ओंकारेश्वर मंदिर
पावन नर्मदा के बीच ॐ आकार के द्वीप पर विराजे ज्योतिर्लिंग।
परंपरागत क्रम में ओंकारेश्वर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में चौथा है। यह मध्य प्रदेश के खंडवा ज़िले में, इंदौर से लगभग 77 किमी दूर, नर्मदा नदी के बीच मांधाता द्वीप पर स्थित है। माना जाता है कि यह द्वीप पवित्र ॐ के आकार का है। श्रद्धालु द्वीप पर ओंकारेश्वर और नर्मदा के दक्षिणी तट पर ममलेश्वर (अमरेश्वर), दोनों के दर्शन करते हैं।
इतिहास
ओंकारेश्वर की महिमा स्कंद पुराण, शिव पुराण और वायु पुराण में गाई गई है, और मांधाता के आसपास की नर्मदा घाटी हज़ार वर्ष से भी अधिक समय से तीर्थयात्रा का केंद्र रही है। द्वीप का नाम इक्ष्वाकु वंश के राजा मांधाता के नाम पर है, जिन्होंने परंपरा के अनुसार यहाँ तप किया था।
मुख्य मंदिर किसने और कब बनवाया, इसका कोई प्रामाणिक अभिलेख नहीं है – यह बात स्वयं मंदिर ट्रस्ट भी कहता है। ऐतिहासिक परंपरा इसके आरंभिक निर्माण को 11वीं सदी के मालवा के परमार शासकों से जोड़ती है। उस समय यहाँ के मंदिर निश्चित रूप से फल-फूल रहे थे: दक्षिणी तट के ममलेश्वर मंदिर की दीवारों पर खुदे महिम्न स्तोत्र के श्लोक 1063 ई. के बताए जाते हैं। परमारों के बाद स्थानीय चौहान सरदारों ने मंदिर की देखरेख संभाली, ऐसा कहा जाता है।
मध्यकालीन आक्रमणों में मंदिर को क्षति पहुँची, पर यह कभी पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ। 18वीं सदी में मराठा काल में इसे नया संरक्षण मिला – इंदौर के होलकरों और ग्वालियर के सिंधियाओं ने पूजा-अर्चना को सहारा दिया। देवी अहिल्याबाई होलकर का विशेष नाता ममलेश्वर से है, जहाँ वे पूजा करती थीं और तभी से होलकर राज्य के पुरोहित वहाँ पूजा करते आ रहे हैं। यह परंपरा आज भी दिनचर्या में दिखती है – ओंकारेश्वर में सुबह की पूजा मंदिर ट्रस्ट, दोपहर की पूजा सिंधिया परिवार के पुजारी और शाम की पूजा होलकर परिवार के पुजारी करते हैं।
स्वतंत्रता तक मंदिर स्थानीय राजपरिवार, मांधाता के राव, की निजी संपत्ति था। 11 अगस्त 1957 को अंतिम शासक राजा राव सौभाग्य सिंह ने श्री ओंकारेश्वर पब्लिक ट्रस्ट (अब श्री ओंकारेश्वर मंदिर ट्रस्ट) की स्थापना की, और 19 जनवरी 1967 के खंडवा ज़िला न्यायालय के आदेश से इसका स्वरूप तय हुआ। ट्रस्ट में सात ट्रस्टी हैं – मांधाता के राव प्रबंध ट्रस्टी हैं, और बाकी सार्वजनिक न्यास पंजीयक तथा स्थानीय निकायों द्वारा मनोनीत होते हैं। ममलेश्वर मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित स्मारक है और इसका प्रबंधन अहिल्याबाई खासगी ट्रस्ट करता है।
हाल के दशकों में नर्मदा पर बने ओंकारेश्वर बाँध ने द्वीप के आसपास का दृश्य बदल दिया है। 21 सितंबर 2023 को मध्य प्रदेश सरकार ने मांधाता पर्वत पर आदि शंकराचार्य की 108 फ़ुट ऊँची प्रतिमा 'एकात्मता की प्रतिमा' का अनावरण किया। यह एकात्म धाम परियोजना का पहला चरण है, जिसमें उनके जीवन और दर्शन पर एक संग्रहालय भी बन रहा है।
पौराणिक कथा
