गणेश चतुर्थी
गणपति बप्पा घर आते हैं: मोदक, आरती और विदाई के दस दिन
गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्म का उत्सव है, जो भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को, प्रायः अगस्त या सितंबर में, मनाया जाता है। परिवार और मंडल दोपहर के मुहूर्त में गणपति की मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करते हैं, डेढ़ से दस दिन तक पूजा करते हैं, और अनंत चतुर्दशी या उससे पहले 'गणपति बप्पा मोरया' के जयघोष के साथ उनका विसर्जन करते हैं।

गणेश चतुर्थी कब आती है
हर चंद्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी विनायक चतुर्थी होती है, पर भाद्रपद की चतुर्थी गणेश जी के जन्मोत्सव का महापर्व है। अमांत और पूर्णिमांत दोनों पंचांगों में यह महीना भाद्रपद ही कहलाता है, क्योंकि शुक्ल पक्ष दोनों में एक ही महीने का होता है।
माना जाता है कि गणेश जी का जन्म मध्याह्न में हुआ था, इसलिए पंचांग वह दिन चुनते हैं जिसमें दोपहर के समय चतुर्थी तिथि हो, और प्रतिमा-स्थापना व पूजन के लिए मध्याह्न मुहूर्त देते हैं। परंपरा इस चतुर्थी पर चंद्र-दर्शन वर्जित करती है; पंचांग उन घंटों की सूचना देते हैं। उत्सव दस दिन बाद अनंत चतुर्दशी पर पूरा होता है, हालाँकि बहुत-से परिवार डेढ़, तीन, पाँच या सात दिन बाद ही गणपति का विसर्जन कर देते हैं।
उत्सव की कथाएँ
सबसे प्रसिद्ध जन्म-कथा शिव पुराण (रुद्र संहिता, कुमार खंड) में है। माता पार्वती ने अपना एक निष्ठावान सेवक चाहा, तो स्नान के समय लगाए उबटन से एक बालक गढ़ा, उसमें प्राण डाले और उसे द्वार पर पहरे पर बिठा दिया। भगवान शिव आए और बालक ने उन्हें भीतर नहीं जाने दिया; युद्ध हुआ जिसमें शिव के गण बालक को परास्त न कर सके, और अंततः शिव ने स्वयं उसका सिर काट दिया। शोकाकुल पार्वती को सांत्वना देने के लिए शिव ने उत्तर दिशा की ओर मुख किए पहले मिले प्राणी, एक हाथी, का सिर बालक के धड़ पर लगवाया, उसे जीवित किया और गणों का अधिपति 'गणपति' बनाकर यह वरदान दिया कि सब देवताओं से पहले उनकी पूजा होगी। अन्य पुराणों में कथा भिन्न है: उदाहरण के लिए ब्रह्मवैवर्त पुराण में बालक का सिर शनि की दृष्टि से नष्ट होता है।
दूसरी कथा बताती है कि इस रात चंद्रमा क्यों नहीं देखा जाता। मोदकों से तृप्त गणेश जी भोज से लौटते हुए लड़खड़ाए तो चंद्रमा हँस पड़ा। गणेश जी ने चंद्रमा को शाप दिया; बाद में शाप हल्का हुआ, पर मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चाँद देखने वाले पर झूठा कलंक लग सकता है (मिथ्या दोष)। परंपरा इसे स्यमंतक मणि की कथा से जोड़ती है: कहते हैं श्रीकृष्ण ने इस रात चंद्रमा देखा और उन पर मणि चुराने का झूठा आरोप लगा, जिसे उन्होंने नारद जी की सलाह पर गणेश पूजन करके दूर किया।
इतिहास की दृष्टि से गणेश चतुर्थी 1890 के दशक तक मुख्यतः घरेलू पर्व था, जब पुणे में सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू हुए। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 से अपने समाचार-पत्र 'केसरी' के माध्यम से इसे बढ़ावा दिया और उस समय, जब अंग्रेज़ी शासन राजनीतिक सभाओं पर रोक लगाता था, इसे बड़े सामुदायिक मेल-मिलाप का रूप दिया।
पूजा-विधि: स्थापना से विसर्जन तक
घरों और मंडलों की रीति अलग-अलग होती है। घरों में प्रचलित एक सामान्य क्रम:
