मेरी श्रद्धा

भगवान गणेश

विघ्नहर्ता गजानन, जिनकी पूजा हर शुभ कार्य में सबसे पहले होती है

भगवान गणेश, जिन्हें गणपति और विनायक भी कहते हैं, शिव और पार्वती के गजमुख पुत्र हैं और आरंभ, बुद्धि तथा विघ्न-निवारण के देवता हैं। कोई भी पूजा, यात्रा, विवाह या नया काम उन्हीं के स्मरण से शुरू होता है। मोदक के प्रेमी और मूषक पर सवार बप्पा का सबसे बड़ा पर्व गणेश चतुर्थी पूरे भारत और दुनिया भर में मनाया जाता है।

भगवान गणेश
Anonymous Basohli painter, c. 1730; National Museum, New Delhi. Public domain, via Wikimedia Commons Wikimedia Commons

गणेश कौन हैं?

गणेश और गणपति, दोनों का अर्थ है 'गणों के स्वामी', यानी शिव के गणों के अधिपति। विघ्नेश्वर के रूप में वे विघ्नों के स्वामी हैं: सच्चे मन वालों के मार्ग से बाधाएँ हटाते हैं, और परंपरा कहती है कि अहंकारी के मार्ग में बाधा भी डाल सकते हैं। इसीलिए वे 'प्रथम पूज्य' हैं। कोई भी पूजा, विवाह, गृहप्रवेश, परीक्षा या व्यापार 'श्री गणेशाय नमः' से शुरू होता है, और बही-खाते तथा पत्र भी अक्सर उन्हीं के नाम से खुलते हैं। किसी काम की शुरुआत को ही 'श्रीगणेश करना' कहा जाता है।

वे विद्या, लेखन और कलाओं के भी संरक्षक हैं और बुद्धिप्रिय कहलाते हैं। उनके नाम उनका परिचय देते हैं: विनायक (सर्वश्रेष्ठ नायक), गजानन (हाथी के मुख वाले), एकदंत (एक दाँत वाले), लंबोदर (बड़े पेट वाले), वक्रतुंड (मुड़ी सूँड वाले), सिद्धिविनायक (सफलता देने वाले), मंगलमूर्ति और तमिलनाडु में पिल्लैयार।

ऋग्वेद का मंत्र 'गणानां त्वा गणपतिं हवामहे' (2.23.1) मूल रूप से ब्रह्मणस्पति, यानी प्रार्थना के स्वामी, को संबोधित था; बाद की परंपरा में इसका पाठ गणेश के आवाहन के लिए होने लगा। गजमुख गणेश का विकसित रूप लगभग गुप्त काल से मूर्तियों और ग्रंथों में दिखता है, और पुराणों, गणपति अथर्वशीर्ष, गणेश पुराण और मुद्गल पुराण ने उन्हें केंद्र में रखा।

गणेश का स्वरूप: हर प्रतीक का अर्थ

गणेश जी का रूप जितना पहचाना जाता है, उतना शायद ही किसी और का, और उनके हर अंग से एक सीख मिलती है, ख़ासकर बच्चों को।

