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घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर

बारहवाँ ज्योतिर्लिंग, जो एक माँ की अटूट आस्था और क्षमा से प्रकट हुआ।

घृष्णेश्वर, जिसे घुश्मेश्वर भी कहते हैं, महाराष्ट्र में एलोरा की गुफाओं से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर वेरूल गाँव में भगवान शिव का मंदिर है, जिसे बारह ज्योतिर्लिंगों में अंतिम माना जाता है। भोसले परिवार और फिर अहिल्याबाई होलकर द्वारा पुनर्निर्मित लाल पत्थर के इस मंदिर में भक्त अपने हाथों से शिवलिंग का स्पर्श कर सकते हैं। अपने पुत्र के हत्यारे को भी क्षमा करने वाली घुश्मा की कथा इसे भक्ति और करुणा का धाम बनाती है।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर
चित्र: Wikimedia Commons

इतिहास

घृष्णेश्वर मंदिर वेरूल गाँव में है, जो एलोरा की गुफाओं से लगभग डेढ़ किलोमीटर और छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) से लगभग 30 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में है। शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता में इसकी कथा है और इसे बारहवाँ ज्योतिर्लिंग माना गया है; स्थानीय परंपरा में इसका स्थल-पुराण 'वेरूल माहात्म्य' के रूप में मिलता है। पुराने समय में इस स्थान को एलापुर, वेरूल और घृष्णेश्वर जैसे कई नामों से जाना जाता था।

मंदिर के मूल निर्माण का कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है। मूर्तिकला विशेषज्ञ योगेश जोशी ने 2025 में पीटीआई से बातचीत में वर्तमान मंदिर के आधार को यादव काल (लगभग 12वीं सदी) का बताया, जब पास ही स्थित देवगिरि (आज का दौलताबाद) के यादव इस क्षेत्र पर राज करते थे। 13वीं और 14वीं सदी में दिल्ली सल्तनत के दौर में मंदिर को क्षति पहुँची, और लंबे मुग़ल–मराठा संघर्ष में भी यह कई बार टूटा और फिर बना।

पहला दर्ज जीर्णोद्धार छत्रपति शिवाजी महाराज के पूर्वज भोसले परिवार से जुड़ा है, जिनकी जागीर वेरूल थी। शिवाजी महाराज के दादा मालोजी भोसले को 16वीं सदी के अंत या 17वीं सदी के आरंभ में मंदिर के जीर्णोद्धार का श्रेय दिया जाता है, और मंदिर में एक शिलालेख पर मालोजी और एकोजी भोसले के नाम अंकित हैं। मंदिर से कुछ ही दूरी पर भोसलों के पैतृक निवास के अवशेष हैं, जो महाराष्ट्र राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित हैं।

मंदिर ने अपना वर्तमान रूप 18वीं सदी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर के संरक्षण में पाया, जिन्होंने काशी से सोमनाथ तक देश भर के मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया। आउटलुक ट्रैवलर उनके पुनर्निर्माण का वर्ष 1769 बताता है; कुछ स्रोत इसके बजाय होलकर वंश की ही पहले की रानी गौतमाबाई और वर्ष 1729 का उल्लेख करते हैं। मंदिर के पास सीढ़ीदार शिवालय तीर्थ कुंड बनवाने का श्रेय भी अहिल्याबाई को दिया जाता है।

आज घृष्णेश्वर एक व्यस्त तीर्थ है, जहाँ रोज़ हज़ारों श्रद्धालु आते हैं और सावन तथा महाशिवरात्रि पर भारी भीड़ उमड़ती है। अधिकतर यात्री इसके साथ यूनेस्को विश्व धरोहर एलोरा गुफाएँ, दौलताबाद का किला और पास का खुलताबाद भी देखते हैं।

पौराणिक कथा

शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 32–33) के अनुसार देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नाम के एक विद्वान ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहते थे। उनके पास सब कुछ था, बस संतान नहीं थी। जब सुदेहा को पता चला कि वह माँ नहीं बन सकती, तो उसने सुधर्मा को अपनी छोटी बहन घुश्मा से विवाह के लिए मना लिया। घुश्मा सरल, सदाचारी और शिव की अनन्य भक्त थी: वह रोज़ एक सौ एक पार्थिव (मिट्टी के) शिवलिंग बनाती, उनकी पूजा करती और पास के सरोवर में विसर्जित करती। शिवकृपा से उसे एक सुंदर पुत्र हुआ।

समय के साथ सुदेहा के मन में ईर्ष्या घर कर गई। एक रात उसने घुश्मा के युवा पुत्र की हत्या कर दी और शव उसी सरोवर में फेंक दिया जहाँ घुश्मा अपने लिंग विसर्जित करती थी। पूरा घर शोक में डूब गया, पर घुश्मा ने रोज़ की तरह अपनी पूजा पूरी की। लिंग विसर्जित कर जब वह लौटने लगी, तो उसका पुत्र जीवित होकर सरोवर से निकला और उसके चरणों में आ गिरा। शिवजी प्रकट हुए और सुदेहा के अपराध पर क्रोधित होकर उसे दंड देने को तैयार हुए, पर घुश्मा ने हाथ जोड़कर अपनी बहन को क्षमा करने की विनती की। उसने एक और वर माँगा: कि प्रभु लोककल्याण के लिए सदा इसी स्थान पर निवास करें।

