मेरी श्रद्धा

केदारनाथ मन्दिर

हिमालय की गोद में बसे बाबा केदार — बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे ऊँचा धाम।

उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग ज़िले में, मन्दाकिनी नदी के उद्गम के पास लगभग 3,580 मीटर की ऊँचाई पर स्थित केदारनाथ मन्दिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इनमें सबसे ऊँचाई पर विराजमान है। यह उत्तराखण्ड के चार धाम और पंच केदार का प्रमुख तीर्थ है, जहाँ गौरीकुण्ड से लगभग 16–17 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करके पहुँचा जाता है। सर्दियों में घाटी बर्फ़ से ढक जाती है, इसलिए कपाट हर साल लगभग छह महीने ही खुलते हैं — अप्रैल के अन्त या मई से दीपावली के बाद भैया दूज तक। शेष महीनों में बाबा केदार की पूजा ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मन्दिर में होती है।

केदारनाथ मन्दिर
चित्र: Wikimedia Commons

इतिहास

केदारनाथ का पहला मन्दिर किसने और कब बनवाया, इसका कोई शिलालेख या ऐतिहासिक विवरण नहीं मिलता। 'केदार' का अर्थ है खेत और 'नाथ' का अर्थ स्वामी; काशी केदार माहात्म्य के अनुसार यहाँ 'मोक्ष की फ़सल' उगती है। स्कन्द पुराण में केदार का उल्लेख उस स्थान के रूप में है जहाँ भगवान शिव ने अपनी जटाओं से गंगा को मुक्त किया। रुद्रप्रयाग ज़िला प्रशासन के अनुसार वर्तमान मन्दिर एक हज़ार वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है।

बारहवीं शताब्दी तक केदारनाथ एक प्रतिष्ठित तीर्थ बन चुका था — कन्नौज के गहड़वाल राजाओं के मन्त्री भट्ट लक्ष्मीधर के ग्रन्थ 'कृत्यकल्पतरु' में इसका वर्णन मिलता है। वर्तमान पत्थर के मन्दिर की आयु पर विद्वान एकमत नहीं हैं। राहुल सांकृत्यायन इसे 10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच का मानते हैं, जबकि प्रबल परम्परा आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा इसके जीर्णोद्धार की बात कहती है। कुछ ग्रन्थों के अनुसार शंकराचार्य ने केदारनाथ के निकट ही समाधि ली, जबकि कुछ उनका देहावसान कांचीपुरम में बताते हैं।

यहाँ की पूजा-व्यवस्था सदियों पुरानी है। मन्दिर के मुख्य पुजारी 'रावल' कर्नाटक के वीरशैव (जंगम) समुदाय से होते हैं और शिवलिंग की पूजा इसी परम्परा के पुजारी करते हैं, जबकि केदारघाटी के वंशानुगत तीर्थ पुरोहित यात्रियों की ओर से पूजा-पाठ कराते हैं। तमिल शैव परम्परा में भी केदारनाथ को तेवारम में गाए गए 275 'पाडल पेट्र स्थलों' में गिना जाता है।

1814–16 के आंग्ल-नेपाल युद्ध के बाद केदारनाथ और बदरीनाथ ब्रिटिश गढ़वाल के अधीन आ गए। 1939 के श्री बदरीनाथ और श्री केदारनाथ मन्दिर अधिनियम के तहत इनका प्रबन्ध एक वैधानिक समिति को सौंपा गया, जो आज श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति (बीकेटीसी) कहलाती है। 2019 में चार धामों के लिए बना देवस्थानम बोर्ड क़ानून पुजारियों के लगातार विरोध के बाद 2021 में वापस ले लिया गया और प्रबन्ध फिर समिति के पास लौट आया।

16 और 17 जून 2013 को चोराबाड़ी हिमनद क्षेत्र से आई भीषण बाढ़ और मलबे ने मन्दाकिनी घाटी में भारी तबाही मचाई; केदारनाथ क़स्बा उजड़ गया और पूरे क्षेत्र में हज़ारों लोगों की जान गई। मन्दिर फिर भी बचा रहा — एक विशाल शिला उसके पीछे आकर रुक गई और धारा को दोनों ओर बाँट दिया। यही शिला आज 'भीम शिला' के रूप में पूजी जाती है। आईआईटी मद्रास सहित विशेषज्ञों ने जाँच में ढाँचे को सुरक्षित पाया, और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के नेतृत्व में पुनर्निर्माण के बाद 2014 में यात्रा फिर शुरू हुई।

