रामनाथस्वामी मंदिर, रामेश्वरम
जहाँ श्रीराम ने सागर तट पर शिव की आराधना की, और सबसे दक्षिणी ज्योतिर्लिंग लहरों पर पहरा देता है।
तमिलनाडु के रामेश्वरम द्वीप पर स्थित अरुल्मिगु रामनाथस्वामी मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे दक्षिणी है और चार धामों में से एक है। परंपरा के अनुसार श्रीराम ने रावण से युद्ध में शिव का आशीर्वाद पाने के लिए यहाँ लिंग की पूजा की थी। लगभग 15 एकड़ में फैला यह मंदिर अपने 22 पवित्र तीर्थों (कुंडों) और खंभों वाले तीसरे गलियारे के लिए प्रसिद्ध है, जो किसी भी हिंदू मंदिर के सबसे लंबे गलियारों में गिना जाता है।
इतिहास
रामेश्वरम की पवित्रता अत्यंत प्राचीन है। यह मंदिर 'पाडल पेट्र स्थलम' में से एक है, यानी वे शिवधाम जिनकी स्तुति नायनार संत अप्पर, सुंदरर और संबंदर ने तेवारम के भजनों में की। तमिलनाडु के हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग द्वारा प्रकाशित मंदिर के इतिहास के अनुसार लगभग 10वीं सदी तक एक तपस्वी इस मंदिर की देखभाल करते थे, और 12वीं सदी में श्रीलंका के राजा पराक्रमबाहु ने गर्भगृह का निर्माण कराया।
14वीं सदी के आरंभ में दिल्ली सल्तनत के अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफ़ूर ने सुदूर दक्षिण में अभियान चलाया। इतिहासकार फ़रिश्ता के अनुसार वह रामेश्वरम तक पहुँचा, और सल्तनत के वृत्तांतों में 1311 में दक्षिण के कई मंदिर-नगरों पर हमलों और भारी संपत्ति दिल्ली ले जाने का उल्लेख है। इसके बाद जलडमरूमध्य के दोनों ओर के शासकों ने जीर्णोद्धार कराया; जाफ़ना के इतिवृत्त राजा जेयवीर सिंकैआरियन (1380–1410 ई.) को त्रिंकोमाली से पत्थर भेजकर गर्भगृह के जीर्णोद्धार का श्रेय देते हैं।
अगली चार सदियों में मंदिर का विकास सबसे अधिक रामनाथपुरम (रामनाड) के सेतुपति शासकों से जुड़ा है, जो लंका जाने वाले सेतु के वंशानुगत रक्षक माने जाते थे। HR&CE के इतिहास के अनुसार 15वीं सदी में उदैयन सेतुपति ने नागौर के एक व्यापारी के साथ मिलकर पश्चिमी गोपुरम और परकोटे बनवाए; 16वीं सदी में मदुरै के नायक राजा विश्वनाथ नायक के अधीन सामंत चिन्न उदैयन सेतुपति कट्टत्तेवर ने नंदी मंडपम बनवाया; और 17वीं सदी में दलवाई सेतुपति ने पूर्वी राजगोपुरम का एक भाग बनवाया। 18वीं सदी के उत्तरार्ध में मुत्तुरामलिंग सेतुपति (शासन 1763–1795) ने प्रसिद्ध तीसरा गलियारा बनवाया; उसके पश्चिमी प्रवेश पर उनकी और उनके मंत्रियों मुत्तुइरुलप्पा पिल्लै और कृष्ण अय्यंगार की प्रतिमाएँ हैं।
तंजावुर के मराठा शासकों ने 1745 से 1837 के बीच तीर्थयात्रियों के मार्ग पर धर्मशालाएँ (छत्रम) बनवाईं। मंदिर का इतिहास नाट्टुकोट्टै नगरत्तार (चेट्टियार) समुदाय को भी श्रेय देता है, जिन्होंने कठिन यात्रा के दिनों में भी जीर्णोद्धार कराए। 1897 से 1904 के बीच इसी समुदाय के देवकोट्टै के ज़मींदार परिवार (AL. AR. परिवार) ने नौ तलों वाला, 126 फ़ुट ऊँचा पूर्वी राजगोपुरम पूरा कराया। पश्चिम की पहली यात्रा से लौटकर स्वामी विवेकानंद ने 1897 में यहाँ पूजा की थी।
