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सोमनाथ मंदिर

जहाँ चंद्रदेव को फिर से मिली अपनी आभा, सागर तट पर विराजे प्रथम ज्योतिर्लिंग।

गुजरात के सौराष्ट्र तट पर वेरावल के पास प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है। सोमनाथ का अर्थ है 'चंद्रमा के स्वामी'। 1026 से लेकर अनेक बार आक्रमण झेलने और फिर-फिर बनने के बाद वर्तमान मंदिर 'कैलाश महामेरु प्रासाद' शैली में बना और 11 मई 1951 को इसकी प्राण-प्रतिष्ठा हुई।

सोमनाथ मंदिर
चित्र: Wikimedia Commons

इतिहास

प्रभास क्षेत्र की पवित्रता किसी भी मंदिर से कहीं पुरानी है। महाभारत और भागवत पुराण में सौराष्ट्र तट के प्रभास तीर्थ का वर्णन मिलता है, और महाकवि कालिदास ने रघुवंश में सोमनाथ-प्रभास को महान तीर्थों में गिना है। पुरातत्वविदों को यहाँ हड़प्पा काल की बस्ती के प्रमाण मिले हैं, हालाँकि किसी प्राचीन मंदिर के अवशेष नहीं मिले। सोमेश्वर नाम 9वीं सदी के अभिलेखों में मिलने लगता है – गुर्जर-प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय ने सौराष्ट्र के तीर्थों में सोमेश्वर की यात्रा का उल्लेख किया है।

पहला मंदिर कब बना, यह निश्चित नहीं है। माना जाता है कि चौलुक्य (सोलंकी) राजा मूलराज ने 997 ई. से पहले यहाँ मंदिर बनवाया, संभवतः किसी पुराने छोटे मंदिर का जीर्णोद्धार करके। 1950–51 में बी. के. थापर के नेतृत्व में हुई खुदाई में 9वीं–10वीं सदी के एक मंदिर की नींव और बारीक नक्काशी वाले अवशेष मिले। सोमनाथ ट्रस्ट की परंपरा के अनुसार यहाँ के आरंभिक मंदिर चार रूपों में बने – सोमदेव ने सोने का, रवि ने चाँदी का, श्रीकृष्ण ने लकड़ी का और राजा भीमदेव ने पत्थर का मंदिर बनवाया।

जनवरी 1026 में महमूद गज़नवी ने सोमनाथ पर हमला किया, ज्योतिर्लिंग को खंडित किया और भारी धन लूट ले गया। इसका उल्लेख फ़ारसी विद्वान अल-बिरूनी और अन्य इतिहासकारों ने किया है। 1038 के एक अभिलेख से पता चलता है कि चौलुक्य राजा भीम प्रथम के समय कुछ ही वर्षों में पूजा फिर शुरू हो गई थी। 1169 के एक अभिलेख के अनुसार राजा कुमारपाल ने जर्जर हो चुके मंदिर के स्थान पर पत्थर का भव्य मंदिर बनवाया।

1299 में अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने उलुग़ ख़ान और नुसरत ख़ान के नेतृत्व में मंदिर को लूटा। स्थानीय परंपरा वीर हमीरजी गोहिल को याद करती है, जिन्होंने मंदिर की रक्षा में प्राण दिए। लगभग 1308 में चूड़ासमा राजा महिपाल प्रथम ने मंदिर फिर बनवाया। 1395 और 1451 में यह फिर क्षतिग्रस्त हुआ, और मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने 1665 और फिर 1706 में इसे तोड़ने का आदेश दिया, जिसके बाद खंडहर का एक हिस्सा मस्जिद में बदल दिया गया।

लगभग 1783 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने खंडहर के पास एक अलग, छोटा मंदिर बनवाया ताकि ज्योतिर्लिंग की पूजा चलती रहे। इसे आज भी पुराना सोमनाथ या अहिल्याबाई मंदिर कहा जाता है और इसकी देखरेख सोमनाथ ट्रस्ट करता है।