पुनर्निर्माण का काम वर्षों चला। 5 नवम्बर 2021 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन्दिर के पीछे आदि शंकराचार्य की पुनर्निर्मित समाधि का लोकार्पण किया — पुरानी समाधि 2013 की आपदा में बह गई थी — और आचार्य की 12 फ़ुट ऊँची प्रतिमा का अनावरण किया। अक्टूबर 2022 में एक दानदाता के सहयोग से गर्भगृह की भीतरी दीवारों पर स्वर्ण-मढ़ी चादरें लगाई गईं; यह काम एएसआई की देखरेख में हुआ। 2023 में कुछ पुरोहितों ने इसमें अनियमितता के आरोप लगाए, जिन्हें मन्दिर समिति ने ख़ारिज कर दिया।

आज एक ही यात्रा-काल में दस लाख से अधिक श्रद्धालु केदारनाथ पहुँचते हैं; आकाशवाणी के अनुसार 2025 में लगभग 17.5 लाख भक्तों ने दर्शन किए। यात्रियों के लिए उत्तराखण्ड सरकार की चार धाम पंजीकरण व्यवस्था में पंजीकरण अनिवार्य है। चढ़ाई छोटी करने के लिए रोपवे और सुरंग की योजनाएँ घोषित हुई हैं, पर ये अभी सेवा में नहीं हैं।

पौराणिक कथा

महाभारत में केदारनाथ का सीधा उल्लेख नहीं है, पर गढ़वाल की एक अत्यन्त प्रिय लोक-परम्परा इस धाम को पाण्डवों से जोड़ती है। कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद पाण्डव अपने ही बन्धु-बान्धवों के वध के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव को खोजने निकले। शिव उनसे मिलना नहीं चाहते थे, इसलिए बैल का रूप धरकर पशुओं के बीच छिप गए। गुप्तकाशी में भीम ने उन्हें पहचान लिया और बैल को पकड़ लिया; तभी वह धरती में समाने लगा। बैल की पीठ का कूबड़ केदारनाथ में रह गया, जो आज त्रिकोणाकार स्वयम्भू शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है।

मान्यता है कि भगवान के शेष अंग चार अन्य स्थानों पर प्रकट हुए — भुजाएँ तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मध्यमहेश्वर में और जटाएँ कल्पेश्वर में। केदारनाथ सहित ये पाँचों स्थान 'पंच केदार' कहलाते हैं। भक्त मानते हैं कि पाण्डवों ने इन स्थानों पर पहले मन्दिर बनवाए और फिर महापथ से स्वर्गारोहिणी की ओर प्रस्थान किया। एक अन्य लोककथा के अनुसार शिव से मल्लयुद्ध के बाद भीम ने पश्चाताप में भगवान के शरीर पर घी का लेप किया — इसी से आज भी शिवलिंग पर घी चढ़ाया जाता है।

शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता) में ज्योतिर्लिंग की कथा कुछ और है। हिमालय के केदार शिखर पर विष्णु के अवतार माने जाने वाले नर और नारायण ऋषि पार्थिव शिवलिंग बनाकर बड़ी श्रद्धा से तप और पूजन करते थे। प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और उनकी प्रार्थना पर लोक-कल्याण के लिए केदार में सदा के लिए ज्योतिर्लिंग रूप में निवास करना स्वीकार किया। पुराण कहता है कि केदारेश्वर की पूजा करने वाले को स्वप्न में भी दुःख नहीं सताता।

स्कन्द पुराण केदार को गंगा-अवतरण से भी जोड़ता है, और मन्दिर के पास बहने वाली मन्दाकिनी को गंगा की ही एक धारा माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि मन्दिर के दक्षिण में पहाड़ी पर खुले आकाश के नीचे विराजमान भुकुण्ड भैरवनाथ केदारनाथ के क्षेत्रपाल हैं और लम्बी सर्दियों में धाम की रक्षा करते हैं।