आज मंदिर का प्रबंध तमिलनाडु सरकार का HR&CE विभाग करता है। 2016 में उत्तरी और दक्षिणी प्रवेश पर नए गोपुरम बने, जिससे अब चारों दिशाओं में गोपुरम हैं। अप्रैल 2025 में देश के पहले वर्टिकल-लिफ़्ट समुद्री पुल, नए पंबन रेल पुल के खुलने से द्वीप तक रेल यात्रा बदल गई; इसने 1914 के पुराने पुल की जगह ली।
पौराणिक कथा
रामायण के युद्ध कांड में सीता के साथ अयोध्या लौटते समय श्रीराम वह स्थान दिखाते हैं जहाँ लंका तक सेतु बनने से पहले शिवजी ने उन्हें आशीर्वाद दिया था, और उसे परम पवित्र बताते हैं। शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 31) में दक्षिणी समुद्र के तट पर डेरा डाले श्रीराम पार्थिव लिंग बनाकर षोडशोपचार से शिव की पूजा करते हैं; प्रसन्न शिव उन्हें रावण पर विजय का वर देते हैं और राम की प्रार्थना पर लोककल्याण के लिए रामेश्वर के रूप में उसी लिंग में निवास करना स्वीकार करते हैं।
मंदिर की स्थल-पुराण कथा सबसे प्रिय रूप है। युद्ध के बाद ऋषि अगस्त्य की सलाह पर श्रीराम सीता और लक्ष्मण के साथ यहाँ आए, ताकि ब्राह्मण रावण के वध के पाप का प्रायश्चित कर शिव की पूजा करें। उन्होंने शुभ मुहूर्त तय किया और हनुमान को कैलास से शिवलिंग लाने भेजा। हनुमान समय पर न लौटे, तो सीता ने समुद्र तट की रेत से लिंग बनाया और उसी से पूजा पूरी हुई; यही रामलिंगम मुख्य देवता है। बाद में पहुँचे हनुमान ने रेत के लिंग को उखाड़ने का बहुत प्रयास किया, पर सफल न हुए।
उन्हें सांत्वना देने के लिए राम ने हनुमान के लाए लिंग, विश्वलिंगम, को रामलिंगम के ठीक उत्तर में स्थापित किया और आदेश दिया कि पहले उसी की पूजा हो। पूजा का यह क्रम आज भी चलता है। कुछ कथाओं में रेत का लिंग स्वयं राम बनाते हैं, और कुछ में हनुमान काशी से लिंग लाते हैं।
पूरा द्वीप रामायण की कथाओं से भरा है: मंदिर के 22 तीर्थ राम के तरकश के 22 बाणों के प्रतीक माने जाते हैं, गंधमादन पर्वतम वह स्थान माना जाता है जहाँ से हनुमान ने लंका की ओर छलाँग लगाई, और द्वीप के दक्षिणी छोर पर धनुषकोडि को वह स्थान माना जाता है जहाँ से लंका तक सेतु शुरू हुआ।
स्थापत्य कला
रामनाथस्वामी मंदिर द्रविड़ शैली का भव्य उदाहरण है, जो ऊँची दीवारों से घिरा है और चारों दिशाओं में गोपुरम हैं। नौ तलों वाला, 126 फ़ुट (लगभग 38 मीटर) ऊँचा पूर्वी राजगोपुरम 1897 से 1904 के बीच पूरा हुआ; पश्चिमी गोपुरम 15वीं सदी का है; और उत्तरी व दक्षिणी गोपुरम 2016 में बने। मंदिर लगभग 15 एकड़ में फैला है।
भीतर तीन प्राकार (परिक्रमा गलियारे) हैं। 18वीं सदी के उत्तरार्ध में मुत्तुरामलिंग सेतुपति का बनवाया तीसरा गलियारा सबसे प्रसिद्ध है: रामनाथपुरम ज़िला प्रशासन के अनुसार यह पूर्व से पश्चिम लगभग 197 मीटर और उत्तर से दक्षिण 133 मीटर तक फैला है, और इसे अक्सर भारत का सबसे लंबा मंदिर-गलियारा कहा जाता है। ऊँचे चबूतरों पर खड़े नक्काशीदार खंभों की कतारें, जिनकी संख्या प्रायः लगभग 1,212 बताई जाती है, और रंगीन चित्रों से सजी छतें इसकी पहचान हैं। जहाँ यह गलियारा पश्चिमी गोपुरम से सेतुमाधव मंदिर तक जाने वाले रास्ते से मिलता है, वहाँ शतरंज की बिसात जैसा 'चोक्कट्टान मंडपम' है, जहाँ वसंतोत्सव तथा आडि और मासी के उत्सवों में उत्सव-मूर्तियाँ विराजमान की जाती हैं।