हाथी का मस्तक
बुद्धि, विवेक और हर रास्ता साफ़ करने का बल, जैसे हाथी जंगल में अपना मार्ग बना लेता है।
बड़े कान, छोटी आँखें
ज़्यादा सुनो और ध्यान एकाग्र रखो।
मुड़ी हुई सूँड (वक्रतुंड)
अनुकूलन की क्षमता: सूँड पेड़ भी उखाड़ सकती है और सुई भी उठा सकती है।
टूटा दाँत (एकदंत)
ऊँचे उद्देश्य के लिए त्याग। एक प्रचलित कथा के अनुसार उन्होंने महाभारत लिखने के लिए इसे तोड़ा था; अक्सर वे इसे एक हाथ में पकड़े रहते हैं।
बड़ा पेट (लंबोदर)
वे समूचे ब्रह्मांड को अपने भीतर रखते हैं और जीवन के अच्छे-बुरे को शांति से पचा लेते हैं।
मोदक
साधना का मीठा फल; उनका सबसे प्रिय भोग, जो अक्सर हाथ में या सूँड के पास होता है।
अंकुश और पाश
अंकुश भक्त को आगे बढ़ाता है और पाश उसे पास खींचता है, साथ ही हानिकारक इच्छाओं को बाँधता है।
उठा हुआ हाथ (अभय मुद्रा)
'डरो मत': उनका आशीर्वाद और संरक्षण।
मूषक
छोटा-सा जीव जो हर चीज़ कुतर सकता है, ठीक वैसे ही जैसे गणेश हर बाधा पार कर लेते हैं। इसे वश में की गई चंचल इच्छा का प्रतीक भी माना जाता है।
बाईं या दाईं सूँड
अधिकतर मूर्तियों में सूँड बाईं ओर मुड़ी होती है; दाईं ओर मुड़ी सूँड (वलमपुरी) वाली मूर्ति को परंपरा में विशेष शक्तिशाली माना जाता है और उसकी पूजा अधिक नियम से होती है।

प्रमुख कथाएँ

गजमुख की कथा। शिव पुराण के अनुसार पार्वती ने स्नान के समय अपने उबटन से एक बालक बनाया और उसे द्वार पर पहरे के लिए बिठा दिया। शिव आए तो बालक ने, जो उन्हें पहचानता नहीं था, उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। युद्ध हुआ और अंत में शिव ने बालक का सिर काट दिया। पार्वती के शोक और क्रोध से ब्रह्मांड काँप उठा, तब शिव ने गणों को भेजा कि जो पहला प्राणी मिले उसका सिर ले आएँ। वह एक हाथी था। शिव ने बालक को जीवित किया, उसे गणों का अधिपति बनाया और सबसे पहले पूजे जाने का वरदान दिया। ब्रह्मवैवर्त जैसे अन्य पुराण यह कथा अलग ढंग से कहते हैं।

महाभारत के लेखक। प्रसिद्ध कथा है कि महर्षि वेदव्यास ने गणेश से महाभारत लिखने का अनुरोध किया। गणेश ने शर्त रखी कि व्यास बोलते समय रुकेंगे नहीं; व्यास ने बदले में कहा कि गणेश हर श्लोक समझकर ही लिखेंगे। लिखते-लिखते लेखनी टूट गई तो गणेश ने अपना दाँत तोड़कर लिखना जारी रखा। यह प्रसंग महाभारत के आदिपर्व के कुछ पाठों में मिलता है, पर आलोचनात्मक संस्करण में नहीं।

संसार की परिक्रमा। एक प्रिय कथा में शिव-पार्वती कहते हैं कि जो पुत्र पहले संसार की परिक्रमा करके लौटेगा, उसे पुरस्कार मिलेगा। कार्तिकेय अपने मोर पर निकल पड़ते हैं, जबकि गणेश माता-पिता की ही परिक्रमा कर लेते हैं और कहते हैं कि आप ही मेरा संसार हैं। यह कथा माता-पिता के प्रति श्रद्धा और गति से ऊपर बुद्धि का महत्व सिखाती है।

चंद्रमा को शाप। लोक-परंपरा कहती है कि मूषक से गिरते गणेश को देखकर चंद्रमा हँस पड़े और गणेश ने उन्हें शाप दे दिया। इसीलिए बहुत से परिवार गणेश चतुर्थी की रात चंद्रमा नहीं देखते।

परिवार और वाहन

गणेश शिव और पार्वती के पुत्र तथा कार्तिकेय के भाई हैं। उत्तर और पश्चिम भारत में उन्हें अक्सर दो पत्नियों, ऋद्धि और सिद्धि (समृद्धि और आध्यात्मिक सिद्धि), के साथ दिखाया जाता है, और उनके पुत्र शुभ और लाभ हैं, जिनके नाम दीपावली पर दरवाज़ों और बही-खातों पर लिखे जाते हैं। दक्षिण भारत के अधिकांश भाग में उन्हें ब्रह्मचारी के रूप में पूजा जाता है। उनका वाहन मूषक है।