स्थापत्य कला

केदारनाथ मन्दिर उत्तर भारतीय (नागर) परम्परा का हिमालयी रूप है, जो बड़े-बड़े, बराबर तराशे गए भूरे पत्थरों से बना है। यह घाटी के सिरे पर एक ऊँचे चबूतरे पर खड़ा है और इसके पीछे केदार डोम तथा केदारनाथ की हिमाच्छादित चोटियाँ उठती हैं। इसकी रचना सीधी-सादी है — ऊँचे पाषाण शिखर के नीचे गर्भगृह, और उसके आगे ढलवाँ छत वाला स्तम्भयुक्त सभामण्डप, जिसका द्वार आँगन में बैठे नन्दी की ओर खुलता है। कुछ हिन्दी विवरण इसे मध्य हिमालय के प्रारम्भिक मध्यकालीन शासकों के नाम पर 'कत्यूरी शैली' का बताते हैं; तुंगनाथ और मध्यमहेश्वर के मन्दिर भी इसी तरह के हैं।

सभामण्डप में माता पार्वती, पाँचों पाण्डवों, द्रौपदी, श्रीकृष्ण, नन्दी और वीरभद्र की प्रतिमाएँ हैं। धीमी रोशनी वाले गर्भगृह में अनगढ़, लगभग त्रिकोणाकार स्वयम्भू शिवलिंग है, जिसे सुबह के समय भक्त छूकर घी अर्पित करते हैं। इसके चारों ओर चार विशाल स्तम्भ हैं, जिन्हें चार वेदों का प्रतीक माना जाता है; भक्त इन्हीं के पीछे से शिवलिंग की परिक्रमा करते हैं। 2022 से गर्भगृह की भीतरी दीवारें स्वर्ण-मढ़ी चादरों से ढकी हैं।

मन्दिर की भारी चिनाई और मज़बूत जोड़ों को ही भूकम्पों, सदियों की बर्फ़ और 2013 की बाढ़ में इसके टिके रहने का श्रेय दिया जाता है। मन्दिर के पीछे भीम शिला है, जिसने 2013 में इसकी रक्षा की, और आदि शंकराचार्य की पुनर्निर्मित समाधि, जहाँ 2021 में उनकी लगभग 35 टन वज़नी, 12 फ़ुट ऊँची प्रतिमा स्थापित हुई। ऊपर पहाड़ी पर भुकुण्ड भैरवनाथ का मन्दिर है, जहाँ थोड़ी चढ़ाई से पहुँचा जा सकता है।

दैनिक पूजा-अर्चना

  • प्रातःकालीन महाभिषेक और घृत लेपन

    भोर में (सामान्य दर्शन से पहले)

    दिन की शुरुआत सूर्योदय से पहले स्वयम्भू शिवलिंग के अभिषेक और घी के लेप से होती है। बुक किए गए महाभिषेक और रुद्राभिषेक इन्हीं घंटों में होते हैं। सुबह के समय यात्री गर्भगृह में जाकर शिवलिंग को छू सकते हैं और घी अर्पित कर सकते हैं।

  • सामान्य दर्शन

    सुबह से दोपहर तक

    प्रातः पूजा के बाद दोपहर तक मन्दिर दर्शन के लिए खुला रहता है। भीड़ के दिनों में कतार में कई घंटे लग सकते हैं और मन्दिर समिति टोकन से प्रवेश नियंत्रित कर सकती है।

  • दोपहर का विश्राम

    दोपहर (लगभग दो घंटे)

    दोपहर में भोग और सफ़ाई के लिए कपाट कुछ समय बन्द रहते हैं, फिर शाम के दर्शन के लिए खुलते हैं। सटीक समय बीकेटीसी तय करती है और यात्रा-काल में बदलता रहता है।

  • सायंकालीन श्रृंगार और शयन आरती

    संध्या

    शाम को बाबा का फूलों और आभूषणों से श्रृंगार होता है और श्रृंगार व शयन आरती की जाती है। इस समय भक्त सभामण्डप से दर्शन करते हैं; शिवलिंग को छुआ नहीं जाता।

  • बुक की जाने वाली पूजाएँ

    महाभिषेक, रुद्राभिषेक, लघु रुद्राभिषेक, षोडशोपचार पूजा, शिव सहस्रनाम पाठ और सायं आरती बीकेटीसी की वेबसाइट पर ऑनलाइन बुक होती हैं; इसके लिए चार धाम पंजीकरण आवश्यक है।