द्वीप पर पत्थर की खदान न होने के कारण पत्थर मुख्य भूमि और श्रीलंका से नावों द्वारा लाया गया। रामनाथस्वामी (रामलिंगम) और देवी पर्वतवर्धिनी के मुख्य मंदिरों के बीच एक गलियारा है; विश्वलिंगम ठीक उत्तर में है, और देवी विशालाक्षी, सेतुमाधव (विष्णु), गणेश तथा उत्सव-मूर्तियों के मंदिर भी हैं। एक स्थान को योगी पतंजलि की समाधि माना जाता है। मंडपों में अनुप्पु, शुक्रवार, सेतुपति, कल्याण और नंदी मंडपम प्रमुख हैं। परिसर के भीतर कुओं और कुंडों के रूप में 22 तीर्थ हैं, और मंदिर के अभिलेख पूरे द्वीप पर लगभग पचास पवित्र तीर्थ गिनाते हैं।
दैनिक पूजा-अर्चना
अग्नि तीर्थम में स्नान
सुबह जल्दीपरंपरा के अनुसार तीर्थयात्री मंदिर में प्रवेश से पहले पूर्वी गोपुरम से लगभग 100 मीटर दूर अग्नि तीर्थम में समुद्र स्नान करते हैं।
स्फटिक लिंग दर्शन
सुबह 5:00 – 6:00 बजेमंदिर सुबह 4 बजे खुलता है और 5 बजे से भक्तों को स्फटिक लिंग के दर्शन के लिए प्रवेश मिलता है, जिसकी दीप-आराधना मुख्य लिंग के पट खुलने से पहले होती है। यह सबसे लोकप्रिय दर्शनों में है और लंबी कतार लगती है।
22 तीर्थों में स्नान
सुबह 5:30 – दोपहर 12:30 और दोपहर 3:00 – शाम 7:00तीर्थयात्री मंदिर के भीतर एक कुएँ से दूसरे तक जाते हैं और सेवक उन पर जल डालते हैं। यह प्रचलित है पर अनिवार्य नहीं; इसके लिए टिकट लेना होता है।
मूलस्थान दर्शन और विश्वलिंगम
सुबह 6:00 – दोपहर 1:00 और दोपहर 3:15 – रात 8:00परंपरा में राम के आदेश के अनुसार पहले विश्वलिंगम की पूजा होती है, फिर भक्त देवी पर्वतवर्धिनी के मंदिर जाते हैं। मंदिर दोपहर 1 बजे बंद होकर 3 बजे फिर खुलता है और रात 9 बजे तक पूरी तरह बंद हो जाता है।
दैनिक काल-पूजाएँ
दिन भरतमिल आगम पद्धति से रोज़ छह पूजाएँ होती हैं: भोर की पल्लियरै और उषःकाल पूजा से लेकर कालसंधि, उच्चिकाल और सायरक्षा, और रात में अर्धजाम पूजा व पल्लियरै (शयन) अनुष्ठान तक।
समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।
पर्व-उत्सव
मासी (फ़रवरी–मार्च)
महाशिवरात्रि ब्रह्मोत्सवम
मंदिर का सबसे बड़ा उत्सव, लगभग दस दिन चलता है; वाहनों पर देवताओं की शोभायात्राएँ निकलती हैं और शिवरात्रि की रात भर पूजा होती है। इसका छठा दिन परंपरा से रामनाड के सेतुपति आयोजित करते हैं।
आडि (जुलाई–अगस्त)
आडि तिरुकल्याणम
रामनाथस्वामी और पर्वतवर्धिनी के दिव्य विवाह का पखवाड़े भर चलने वाला उत्सव, जो अम्मन सन्निधि में ध्वजारोहण से शुरू होता है। आडि अमावसाई पर देवताओं को स्वर्ण रथ पर अग्नि तीर्थम ले जाया जाता है।
तै (जनवरी–फ़रवरी) और आडि (जुलाई–अगस्त)
तै और आडि अमावसाई
अमावस्या के इन दिनों अग्नि तीर्थम में स्नान और पितरों के लिए तर्पण करने लाखों श्रद्धालु आते हैं।