- 1. गणपति का आगमन
- चतुर्थी को या एक शाम पहले मिट्टी की प्रतिमा का मुख ढककर घर लाएँ और पूर्व या पश्चिम की ओर मुख करके सजे हुए ऊँचे आसन पर रखें।
- 2. मध्याह्न में स्थापना
- दोपहर के मुहूर्त में संकल्प लें, स्थान को पवित्र करें, कलश स्थापित करें और प्रतिमा में गणेश जी का आवाहन व प्राण-प्रतिष्ठा करें।
- 3. षोडशोपचार पूजा
- सोलह उपचार अर्पित करें: आसन, जल, पंचामृत स्नान, वस्त्र, जनेऊ, चंदन, लाल फूल (विशेषकर जासवंद/गुड़हल), दूर्वा, धूप, दीप और नैवेद्य।
- 4. दूर्वा और मोदक
- गणेश जी को प्रिय 21 दूर्वा और 21 मोदक अर्पित करें।
- 5. पाठ और आरती
- गणपति अथर्वशीर्ष या गणेश स्तोत्र का पाठ करें और रोज़ सुबह-शाम आरती करें, जैसे महाराष्ट्र में 'सुखकर्ता दुखहर्ता' या उत्तर भारत में 'जय गणेश देवा'।
- 6. उत्तरपूजा
- विदाई के दिन अंतिम पूजा करें, दही-चावल या विदाई का भोजन अर्पित करें और पूजा में हुई किसी भी कमी के लिए क्षमा माँगें।
- 7. विसर्जन
- गणपति को शोभायात्रा में ले जाकर जल में विसर्जित करें और कहें 'गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या' (अगले बरस जल्दी आना)। आजकल बहुत-से लोग घर में टब या कृत्रिम तालाब में विसर्जन करते हैं।
व्रत और नियम
गणेश चतुर्थी व्रत से अधिक उत्सव और भोज का पर्व है, फिर भी कई भक्त चतुर्थी को दोपहर की पूजा तक उपवास रखते हैं या पूरे दिन फलाहार करते हैं। जितने दिन गणपति घर में रहते हैं, घर में प्याज़, लहसुन और मांस रहित सात्त्विक भोजन बनता है, और प्रतिमा को कभी अकेला या अँधेरे में नहीं छोड़ा जाता। परंपरा से गणेश जी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती। जो चतुर्थी की रात भूल से चाँद देख लें, वे परंपरा के अनुसार उपाय के रूप में स्यमंतक मणि की कथा सुनते या पढ़ते हैं।
गणपति के मंत्र
गणपति अथर्वशीर्ष, जो उत्सव के दौरान रोज़ पढ़ा जाने वाला एक परवर्ती उपनिषद है, गणेश जी को परम सत्य का प्रत्यक्ष रूप बताकर आरंभ होता है। इसी में आने वाली गणेश गायत्री पूजा के आरंभ में जपी जाती है।
हरिः ॐ नमस्ते गणपतये । त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि । त्वमेव केवलं कर्ताऽसि । त्वमेव केवलं धर्ताऽसि । त्वमेव केवलं हर्ताऽसि ।
hariḥ oṃ namas te gaṇapataye | tvam eva pratyakṣaṃ tattvam asi | tvam eva kevalaṃ kartā'si | tvam eva kevalaṃ dhartā'si | tvam eva kevalaṃ hartā'si |
अर्थ: ॐ, हे गणपति, आपको नमस्कार। आप ही प्रत्यक्ष तत्त्व हैं। आप ही एकमात्र सृष्टिकर्ता, आप ही पालनकर्ता और आप ही संहारकर्ता हैं। (गणपति अथर्वशीर्ष 1)
एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥
ekadantāya vidmahe vakratuṇḍāya dhīmahi | tan no dantiḥ pracodayāt ||
अर्थ: हम एकदंत को जानते हैं, वक्रतुंड का ध्यान करते हैं। वे दंती (गणेश) हमें प्रेरणा दें। (गणेश गायत्री, गणपति अथर्वशीर्ष 8)
देश भर में गणेशोत्सव
