक्त शरीर पर इष्टलिंग धारण करता है।
शिव का सम्मान इन संप्रदायों से कहीं आगे है। अद्वैत वेदांत के महान आचार्य आदि शंकराचार्य के नाम से शिव के अनेक स्तोत्र प्रसिद्ध हैं, और स्मार्त घरों में पंचायतन पूजा के पाँच देवों में शिव भी हैं। वैष्णव परंपरा उन्हें विष्णु के श्रेष्ठ भक्त के रूप में पूजती है, और शाक्त परंपरा देवी के अभिन्न साथी के रूप में। हर परंपरा यह संबंध अपने ढंग से समझाती है, और सभी शिव को गहरी श्रद्धा से देखती हैं।
योग परंपरा में शिव आदियोगी हैं, पहले योगी, और दक्षिणामूर्ति हैं, वह मौन गुरु जो केवल अपनी उपस्थिति से ज्ञान देते हैं। उनका स्वरूप सिखाता है कि स्थिरता और गति, वैराग्य और गृहस्थी, उग्रता और कोमलता, सब एक ही दिव्य सत्य के अंग हैं।
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
शिव की पूजा लिंग रूप में क्यों होती है?
शिवलिंग शिव के निराकार, अनंत स्वरूप का प्रतीक है। शिव पुराण इसे उस अनंत ज्योति-स्तंभ से जोड़ता है जिसका छोर न ब्रह्मा पा सके न विष्णु। लिंग का आधार (योनि-पीठ) शक्ति का प्रतीक है, इसलिए शिवलिंग में शिव और शक्ति दोनों साथ हैं।
शिव जी का दिन कौन सा है?
सोमवार। इसके अलावा त्रयोदशी का प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, पूरा सावन मास और सबसे बढ़कर महाशिवरात्रि शिव-उपासना के विशेष अवसर हैं।
'ॐ नमः शिवाय' का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है 'कल्याणस्वरूप शिव को नमस्कार'। 'नमः शिवाय' शब्द यजुर्वेद के श्री रुद्रम् से आए हैं, और न-मः-शि-वा-य, ये पाँच अक्षर पंचाक्षर मंत्र कहलाते हैं जिसे हर भक्त जप सकता है।
शिव जी का कंठ नीला क्यों है?
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार समुद्र मंथन में सबसे पहले हलाहल विष निकला। सब प्राणियों की रक्षा के लिए शिव ने उसे पी लिया और वह उनके कंठ में ही रुक गया, जिससे कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए।
शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए?
सबसे महत्वपूर्ण है जल, अक्सर दूध के साथ। इसके बाद बेलपत्र, सफ़ेद फूल, धतूरा, चंदन और भस्म चढ़ाई जाती है। कई परंपराएँ केतकी का फूल नहीं चढ़ातीं। बाकी चीज़ों के नियम परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग होते हैं।
शिव जी की पत्नी और पुत्र कौन हैं?
उनकी पत्नी पार्वती हैं, जो पूर्व जन्म में सती थीं। उनके पुत्र गणेश और कार्तिकेय (स्कंद या मुरुगन) हैं। उनका वाहन नंदी बैल है और निवास कैलाश पर्वत।
स्रोत
- https://www.britannica.com/topic/Shiva
- https://www.britannica.com/topic/Hinduism/Shaivism
- https://www.worldhistory.org/Nandi/
- https://www.worldhistory.org/article/831/shiva-nataraja---lord-of-the-dance/
- https://archive.asia.si.edu/pujaonline/puja/shiva_symbols.html
- https://sa.wikisource.org/wiki/ऋग्वेदः_सूक्तं_७.५९
- https://sa.wikisource.org/wiki/शुक्लयजुर्वेदः/अध्यायः_१६
- https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Bangalore_Shiva.jpg
अंतिम शोध: 2026-10-29
आगे पढ़ें
- देवी: दुर्गा, पार्वती और शक्ति
- भगवान गणेश
- भगवान विष्णु
- काशी विश्वनाथ मन्दिर
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