स्वतंत्रता के बाद नवंबर 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल ने खंडहरों का दौरा कर मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। महात्मा गांधी की सलाह पर निर्माण का खर्च जनता के दान से उठाया गया और इसकी देखरेख के लिए श्री सोमनाथ ट्रस्ट बना, जिसमें के. एम. मुंशी की अहम भूमिका रही। 1950 में खंडहर हटाए गए और गुजरात के पारंपरिक सोमपुरा शिल्पियों ने नया मंदिर गढ़ा। 11 मई 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा कर मंदिर राष्ट्र को समर्पित किया। परिसर का काम दशकों तक चलता रहा – 1 दिसंबर 1995 को राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा की उपस्थिति में नृत्य मंडप पर कलश-प्रतिष्ठा हुई।

मंदिर का प्रबंधन श्री सोमनाथ ट्रस्ट करता है, जिसके वर्तमान अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। 2026 में 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' के रूप में 1026 के पहले दर्ज आक्रमण के एक हज़ार वर्ष और 1951 में मंदिर के पुनः खुलने के 75 वर्ष याद किए गए।

पौराणिक कथा

शिव पुराण और स्कंद पुराण के प्रभास खंड के अनुसार चंद्रदेव ने दक्ष प्रजापति की सत्ताईस कन्याओं से विवाह किया, पर उनका प्रेम केवल रोहिणी पर था। इस पक्षपात से क्रोधित होकर दक्ष ने उन्हें शाप दिया कि उनका तेज दिन-प्रतिदिन घटता जाएगा। चंद्रमा के क्षीण होने से उस पर निर्भर औषधियाँ और प्राणी कष्ट पाने लगे, और देवता उपाय खोजने लगे।

ब्रह्मा जी की सलाह पर चंद्रदेव प्रभास क्षेत्र आए, पवित्र जल में स्नान किया और कठोर तप से शिव की आराधना की। प्रसन्न होकर महादेव ने शाप का प्रभाव कम कर दिया – चंद्रमा एक पक्ष में घटेंगे और दूसरे में बढ़ेंगे। श्रद्धालु मानते हैं कि इसी कारण चंद्रमा की कलाएँ घटती-बढ़ती हैं। देवताओं के आग्रह पर शिव यहाँ 'सोमनाथ' यानी चंद्रमा के स्वामी के रूप में विराजे, और चंद्रमा को यहाँ फिर से प्रभा मिलने के कारण यह स्थान 'प्रभास' कहलाया।

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र, जिसका पाठ असंख्य भक्त रोज़ करते हैं, 'सौराष्ट्रे सोमनाथं च' से आरंभ होता है – यानी बारह ज्योतिर्लिंगों में सोमनाथ प्रथम हैं, जहाँ शिव अनंत ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। भक्तों का विश्वास है कि कुंडली में चंद्र दोष से पीड़ित लोगों को यहाँ पूजा से शांति मिलती है।

प्रभास क्षेत्र भगवान श्रीकृष्ण की अंतिम लीला से भी जुड़ा है। परंपरा के अनुसार पास के भालका तीर्थ में विश्राम करते समय जरा नामक शिकारी ने उनके चरण को हिरण समझकर बाण चला दिया। इसके बाद श्रीकृष्ण त्रिवेणी संगम के पास देहोत्सर्ग (गोलोकधाम) पहुँचे, जहाँ उन्होंने देह त्यागी।

स्थापत्य कला

वर्तमान मंदिर पश्चिम भारत की मारु-गुर्जर (चौलुक्य या सोलंकी) परंपरा में बना है, जिसे सोमनाथ ट्रस्ट 'कैलाश महामेरु प्रासाद' शैली कहता है। इसकी रूपरेखा प्रभाशंकरभाई ओघड़भाई सोमपुरा ने बनाई और पुराने मंदिर के बचे हुए अंशों को भी नए मंदिर में जगह दी। पूर्व-पश्चिम धुरी पर मंदिर के तीन मुख्य भाग हैं – गर्भगृह, सभा मंडप और नृत्य मंडप।

सोमनाथ ट्रस्ट के अनुसार गर्भगृह के ऊपर शिखर 155 फ़ुट ऊँचा है। इसके शीर्ष पर लगभग 10 टन का कलश और 27 फ़ुट ऊँचा ध्वजदंड है; भक्तों की ओर से दिन में कई बार ध्वजा बदली जाती है। बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं, नर्तकियों और अलंकरणों की नक्काशी की पट्टियाँ हैं, और पत्थर के रंग के अंतर से पुराने और नए पैनल आज भी अलग पहचाने जा सकते हैं।