शिवजी ने दोनों इच्छाएँ पूरी कीं और यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में विराजमान हुए, जो घुश्मेश्वर, यानी घुश्मा के ईश्वर कहलाए। कुछ कथाओं में, जिनमें स्थानीय 'वेरूल माहात्म्य' भी शामिल है, उसका नाम घृष्णा और लिंगों की संख्या 108 बताई गई है। नाम की अन्य पारंपरिक व्याख्याएँ भी हैं: एक के अनुसार पार्वती ने हथेलियों के बीच केसर मला तो यह लिंग प्रकट हुआ (संस्कृत धातु 'घृष्' का अर्थ है रगड़ना), और एक दुर्लभ नाम 'घृणेश्वर' को 'करुणा के स्वामी' के अर्थ में समझा जाता है।

स्थापत्य कला

घृष्णेश्वर स्थानीय लाल पत्थर से बना एक सुगठित मंदिर है, जिसका ऊँचा शिखर ईंट और चूने के पलस्तर (स्टको) से बना है। मूर्तिकला विशेषज्ञ योगेश जोशी, जी. बी. देगलूरकर की पुस्तक 'वेरूल दर्शन' के हवाले से बताते हैं कि यह शिखर उत्तर भारतीय (नागर) और दक्षिण भारतीय (द्रविड़) दोनों शैलियों से अलग है, और उस पर राम, लक्ष्मण, भरत, द्रौपदी, भीम, अर्जुन जैसे रामायण-महाभारत के पात्रों तथा विष्णु के अवतारों की मूर्तियाँ हैं। बाहर से देखने पर पत्थर गेरुए, गुलाबी और हल्के पीले रंग की नक्काशीदार पट्टियों में ऊपर उठता दिखता है।

मंदिर में नक्काशीदार पत्थर के खंभों पर टिका सभा मंडप है; कुछ खंभों पर शिकार के दृश्य हैं और एक अनोखी आकृति है जिसमें एक ही मुख मछली, हाथी और बैल के शरीरों से जुड़ा है। गर्भगृह के सामने नंदी की बड़ी प्रतिमा है। ज्योतिर्लिंग गर्भगृह में प्रतिष्ठित है, और भक्त अपने हाथों से इसका स्पर्श कर सकते हैं। प्रवेश से पहले श्रद्धालु परंपरा से कोकिला माता के छोटे मंदिर में नमन करते हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि वे शिवजी को भक्त के आगमन की सूचना देती हैं।

कुछ ही कदम दूर शिवालय तीर्थ है, अहिल्याबाई होलकर से जोड़ा जाने वाला सीढ़ीदार कुंड, जिसके किनारे शिवलिंग वाले आठ छोटे मंदिर हैं। मंदिर का परिवेश भी इसकी विशेषता है: यह एलोरा की शैलकृत गुफाओं से कुछ ही मिनट दूर है, जिनके बौद्ध, हिंदू और जैन स्मारकों में शिव को समर्पित विशाल कैलास मंदिर भी है।

दैनिक पूजा-अर्चना

  • प्रातः आरती

    सुबह 5:30 बजे

    भारत सरकार के 'इनक्रेडिबल इंडिया' पोर्टल के अनुसार मंदिर सुबह 5:30 बजे प्रातः आरती के साथ खुलता है।

  • दर्शन और अभिषेक

    सुबह 5:30 – रात 9:30

    भक्त ज्योतिर्लिंग का स्पर्श कर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित कर सकते हैं। परंपरा के अनुसार पुरुष गर्भगृह में प्रवेश से पहले कमीज़ उतारते हैं। विशेष अभिषेक और पूजा की बुकिंग मंदिर में अलग से होती है।

  • मध्याह्न आरती

    दोपहर 12:00 बजे

    दोपहर की आरती, मंदिर के दैनिक पूजा-क्रम का हिस्सा।

  • संध्या आरती

    शाम 7:00 बजे

    शाम की मुख्य आरती, जिसमें दिन की सबसे बड़ी भीड़ होती है।

  • शयन आरती

    रात 9:30 बजे

    रात्रि विश्राम से पहले की अंतिम आरती। सावन में मंदिर अधिक देर तक खुला रहता है और रात लगभग 9 बजे विशेष पूजा होती है।

समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।

पर्व-उत्सव

फाल्गुन (फ़रवरी–मार्च)

महाशिवरात्रि

वर्ष का सबसे बड़ा दिन। भगवान की उत्सव-मूर्ति पालकी में शिवालय तीर्थ कुंड तक शोभायात्रा के साथ ले जाई जाती है और लौटने के बाद रात भर पूजा होती है।