गणेश की पूजा-विधि

हर चतुर्थी तिथि गणेश की है। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी विनायक चतुर्थी कहलाती है और कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी, जब भक्त चंद्रमा देखकर व्रत खोलते हैं। मंगलवार को पड़ने वाली संकष्टी अंगारकी कहलाती है और महाराष्ट्र में विशेष शुभ मानी जाती है। उत्तर भारत में बुधवार प्रायः गणेश जी का दिन माना जाता है।

उन्हें मोदक (उकडीचे या तले हुए), मोतीचूर के लड्डू, दूर्वा (अक्सर 21 दूब), गुड़हल जैसे लाल फूल, शमी पत्र और गुड़-नारियल प्रिय हैं। परंपरा के अनुसार गणेश जी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती। लाल और पीला उनके रंग हैं, और उनके सम्मान में स्वस्तिक या 'श्री' बनाया जाता है। प्रचलित मंत्रों में 'ॐ गं गणपतये नमः', वक्रतुंड श्लोक, गणपति अथर्वशीर्ष का गणेश गायत्री मंत्र, और मराठी आरती 'सुखकर्ता दुःखहर्ता' तथा हिंदी आरती 'जय गणेश देवा' प्रमुख हैं।

  1. वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

    vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭisamaprabha | nirvighnaṃ kuru me deva sarvakāryeṣu sarvadā ||

    अर्थ: हे मुड़ी सूँड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव, मेरे सब कार्यों को सदा निर्विघ्न कीजिए। (किसी भी कार्य के आरंभ में पढ़ी जाने वाली पारंपरिक प्रार्थना)

  2. एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥

    ekadantāya vidmahe vakratuṇḍāya dhīmahi | tanno dantiḥ pracodayāt ||

    अर्थ: हम एकदंत को जानते हैं, वक्रतुंड का ध्यान करते हैं; वे दंती (गणेश) हमें प्रेरणा दें। (गणपति अथर्वशीर्ष में आया गणेश गायत्री मंत्र)

  3. गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥

    gaṇānāṃ tvā gaṇapatiṃ havāmahe kaviṃ kavīnām upamaśravastamam | jyeṣṭharājaṃ brahmaṇāṃ brahmaṇaspata ā naḥ śṛṇvann ūtibhiḥ sīda sādanam ||

    अर्थ: हे गणों के पति, कवियों में श्रेष्ठ कवि, सर्वोच्च कीर्ति वाले, मंत्रों के ज्येष्ठ राजा, ब्रह्मणस्पति, हम आपका आवाहन करते हैं; हमारी पुकार सुनकर अपनी रक्षाओं के साथ यहाँ आसन ग्रहण करें। (ऋग्वेद 2.23.1, मूलतः ब्रह्मणस्पति के लिए, अब परंपरा से गणपति-आवाहन में पढ़ा जाता है)

प्रमुख पर्व

गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (अगस्त-सितंबर) को आती है। परिवार मिट्टी की मूर्ति घर लाते हैं, डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन पूजा करते हैं और फिर 'गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या' (अगले बरस जल्दी आना) के जयघोष के साथ विसर्जन करते हैं। दस दिन का सार्वजनिक उत्सव अनंत चतुर्दशी को पूरा होता है।

महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी लंबे समय तक घरेलू पर्व थी। 1892-93 में पुणे में सार्वजनिक गणेशोत्सव आयोजित हुए, और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अपने अख़बार 'केसरी' में इसका प्रबल समर्थन किया ताकि लोग एकजुट हों। इसी से यह पर्व आज का विशाल सामुदायिक उत्सव बना। माघ मास की गणेश जयंती (माघी गणेश चतुर्थी) भी, विशेषकर महाराष्ट्र और गोवा में, मनाई जाती है। आज बहुत से परिवार नदियों और समुद्र की रक्षा के लिए पर्यावरण-अनुकूल मिट्टी की मूर्तियाँ चुनते हैं।