वैकासी (मई–जून)
वसंतोत्सवम
वसंत उत्सव, जिसमें उत्सव-मूर्तियों का शृंगार कर उन्हें चोक्कट्टान मंडपम में विराजमान किया जाता है।
तिथि बदलती है
रामलिंग प्रतिष्ठा
श्रीराम द्वारा लिंग की स्थापना और पूजा की स्मृति में मनाया जाने वाला उत्सव।
कैसे पहुँचें
- हवाई मार्ग
- निकटतम बड़ा हवाई अड्डा मदुरै है, जो लगभग 170 किलोमीटर दूर है; वहाँ से सड़क मार्ग (लगभग 3.5–4 घंटे) या मदुरै से रेल द्वारा रामेश्वरम पहुँचें।
- रेल मार्ग
- रामेश्वरम स्टेशन अप्रैल 2025 में खुले नए पंबन रेल पुल से मुख्य भूमि से जुड़ा है, और मदुरै, चेन्नई (तांबरम) तथा अन्य शहरों से सीधी गाड़ियाँ हैं। स्टेशन मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर दूर है।
- सड़क मार्ग
- द्वीप पंबन सड़क पुल से मुख्य भूमि से जुड़ा है। ज़िला मुख्यालय रामनाथपुरम लगभग 55 किलोमीटर और मदुरै लगभग 170 किलोमीटर दूर है। रामेश्वरम के लिए सरकारी और निजी बसें अक्सर चलती हैं, और मंदिर शहर के बीचोंबीच है।
- दर्शन का सबसे अच्छा समय
- अक्टूबर से अप्रैल का समय सबसे आरामदायक है; गर्मियों में उमस भरी गर्मी रहती है और उत्तर-पूर्वी मानसून (अक्टूबर–दिसंबर) में तेज़ बारिश हो सकती है। महाशिवरात्रि और आडि उत्सव में मंदिर की रौनक देखते ही बनती है, और तै व आडि अमावसाई पर अग्नि तीर्थम में स्नान के लिए भारी भीड़ होती है।
तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव
- अग्नि तीर्थम और 22 तीर्थों में स्नान करना हो तो कपड़ों का एक जोड़ा साथ रखें; एक कुएँ से दूसरे तक जाते हुए आप पूरी तरह भीग जाएँगे, और कपड़े बदलने के कमरे उपलब्ध हैं।
- स्फटिक लिंग के दर्शन के लिए सुबह 5 बजे से काफ़ी पहले कतार में लग जाएँ।
- तीर्थ स्नान केवल सुबह 5:30 से दोपहर 12:30 और दोपहर 3 से शाम 7 बजे तक होता है; दर्शन की योजना उसी हिसाब से बनाएँ।
- तीसरे गलियारे में आराम से घूमें और खंभों की नक्काशी तथा छत के चित्रों को ध्यान से देखें।
- द्वीप के दक्षिणी छोर पर धनुषकोडि दिन के उजाले में जाएँ; राम के चरण-चिह्न वाला गंधमादन पर्वतम, कोदंडरामस्वामी मंदिर और विल्लूरणि तीर्थ भी दर्शनीय हैं।
- पारंपरिक वस्त्र पहनें; मंदिर के भीतर फ़ोन और कैमरा ले जाने की अनुमति नहीं है, इसलिए क्लोकरूम में जमा कर दें।
इस यात्रा के लिए साथ रखें
- 30 लीटर डे-पैकदर्शन के दिन पानी, प्रसाद, शॉल और कागज़ात के लिए।Amazon पर दाम देखें
- शिवपुराण (गीता प्रेस)ज्योतिर्लिंगों की कथाओं और शिवरात्रि व्रत-कथा का मूल ग्रंथ।Amazon पर दाम देखें
- रुद्राक्ष माला (108+1 मनके)शिव मंत्रों और महामृत्युंजय जाप की पारंपरिक माला।Amazon पर दाम देखें
- तुलसी जप मालाविष्णु, कृष्ण और राम नाम जाप के लिए।Amazon पर दाम देखें
Amazon Associate के रूप में मेरी श्रद्धा योग्य ख़रीद पर कमीशन पाती है। इससे आपको कोई अतिरिक्त ख़र्च नहीं होता और यह ज्ञान-कोष निःशुल्क बना रहता है।
श्रद्धालुओं के प्रश्न
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की कथा क्या है?