  • ऊखीमठ में शीतकालीन पूजा

    भैया दूज से अगले कपाट खुलने तक

    कपाट बन्द होने के बाद बाबा केदार की पंचमुखी उत्सव मूर्ति ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मन्दिर में विराजमान होती है, जहाँ पूरी सर्दी नित्य पूजा होती है और भक्त दर्शन कर सकते हैं।

समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।

पर्व-उत्सव

महाशिवरात्रि (फ़रवरी–मार्च)

कपाट खुलने की तिथि की घोषणा

महाशिवरात्रि पर ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मन्दिर में पंचांग देखकर उस वर्ष कपाट खुलने की तिथि और मुहूर्त घोषित किया जाता है। यह तिथि हर साल बदलती है।

अप्रैल के अन्त–मई

डोली यात्रा और कपाटोद्घाटन

कपाट खुलने से कुछ दिन पहले बाबा केदार की पंचमुखी उत्सव डोली ऊखीमठ से रवाना होती है और गुप्तकाशी, गौरीकुण्ड जैसे पड़ावों से होते हुए कई दिनों में धाम पहुँचती है। तय मुहूर्त पर सुबह कपाट खुलते हैं — प्रायः अक्षय तृतीया के आसपास — और यात्रा आरम्भ होती है।

जुलाई–अगस्त

श्रावण मास

अन्य शिवधामों की तरह केदारनाथ में भी सावन का विशेष महत्व है। पर इस समय भारी बारिश से सड़क और पैदल मार्ग जोखिम भरे रहते हैं, इसलिए मौसम की चेतावनी ज़रूर देखें।

विजयादशमी (सितम्बर–अक्टूबर)

कपाट बन्द होने की तिथि की घोषणा

कपाट बन्द होने की सटीक तिथि और समय पंचांग से तय होकर प्रायः विजयादशमी (दशहरा) पर मन्दिर समिति द्वारा घोषित किया जाता है।

अक्टूबर–नवम्बर

भैया दूज — कपाट बन्द

दीपावली के दो दिन बाद भैया दूज को तड़के समापन पूजा शुरू होती है। स्वयम्भू शिवलिंग को भस्म, फूलों और अक्षत से ढककर 'समाधि रूप' दिया जाता है और सुबह कपाट बन्द कर दिए जाते हैं। इसके बाद डोली ऊखीमठ के लिए निकलती है — पहला रात्रि पड़ाव परम्परागत रूप से रामपुर में होता है — और बाबा केदार शीतकाल के लिए ओंकारेश्वर मन्दिर में विराजमान होते हैं।

कैसे पहुँचें

हवाई मार्ग
निकटतम हवाई अड्डा देहरादून के पास जॉली ग्रांट है, जो सड़क मार्ग से केदारनाथ से लगभग 250 किलोमीटर दूर है। यात्रा-काल में गुप्तकाशी–फाटा–सिरसी क्षेत्र के हेलीपैडों से केदारनाथ के लिए हेलिकॉप्टर सेवा चलती है; टिकट केवल आईआरसीटीसी के आधिकारिक हेलीयात्रा पोर्टल पर मिलते हैं।
रेल मार्ग
निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश (योग नगरी ऋषिकेश) है, जो गौरीकुण्ड से लगभग 210 किलोमीटर दूर है; हरिद्वार और देहरादून भी विकल्प हैं। वहाँ से सोनप्रयाग और गौरीकुण्ड के लिए बसें और टैक्सियाँ मिलती हैं।
सड़क मार्ग
ऋषिकेश से सड़क देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग और गुप्तकाशी होते हुए सोनप्रयाग पहुँचती है, जहाँ निजी वाहन खड़े किए जाते हैं; आगे गौरीकुण्ड तक शटल जीप चलती हैं। गौरीकुण्ड से जंगलचट्टी, भीमबली और लिनचोली होते हुए लगभग 16–17 किलोमीटर का पक्का पहाड़ी रास्ता मन्दिर तक जाता है। पैदल इसमें 6–8 घंटे लगते हैं; घोड़ा-खच्चर, पालकी और कंडी भी उपलब्ध हैं।
दर्शन का सबसे अच्छा समय
कपाट हर साल लगभग छह महीने — अप्रैल के अन्त या मई से अक्टूबर/नवम्बर में भैया दूज तक — खुले रहते हैं; यात्रा से पहले बीकेटीसी की घोषित तिथियाँ ज़रूर देखें। मई–जून और सितम्बर–अक्टूबर सबसे अनुकूल माने जाते हैं। जुलाई–अगस्त के मानसून में भूस्खलन और रास्ते बन्द होने का ख़तरा रहता है, और नवम्बर से अप्रैल तक धाम बर्फ़ से ढका व बन्द रहता है। इन महीनों में ऊखीमठ में बाबा केदार के दर्शन किए जा सकते हैं।

तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव

  • कपाट खुलने और बन्द होने की तिथियाँ हर साल पंचांग से तय होती हैं (महाशिवरात्रि और विजयादशमी के आसपास घोषणा) — पिछले साल की तिथियों पर भरोसा न करें।
  • उत्तराखण्ड सरकार का चार धाम पंजीकरण अनिवार्य है — यात्रा से पहले registrationandtouristcare.uk.gov.in पर पंजीकरण करें। पूजा केवल बीकेटीसी की वेबसाइट से और हेलिकॉप्टर टिकट केवल आईआरसीटीसी हेलीयात्रा पोर्टल से बुक करें; नक़ली वेबसाइटों से सावधान रहें।
  • ऊँचाई के अनुकूल होने के लिए रास्ते में गुप्तकाशी या सोनप्रयाग में एक रात रुकें। चढ़ाई भोर में शुरू करें; गर्म कपड़े, बरसाती और ज़रूरी दवाएँ साथ रखें। हृदय या साँस की बीमारी हो तो पहले डॉक्टरी जाँच करा लें।
  • कार्यक्रम में एक-दो दिन अतिरिक्त रखें — भूस्खलन और ख़राब मौसम से सड़क व हेलिकॉप्टर सेवा अक्सर रुक जाती है।
  • मन्दिर के पीछे भीम शिला और आदि शंकराचार्य की समाधि, तथा ऊपर पहाड़ी पर भैरवनाथ मन्दिर के दर्शन अवश्य करें।
  • चार धाम यात्रा में प्रायः केदारनाथ के बाद बदरीनाथ जाया जाता है। सर्दियों में बाबा केदार की गद्दी ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मन्दिर में रहती है।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

केदारनाथ मन्दिर की कथा क्या है?

मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद पाण्डव पाप-मुक्ति के लिए शिव को खोज रहे थे। शिव बैल बनकर छिप गए; भीम ने पकड़ा तो वे धरती में समा गए और उनका कूबड़ केदारनाथ में रह गया। शिव पुराण के अनुसार नर-नारायण ऋषियों की प्रार्थना पर शिव यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में विराजे।

केदारनाथ के कपाट कब खुलते और बन्द होते हैं?

कपाट खुलने की तिथि हर साल महाशिवरात्रि पर ऊखीमठ में घोषित होती है और कपाट प्रायः अप्रैल के अन्त या मई में, अक्षय तृतीया के आसपास खुलते हैं। दीपावली के बाद भैया दूज को कपाट बन्द होते हैं। सटीक तिथियाँ हर साल बदलती हैं, इसलिए बदरीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति की घोषणा देखें।

सर्दियों में बाबा केदार की पूजा कहाँ होती है?

भैया दूज को कपाट बन्द होने के बाद बाबा केदार की पंचमुखी उत्सव डोली ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मन्दिर लाई जाती है, जहाँ पूरी सर्दी पूजा होती है और भक्त दर्शन कर सकते हैं।

केदारनाथ कैसे पहुँचें?

ऋषिकेश या हरिद्वार से सड़क मार्ग द्वारा रुद्रप्रयाग और गुप्तकाशी होते हुए सोनप्रयाग व गौरीकुण्ड पहुँचें। गौरीकुण्ड से लगभग 16–17 किलोमीटर (6–8 घंटे) की पैदल चढ़ाई है। घोड़े-खच्चर, पालकी और गुप्तकाशी–फाटा–सिरसी से मौसमी हेलिकॉप्टर सेवा भी मिलती है।

2013 की बाढ़ में केदारनाथ मन्दिर कैसे बचा?

जून 2013 की बाढ़ में एक विशाल शिला मन्दिर के पीछे आकर रुक गई और पानी व मलबे को दोनों ओर मोड़ दिया। मन्दिर की मज़बूत पत्थर की बनावट को भी इसका श्रेय दिया जाता है। वह शिला आज 'भीम शिला' के नाम से पूजी जाती है।

स्रोत

द्वादश ज्योतिर्लिंग