प्रसिद्ध मंदिर

अष्टविनायक महाराष्ट्र के आठ गणेश मंदिर हैं, जिनमें से अधिकांश पुणे के आसपास हैं: मोरगाँव के मयूरेश्वर, सिद्धटेक के सिद्धिविनायक, पाली के बल्लालेश्वर, महड के वरदविनायक, थेऊर के चिंतामणि, लेण्याद्रि के गिरिजात्मज, ओझर के विघ्नेश्वर और रांजणगाँव के महागणपति। मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर और पुणे के श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई गणपति सबसे अधिक दर्शन किए जाने वाले मंदिरों में हैं। दक्षिण में तिरुचिरापल्ली के रॉकफ़ोर्ट पर उच्चि पिल्लैयार, पिल्लैयारपट्टी के शैलकृत करपग विनायगर और आंध्र प्रदेश का काणिपाकम विनायक मंदिर प्रसिद्ध हैं। राजस्थान में रणथंभौर किले के त्रिनेत्र गणेश मंदिर में भक्त डाक से विवाह का निमंत्रण भेजते हैं, और जयपुर का मोती डूंगरी मंदिर भी बहुत प्रिय है।

दर्शन और संप्रदाय

गाणपत्य संप्रदाय गणेश को परब्रह्म मानकर पूजता है। इसके ग्रंथों में गणपति अथर्वशीर्ष है, जो कहता है 'त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि', यानी आप ही प्रत्यक्ष परम तत्व हैं, और गणेश पुराण तथा मुद्गल पुराण भी हैं। गणेश पुराण में भगवद्गीता की शैली पर गणेश गीता भी है। स्मार्त परंपरा की पंचायतन पूजा के पाँच देवों में गणेश एक हैं।

किसी एक संप्रदाय से परे, गणेश सबके हैं: शैव उन्हें शिव-पुत्र के रूप में जानते हैं, वैष्णव और शाक्त भी पहले उन्हीं का आवाहन करते हैं, और जैन तथा बौद्ध परंपराओं से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक उनका सम्मान है। योग के प्रतीकवाद में उन्हें मूलाधार चक्र से जोड़ा जाता है, क्योंकि हर आरंभ उन्हीं से होता है।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

गणेश जी की पूजा सबसे पहले क्यों होती है?

गणेश विघ्नेश्वर हैं, यानी विघ्नों के स्वामी। शिव पुराण के अनुसार गजमुख मिलने के बाद शिव ने उन्हें गणों का अधिपति बनाया और प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया। इसलिए हर पूजा और शुभ आरंभ में पहले उन्हीं का स्मरण होता है।

गणेश जी एकदंत क्यों हैं?

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार व्यास जी से महाभारत लिखते समय लेखनी टूट गई तो उन्होंने अपना दाँत तोड़कर लिखना जारी रखा। अन्य कथाएँ अलग कारण बताती हैं, पर सब इसे ऊँचे उद्देश्य के लिए त्याग मानती हैं।

गणेश चतुर्थी कब है?

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को, जो प्रायः अगस्त के अंत या सितंबर में पड़ती है। सार्वजनिक उत्सव दस दिन तक चलता है और अनंत चतुर्दशी को विसर्जन होता है।

गणेश जी को क्या चढ़ाएँ?

मोदक और लड्डू, दूर्वा (अक्सर 21 दूब), लाल फूल, शमी पत्र और गुड़-नारियल। परंपरा के अनुसार उन्हें तुलसी नहीं चढ़ाई जाती।

संकष्टी चतुर्थी क्या है?

हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी, जब भक्त गणेश जी के लिए व्रत रखते हैं और चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलते हैं। मंगलवार को पड़ने पर इसे अंगारकी संकष्टी कहते हैं।

गणेश जी की पत्नियाँ कौन हैं?

उत्तर और पश्चिम भारत की परंपरा में ऋद्धि और सिद्धि, और उनके पुत्र शुभ और लाभ। दक्षिण भारत के अधिकांश भाग में उन्हें ब्रह्मचारी माना जाता है।

स्रोत

अंतिम शोध: 2026-10-29

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