मंदिर ट्रस्ट और शिव पुराण के अनुसार विंध्य पर्वत के अधिष्ठाता देव विंध्य ने यहाँ कठोर तप कर शिव की आराधना की और कई महीनों तक शिवलिंग बनाकर पूजा की। प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और प्रणव (ॐ) लिंग के रूप में विराजे। देवताओं की प्रार्थना पर यह लिंग दो भागों में बँट गया – ओंकारेश्वर, जो ज्योतिर्लिंग है, और ममलेश्वर (अमरेश्वर), जो दक्षिणी तट पर पार्थिव लिंग है। इसीलिए श्रद्धालु दोनों के दर्शन करते हैं।
एक अन्य परंपरा के अनुसार श्रीराम के पूर्वज, इक्ष्वाकु वंश के राजा मांधाता ने इस द्वीप पर तप किया, जिससे प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया और ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए। कहा जाता है कि उनके पुत्र अंबरीष और मुचुकुंद ने भी यहाँ तप किया, और पर्वत आज भी मांधाता के नाम से जाना जाता है। तीसरी कथा के अनुसार दानवों से पराजित देवताओं ने शिव से प्रार्थना की, और शिव ने यहाँ ओंकारेश्वर रूप में प्रकट होकर उन्हें विजय दिलाई।
ओंकारेश्वर का आदि शंकराचार्य से भी गहरा नाता है। परंपरा के अनुसार यहीं एक गुफा में उनकी भेंट गुरु गोविंद भगवत्पाद से हुई, जिनसे उन्होंने दीक्षा और योग की शिक्षा पाई। गोविंदेश्वर गुफा कहलाने वाली यह गुफा शिव मंदिर के ठीक नीचे है; पास के गोविंदेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार 1989 में हुआ।
भक्तों का विश्वास है कि शिव रात में तीनों लोकों का भ्रमण कर ओंकारेश्वर में विश्राम करने आते हैं, इसीलिए यहाँ रात्रि के शयन दर्शन का विशेष महत्व है। यह मान्यता भी प्रसिद्ध है कि सभी तीर्थों का जल ओंकारेश्वर में अर्पित करने पर ही तीर्थयात्रा पूर्ण होती है।
स्थापत्य कला
श्रद्धालु पुल या नाव से नर्मदा पार कर लगभग 4 किमी लंबे और 2 किमी चौड़े मांधाता द्वीप के घाटों पर पहुँचते हैं और सीढ़ियाँ चढ़कर नदी से कुछ ऊँचाई पर स्थित मंदिर तक जाते हैं। प्रवेश-द्वार छोटा और नीचा है, जिससे गुफा में प्रवेश करने का अनुभव होता है; प्रांगण में पंचमुखी गणेश की प्रतिमा है। मुख्य मंदिर उत्तर भारतीय (नागर) शैली का है, जिसका शिखर ऊँचा है।
मंदिर में पुराना और नया, दोनों भाग मिले हुए हैं। पुराना गर्भगृह पत्थर की परतों वाले गुंबद का छोटा मंदिर है और उत्तरमुखी है, जबकि नया, बड़ा भाग दक्षिणमुखी है – इसलिए गर्भगृह और विग्रह मुख्य द्वार या शिखर की सीध में नहीं हैं। ओंकारेश्वर का लिंग प्राकृतिक, बिना गढ़ा हुआ, छोटा गोल पत्थर है, जो सदा जल से घिरा रहता है, और पास ही माता पार्वती की प्रतिमा है। लगभग 14 फ़ुट ऊँचा सभा मंडप 60 विशाल स्तंभों पर टिका है।
मंदिर पाँच मंज़िला है और हर मंज़िल पर अलग देवालय है – पहली पर ओंकारेश्वर, दूसरी पर महाकालेश्वर (ठीक शिखर के नीचे), तीसरी पर सिद्धनाथ, चौथी पर गुप्तेश्वर और सबसे ऊपर ध्वजाधारी देव (ध्वजेश्वर)। ऊपरी छतों पर आपस में गुँथी अष्टकोणीय आकृतियाँ बनी हैं।
नदी के उस पार दक्षिणी तट पर ममलेश्वर मंदिर समूह अधिक पुराना और सादी शैली का लगता है; यह ASI द्वारा संरक्षित है और इसकी दीवारों पर 1063 ई. के महिम्न स्तोत्र अभिलेख हैं।
दैनिक पूजा-अर्चना
मंगल आरती और भोग
सुबह 4:30 – 5:00दिन की पहली पूजा, जो मंदिर ट्रस्ट करता है; आरती के दौरान दर्शन बंद रहते हैं।