सावन (जुलाई–अगस्त)

सावन के सोमवार

पूरे सावन में मंदिर जल्दी खुलता और देर से बंद होता है, रात में विशेष पूजा होती है; सोमवार को अभिषेक और दर्शन के लिए सबसे अधिक भीड़ रहती है।

कार्तिक (अक्टूबर–नवंबर)

कार्तिक पूर्णिमा

शिव मंदिरों में दीपों और विशेष पूजा के साथ मनाया जाने वाला पूर्णिमा का पर्व।

कैसे पहुँचें

हवाई मार्ग
छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) हवाई अड्डा लगभग 38 किलोमीटर दूर है, सड़क से लगभग 45 मिनट से एक घंटा; यहाँ से मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद आदि के लिए उड़ानें हैं।
रेल मार्ग
छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) रेलवे स्टेशन लगभग 30 किलोमीटर दूर निकटतम बड़ा स्टेशन है; वहाँ से टैक्सी या एमएसआरटीसी बस से वेरूल पहुँचें।
सड़क मार्ग
मंदिर छत्रपति संभाजीनगर से लगभग 30 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में दौलताबाद और खुलताबाद होते हुए एलोरा जाने वाले मार्ग पर है। शहर के केंद्रीय बस स्टैंड से एमएसआरटीसी की बसें अक्सर चलती हैं। मुंबई सड़क मार्ग से लगभग 300–350 किलोमीटर दूर है।
दर्शन का सबसे अच्छा समय
अक्टूबर से मार्च का समय सबसे सुहावना है और दर्शन के साथ एलोरा गुफाएँ देखने के लिए आदर्श है; मानसून के बाद के महीने हरे-भरे और ठंडे रहते हैं। सावन और महाशिवरात्रि सबसे शुभ समय हैं, पर लंबी कतारों के लिए तैयार रहें। अप्रैल से जून तक गर्मी रहती है।

तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव

  • पुरुष गर्भगृह में प्रवेश से पहले परंपरा के अनुसार कमीज़ उतारने के लिए तैयार रहें; सभी के लिए शालीन, पारंपरिक वस्त्र उचित हैं।
  • लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर एलोरा गुफाओं की यात्रा भी साथ जोड़ें (गुफाएँ मंगलवार को बंद रहती हैं)।
  • सोमवार, सावन और महाशिवरात्रि पर कतारें लंबी होती हैं; सुबह 5:30 की आरती तक पहुँच जाना अच्छा रहता है।
  • कुछ ही दूर स्थित शिवालय तीर्थ कुंड देखें, और मंदिर में प्रवेश से पहले कोकिला माता के छोटे मंदिर में नमन करें।
  • घुश्मा की कथा का भाव याद रखें: यहाँ भक्त विशेष रूप से धैर्य, क्षमा और संतान के कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा क्या है?

शिव पुराण के अनुसार शिव की अनन्य भक्त घुश्मा रोज़ 101 पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजती थी। उसकी ईर्ष्यालु बहन सुदेहा ने उसके पुत्र की हत्या कर दी, पर घुश्मा ने पूजा जारी रखी और उसका पुत्र सरोवर से जीवित लौट आया। घुश्मा ने शिवजी से बहन को क्षमा करने और सदा वहीं रहने की प्रार्थना की, और वे घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए।

घृष्णेश्वर मंदिर के दर्शन का समय क्या है?

'इनक्रेडिबल इंडिया' पोर्टल के अनुसार मंदिर सुबह 5:30 से रात 9:30 बजे तक खुला रहता है; आरती सुबह 5:30, दोपहर 12, शाम 7 बजे और शयन आरती रात 9:30 बजे होती है। सावन में समय बढ़ा दिया जाता है।

घृष्णेश्वर मंदिर किसने बनवाया?

मूल निर्माताओं का पता नहीं है। मंदिर कई बार टूटा और बना; शिवाजी महाराज के पूर्वज भोसले परिवार ने इसका जीर्णोद्धार कराया, और एक शिलालेख में मालोजी और एकोजी भोसले के नाम हैं। इसका वर्तमान रूप 18वीं सदी में इंदौर की अहिल्याबाई होलकर के संरक्षण में बना।

घृष्णेश्वर मंदिर एलोरा गुफाओं से कितनी दूर है?

मंदिर एलोरा गुफाओं से केवल लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर है, इसलिए दोनों आसानी से साथ देखे जा सकते हैं; छत्रपति संभाजीनगर से यह लगभग 30 किलोमीटर है।

क्या घृष्णेश्वर मंदिर में कोई ड्रेस कोड है?

परंपरा के अनुसार गर्भगृह में प्रवेश के लिए पुरुषों को कमीज़ उतारनी होती है। सभी श्रद्धालुओं के लिए शालीन, पारंपरिक वस्त्र उचित हैं।

स्रोत

द्वादश ज्योतिर्लिंग