समुद्र की ओर बाण स्तंभ खड़ा है। ट्रस्ट के अनुसार यह 'अबाधित समुद्र मार्ग' का संकेत देता है – यानी इस तट से दक्षिणी ध्रुव तक बीच में कोई भूभाग नहीं। खुदाई से पता चला है कि इसी स्थान पर 10वीं सदी का मंदिर भी भरपूर नक्काशी वाला था, जिसमें गर्भगृह, बंद मंडप और प्रवेश-द्वार था, और उसकी दीवारों पर लकुलीश की प्रतिमा थी, जो इसके शिव मंदिर होने की पुष्टि करती है।

दैनिक पूजा-अर्चना

  • ज्योतिर्लिंग दर्शन

    सुबह 6:00 – रात 10:00

    सोमनाथ ट्रस्ट के अनुसार सोमनाथ महादेव के दर्शन पूरे दिन खुले रहते हैं।

  • प्रातः आरती

    सुबह 7:00

    सोमनाथ महादेव की दिन की तीन आरतियों में पहली।

  • मध्याह्न आरती

    दोपहर 12:00

    दोपहर की आरती, जिसके बाद भी दर्शन चलते रहते हैं।

  • संध्या आरती

    शाम 7:00

    अरब सागर पर ढलते सूरज के साथ होने वाली यह आरती श्रद्धालुओं में सबसे लोकप्रिय है।

  • 'जय सोमनाथ' लाइट एंड साउंड शो

    रात 8:00 – 9:00

    मंदिर परिसर में मंदिर के इतिहास पर ध्वनि-प्रकाश कार्यक्रम। ट्रस्ट के अनुसार वर्षा ऋतु में यह शो नहीं होता।

  • अभिषेक, ध्वजा पूजा और श्राद्ध

    अभिषेक, रुद्राभिषेक और मंदिर की ध्वजा बदलने की पूजा ट्रस्ट के माध्यम से बुक की जा सकती है। प्रभास क्षेत्र श्राद्ध और नारायण बलि जैसे पितृ कर्मों के लिए भी प्रसिद्ध है, विशेषकर चैत्र, भाद्रपद और कार्तिक में।

समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।

पर्व-उत्सव

फाल्गुन (फ़रवरी–मार्च)

महाशिवरात्रि

शिव की महान रात्रि, जब मंदिर देर रात तक खुला रहता है, विशेष पूजा होती है और सबसे अधिक भीड़ उमड़ती है।

श्रावण (जुलाई–अगस्त)

श्रावण मास

शिव का प्रिय महीना; विशेषकर सोमवार को अभिषेक और विशेष श्रृंगार के लिए बड़ी संख्या में भक्त आते हैं।

कार्तिक (अक्टूबर–नवंबर)

कार्तिक पूर्णिमा

प्रभास क्षेत्र का एक प्रमुख पर्व, जिस पर परंपरागत रूप से मंदिर के पास बड़ा मेला लगता है।

11 मई

सोमनाथ स्थापना दिवस

1951 में वर्तमान मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की वर्षगाँठ, जिसे सोमनाथ ट्रस्ट मनाता है।

चैत्र (मार्च–अप्रैल)

गोलोकधाम उत्सव

त्रिवेणी संगम के पास गोलोकधाम में मनाया जाता है, जो श्रीकृष्ण के देहोत्सर्ग से जुड़ा स्थान है।