मंगल दर्शन
सुबह 5:00 – दोपहर 12:20ज्योतिर्लिंग के सुबह के दर्शन; जलाभिषेक के लिए सबसे व्यस्त समय।
मध्याह्न भोग
दोपहर 12:20 – 1:15दोपहर का भोग, जो सिंधिया परिवार के पुजारी लगाते हैं; इस दौरान दर्शन रुकते हैं और फिर दोपहर 1:15 से 4:00 बजे तक होते हैं।
सायंकालीन श्रृंगार और श्रृंगार दर्शन
श्रृंगार शाम 4:00; दर्शन लगभग 4:15/4:30 से रात 9:30 तकशाम को लिंग का श्रृंगार, जिसके बाद सजे हुए विग्रह के दर्शन होते हैं। शाम की पूजा होलकर परिवार के पुजारी करते हैं।
शयन आरती और शयन दर्शन
आरती रात 9:30 – 10:00; दर्शन 10:00 – 10:30मान्यता है कि शिव रात में ओंकारेश्वर में विश्राम करते हैं, इसलिए शयन आरती और शयन दर्शन का विशेष महत्व है। रात 10:30 के बाद मंदिर बंद हो जाता है।
नर्मदा स्नान, ममलेश्वर दर्शन और ओंकार परिक्रमा
श्रद्धालु नर्मदा के घाटों पर स्नान करते हैं, यात्रा पूरी करने के लिए दक्षिणी तट पर ममलेश्वर के दर्शन करते हैं, और कई लोग मांधाता द्वीप की परिक्रमा पैदल करते हैं।
समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।
पर्व-उत्सव
फाल्गुन (फ़रवरी–मार्च)
महाशिवरात्रि
शिव की महान रात्रि – विशेष पूजा, लंबे समय तक दर्शन और भारी भीड़।
श्रावण (जुलाई–अगस्त)
श्रावण मास और सोमवार की सवारी
शिव का पवित्र महीना; सोमवार को ओंकारेश्वर की पालकी में सवारी निकलती है, और द्वीप श्रद्धालुओं व कांवड़ियों से भरा रहता है।
कार्तिक (अक्टूबर–नवंबर)
कुबेर भंडारी मंदिर में धनतेरस
कावेरी–नर्मदा संगम के पास कुबेर मंदिर में भक्त रात भर जागरण करते हैं, और धनतेरस की सुबह अभिषेक, कुबेर-महालक्ष्मी यज्ञ और प्रसाद वितरण होता है।
कार्तिक (अक्टूबर–नवंबर)
कार्तिक पूर्णिमा
नर्मदा स्नान और ओंकारेश्वर दर्शन का शुभ दिन, जिस पर परंपरागत रूप से बड़ा मेला लगता है।
माघ (जनवरी–फ़रवरी)
नर्मदा जयंती
माँ नर्मदा का प्राकट्य दिवस, जिसे घाटों पर पूजा, दीपदान और आरती के साथ मनाया जाता है।
कैसे पहुँचें
- हवाई मार्ग
- निकटतम हवाई अड्डा इंदौर का देवी अहिल्याबाई होलकर हवाई अड्डा है, जो सड़क से लगभग 77–80 किमी (करीब 2 घंटे) दूर है।
- रेल मार्ग
- इंदौर जंक्शन (लगभग 77 किमी) और मुंबई–इटारसी मुख्य लाइन पर खंडवा जंक्शन (लगभग 70 किमी) सबसे सुविधाजनक रेलवे स्टेशन हैं, जहाँ से टैक्सी और बसें मिलती हैं।
- सड़क मार्ग
- ओंकारेश्वर बड़वाह से लगभग 16 किमी और इंदौर–खंडवा मार्ग पर मोरटक्का से लगभग 13 किमी दूर है; इंदौर, उज्जैन और खंडवा से नियमित बसें और टैक्सियाँ चलती हैं। उज्जैन का महाकालेश्वर लगभग 140 किमी दूर है। द्वीप तक झूला पुल या नाव से पहुँचा जाता है।
- दर्शन का सबसे अच्छा समय
- अक्टूबर से मार्च घूमने का सबसे सुहावना समय है, जब द्वीप की परिक्रमा के लिए मौसम आरामदायक रहता है। वर्षा ऋतु (जुलाई–सितंबर) में नर्मदा उफान पर और पहाड़ियाँ हरी होती हैं, पर तेज़ धारा और बाँध से पानी छोड़े जाने के कारण नावें बंद हो सकती हैं। श्रावण के सोमवार, महाशिवरात्रि और कार्तिक पूर्णिमा का विशेष महत्व है, पर भीड़ बहुत रहती है।
तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव
- ट्रस्ट की समय-सारिणी के हिसाब से योजना बनाएँ – सुबह 5 बजे से पहले, रात 10:30 के बाद और हर आरती व श्रृंगार के दौरान दर्शन बंद रहते हैं।
- दक्षिणी तट पर ममलेश्वर के दर्शन भी करें; परंपरा के अनुसार दोनों के दर्शन से ही यात्रा पूरी होती है।
- ऑनलाइन शीघ्र दर्शन स्लॉट और जानकारी के लिए ट्रस्ट की आधिकारिक वेबसाइट या हेल्पलाइन (सुबह 8 से रात 8 बजे) का उपयोग करें, दलालों का नहीं।
- घाटों पर सावधान रहें – नर्मदा की धारा तेज़ हो सकती है, ख़ासकर जब बाँध के गेट खुले हों। केवल चिह्नित घाटों पर स्नान करें।
- सीढ़ियों और परिक्रमा के लिए आरामदायक जूते-चप्पल पहनें और पानी साथ रखें; द्वीप का रास्ता लंबा है और कहीं-कहीं चढ़ाई है।
- शंकराचार्य (गोविंदेश्वर) गुफा, एकात्म धाम की 'एकात्मता की प्रतिमा' और उज्जैन के महाकालेश्वर (लगभग 140 किमी) के दर्शन भी साथ में करें।
इस यात्रा के लिए साथ रखें
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा क्या है?
शिव पुराण के अनुसार विंध्य पर्वत ने यहाँ कठोर तप से शिव की आराधना की। शिव ॐ आकार के प्रणव लिंग के रूप में प्रकट हुए, जो ओंकारेश्वर और ममलेश्वर में बँट गया। एक अन्य परंपरा इसे राजा मांधाता के तप से जोड़ती है।
ओंकारेश्वर मंदिर में दर्शन और आरती का समय क्या है?
मंदिर ट्रस्ट के अनुसार मंगल आरती सुबह 4:30 बजे होती है और दर्शन सुबह 5 से रात 10:30 बजे तक होते हैं, बीच में मध्याह्न भोग (12:20–1:15), शाम का श्रृंगार (4 बजे से) और शयन आरती (रात 9:30–10:00) के समय विराम रहता है।
ओंकारेश्वर और ममलेश्वर में क्या अंतर है?
मांधाता द्वीप पर स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग है, और दक्षिणी तट पर स्थित ममलेश्वर (अमरेश्वर) को उसी लिंग का पार्थिव रूप माना जाता है। श्रद्धालु दोनों के दर्शन करते हैं।
ओंकारेश्वर कैसे पहुँचें?
इंदौर हवाई अड्डा और इंदौर जंक्शन लगभग 77 किमी दूर हैं, और खंडवा जंक्शन दूसरा प्रमुख रेलवे स्टेशन है। बड़वाह और मोरटक्का होकर बसें-टैक्सियाँ चलती हैं, और द्वीप तक झूला पुल या नाव से पहुँचते हैं।
ओंकारेश्वर मंदिर का प्रबंधन कौन करता है?
1957 में बना श्री ओंकारेश्वर मंदिर ट्रस्ट, जिसके प्रबंध ट्रस्टी मांधाता के राव हैं। ममलेश्वर मंदिर ASI द्वारा संरक्षित स्मारक है, जिसका प्रबंधन अहिल्याबाई खासगी ट्रस्ट करता है।
स्रोत
- https://en.wikipedia.org/wiki/Omkareshwar_Temple
- https://hi.wikipedia.org/wiki/ओंकारेश्वर_मन्दिर
- https://www.shriomkareshwar.org/
- https://www.shriomkareshwar.org/Schedules.aspx
- https://www.shriomkareshwar.org/MainTemple.aspx
- https://www.shriomkareshwar.org/AboutTrust.aspx
- https://shriomkareshwar.org/OtherTemples.aspx
- https://www.shriomkareshwar.org/Festivals.aspx
- https://www.newsonair.gov.in/cm-shivraj-singh-chouhan-unveils-108-ft-high-statue-of-adi-shankaracharya-at-omkareshwar-mp
- https://www.tribuneindia.com/news/madhya-pradesh/108-foot-statue-of-adi-shankaracharya-unveiled-in-mps-omkareshwar-546509/amp