रामायण और शिव पुराण के अनुसार श्रीराम ने रामेश्वरम के तट पर लिंग रूप में शिव की पूजा की। मंदिर की परंपरा कहती है कि हनुमान को कैलास से लिंग लाने में देर हुई, तो सीता ने रेत से मुख्य लिंग बनाया; बाद में राम ने हनुमान के लाए लिंग को विश्वलिंगम के रूप में स्थापित कर उसकी पहले पूजा का आदेश दिया।
रामेश्वरम मंदिर के दर्शन का समय क्या है?
मंदिर की आधिकारिक HR&CE वेबसाइट के अनुसार मंदिर सुबह 4 बजे खुलता है; स्फटिक लिंग दर्शन सुबह 5 से 6 बजे तक होते हैं और दर्शन दोपहर 1 बजे तक चलते हैं। दोपहर 3 बजे मंदिर फिर खुलता है और 3:15 से रात 8 बजे तक दर्शन होते हैं। तीर्थ स्नान सुबह 5:30 से 12:30 और दोपहर 3 से शाम 7 बजे तक होता है।
रामेश्वरम मंदिर में 22 तीर्थ क्यों हैं?
मंदिर के भीतर 22 पवित्र कुएँ और कुंड हैं, जिन्हें राम के तरकश के 22 बाणों का प्रतीक माना जाता है। इनमें स्नान को पवित्र करने वाला माना जाता है और यह तीर्थयात्रा का अहम हिस्सा है।
क्या रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग भी है और चार धाम भी?
हाँ। रामनाथस्वामी बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, उनमें सबसे दक्षिणी, और बद्रीनाथ, पुरी तथा द्वारका के साथ चार धामों में भी गिना जाता है।
रामेश्वरम मंदिर का गलियारा कितना लंबा है?
रामनाथपुरम ज़िला प्रशासन के अनुसार 18वीं सदी के उत्तरार्ध में मुत्तुरामलिंग सेतुपति का बनवाया तीसरा गलियारा पूर्व से पश्चिम लगभग 197 मीटर और उत्तर से दक्षिण 133 मीटर तक फैला है, और इसे अक्सर भारत का सबसे लंबा मंदिर-गलियारा कहा जाता है।
स्रोत
- https://en.wikipedia.org/wiki/Ramanathaswamy_Temple
- https://hi.wikipedia.org/wiki/रामेश्वरम_तीर्थ
- https://rameswaramramanathar.hrce.tn.gov.in/
- https://rameswaramramanathar.hrce.tn.gov.in/hrcehome/history.php?tid=35671
- https://rameswaramramanathar.hrce.tn.gov.in/hrcehome/towers.php?tid=35671
- https://rameswaramramanathar.hrce.tn.gov.in/hrcehome/speciality.php?tid=35671
- https://ramanathapuram.nic.in/?p=2809
- https://greenmesg.org/bharatavarsha/scriptures/puranas/shiva_purana/koti_rudra_samhita/rameshwara_jyotirlinga.php
- https://www.thenewsminute.com/tamil-nadu/pm-modi-inaugurates-new-pamban-railway-bridge-in-rameswaram
- https://blog.yatradham.org/ramanathaswamy-temple-festival/