कैसे पहुँचें

हवाई मार्ग
निकटतम हवाई अड्डा केशोद है, जो लगभग 57 किमी दूर है। दीव हवाई अड्डा लगभग 85 किमी दूर है। राजकोट और अहमदाबाद के बड़े हवाई अड्डों से सड़क और रेल द्वारा आगे आया जा सकता है।
रेल मार्ग
सोमनाथ रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग 2.5 किमी और वेरावल जंक्शन लगभग 7 किमी दूर है। अहमदाबाद, राजकोट और कई शहरों से यहाँ ट्रेनें आती हैं।
सड़क मार्ग
सोमनाथ जूनागढ़ से लगभग 82 किमी दक्षिण और अहमदाबाद से लगभग 400 किमी दक्षिण-पश्चिम में है। सरकारी और निजी बसें तथा टैक्सियाँ आसानी से मिल जाती हैं।
दर्शन का सबसे अच्छा समय
अक्टूबर से मार्च तक तट पर मौसम सबसे सुहावना रहता है। महाशिवरात्रि, श्रावण मास और कार्तिक पूर्णिमा पर दर्शन का विशेष महत्व है, पर इन दिनों भारी भीड़ रहती है। वर्षा ऋतु में लाइट एंड साउंड शो नहीं होता, इसलिए उसे देखना हो तो उसी हिसाब से योजना बनाएँ।

तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव

  • मंदिर के भीतर मोबाइल, कैमरा, स्मार्टवॉच और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान ले जाना मना है; क्लोक रूम में मुफ़्त लॉकर मिलते हैं। अंदर फ़ोटोग्राफ़ी वर्जित है।
  • शालीन कपड़े पहनें – ट्रस्ट मिनी स्कर्ट जैसे अशोभनीय परिधान से बचने को कहता है। मंदिर के आसपास धूम्रपान पूरी तरह वर्जित है।
  • कमरे, पूजा और दान की बुकिंग केवल आधिकारिक वेबसाइट somnath.org या ट्रस्ट के काउंटर से करें; ट्रस्ट ने व्हाट्सऐप और निजी UPI आईडी के ज़रिये हो रही ठगी से सावधान किया है।
  • शाम 7 बजे की आरती और रात 8 बजे का लाइट एंड साउंड शो ज़रूर देखें (वर्षा ऋतु में शो नहीं होता)।
  • सोमनाथ के साथ भालका तीर्थ, त्रिवेणी संगम और गोलोकधाम, पुराना सोमनाथ (अहिल्याबाई) मंदिर और बाण स्तंभ भी देखें; कई यात्री यहाँ से द्वारका भी जाते हैं।
  • श्राद्ध या नारायण बलि करवानी हो तो पहले से व्यवस्था कर लें, विशेषकर चैत्र, भाद्रपद और कार्तिक में।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

सोमनाथ मंदिर की कथा क्या है?

शिव पुराण के अनुसार दक्ष प्रजापति के शाप से चंद्रदेव का तेज क्षीण होने लगा। उन्होंने प्रभास क्षेत्र में शिव की आराधना कर शाप से मुक्ति पाई। तभी से महादेव यहाँ 'सोमनाथ' यानी चंद्रमा के स्वामी के रूप में विराजते हैं।

सोमनाथ मंदिर के दर्शन और आरती का समय क्या है?

सोमनाथ ट्रस्ट के अनुसार दर्शन सुबह 6 से रात 10 बजे तक होते हैं और आरती सुबह 7 बजे, दोपहर 12 बजे और शाम 7 बजे होती है। लाइट एंड साउंड शो रात 8 से 9 बजे तक होता है, वर्षा ऋतु को छोड़कर।

सोमनाथ मंदिर कितनी बार तोड़ा गया?

1026 से 18वीं सदी की शुरुआत तक मंदिर पर बार-बार आक्रमण हुए – 1026 में महमूद गज़नवी, 1299 में अलाउद्दीन खिलजी की सेना, फिर 1395 और 1451 में, और 1665 व 1706 में औरंगज़ेब के आदेश पर। हर बार इसे फिर बनाया गया; वर्तमान मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा 1951 में हुई।

वर्तमान सोमनाथ मंदिर किसने बनवाया?

नवंबर 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प के बाद श्री सोमनाथ ट्रस्ट ने जनता के दान से पुनर्निर्माण कराया। 11 मई 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्राण-प्रतिष्ठा की।

सोमनाथ मंदिर कैसे पहुँचें?

सोमनाथ रेलवे स्टेशन लगभग 2.5 किमी और वेरावल जंक्शन लगभग 7 किमी दूर है। निकटतम हवाई अड्डा केशोद (लगभग 57 किमी) है, और जूनागढ़, राजकोट व अहमदाबाद से बसें और टैक्सियाँ मिलती हैं।

स्रोत

द्वादश ज्योतिर्लिंग