महाराष्ट्र गणेशोत्सव का हृदय है। मुंबई के लालबागचा राजा जैसे मंडलों में अपार भीड़ उमड़ती है, और अनंत चतुर्दशी पर गिरगाँव चौपाटी व अन्य तटों तक की शोभायात्राएँ रात भर चलती हैं। पुणे के 'मानाचे' (सम्मानित) गणपति विसर्जन यात्रा की अगुवाई करते हैं। बहुत-से मराठी और कोंकणी घरों में गणेश जी की माता गौरी का भी तीन दिन के लिए स्वागत होता है। गोवा में 'चवथ' सबसे बड़ा पारिवारिक पर्व है, जहाँ मिट्टी के गणपति के ऊपर फल-सब्ज़ियों का मंडप (माटोळी) सजता है। कर्नाटक में एक दिन पहले गौरी हब्बा मनाया जाता है। तमिलनाडु में विनायक चतुर्थी पर कोझुकट्टै बनते हैं; आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विशाल सार्वजनिक प्रतिमाएँ लगती हैं, जिनमें हैदराबाद के खैरताबाद गणेश सबसे ऊँचों में गिने जाते हैं। दुनिया भर में प्रवासी भारतीय भी यह पर्व मनाते हैं।
पकवान और रीति-रिवाज
चावल के आटे में नारियल-गुड़ भरकर भाप में पकाया 'उकडीचे मोदक' महाराष्ट्र में गणेश जी का सबसे प्रिय भोग है; तले मोदक, कोझुकट्टै, करंजी, लड्डू, पंचखाद्य और पूरन पोली भी बनते हैं। घरों में पर्यावरण-अनुकूल मखर (मंडप) सजते हैं और पड़ोसी एक-दूसरे के गणपति के दर्शन करने जाते हैं। प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की प्रतिमाएँ और रासायनिक रंग नदियों-समुद्र को प्रदूषित करते हैं, इसलिए बहुत-से परिवार फिर से पारंपरिक शाडू मिट्टी या प्राकृतिक सामग्री की छोटी प्रतिमाओं और घर या कृत्रिम तालाब में विसर्जन की ओर लौटे हैं।
आज गणेश चतुर्थी का अर्थ
गणेश जी आरंभ, बुद्धि और विघ्न-निवारण के देवता हैं, जिनकी हर हिंदू अनुष्ठान में सबसे पहले पूजा होती है। यह पर्व उन्हें प्रिय अतिथि की तरह घर बुलाता है और आँसुओं के साथ विदा करता है, जो हर साल मोह और त्याग का एक पाठ है। जल में लौटती मिट्टी की प्रतिमा याद दिलाती है कि हर रूप धरती से जन्मता है और उसी में लौट जाता है। और 1890 के दशक में जन्मा सार्वजनिक गणेशोत्सव आज भी दिखाता है कि आस्था पूरे मोहल्ले को वर्ग और जाति से ऊपर उठकर एक कर सकती है।
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
गणेश चतुर्थी कब है? तिथि कैसे तय होती है?
यह भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी है, जिसे इस तरह चुना जाता है कि मध्याह्न में चतुर्थी तिथि हो। यह अगस्त या सितंबर में आती है। द्रिक पंचांग के अनुसार 2027 में नई दिल्ली के लिए शनिवार, 4 सितंबर।
गणपति स्थापना का मुहूर्त क्या है?
स्थानीय पंचांग में दिया गया चतुर्थी का मध्याह्न (दोपहर) मुहूर्त गणेश स्थापना और पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
गणेश चतुर्थी पर चाँद क्यों नहीं देखना चाहिए?
परंपरा के अनुसार गणेश जी ने उपहास करने पर चंद्रमा को शाप दिया था, और इस रात चाँद देखने से झूठा कलंक (मिथ्या दोष) लगने की मान्यता है, जैसा श्रीकृष्ण की स्यमंतक मणि कथा में हुआ।
गणपति विसर्जन किस दिन करें?
परिवार अपनी परंपरा के अनुसार डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन चुनते हैं। दसवाँ दिन अनंत चतुर्दशी है।
गणेश जी को दूर्वा क्यों चढ़ाते हैं?
दूर्वा गणेश जी को विशेष प्रिय मानी जाती है, और पूजा में परंपरा से 21 दूर्वा अर्पित की जाती हैं।
सार्वजनिक गणेशोत्सव किसने शुरू किया?
1890 के दशक में पुणे में सार्वजनिक उत्सव शुरू हुए। लोकमान्य तिलक ने 1893 से 'केसरी' के माध्यम से इन्हें बढ़ावा दिया; कुछ इतिहासकार भाऊसाहेब रंगारी को इससे पहले की सार्वजनिक स्थापना का श्रेय भी देते हैं।
स्रोत
- https://sa.wikisource.org/wiki/गणपत्यथर्वशीर्षम्
- https://www.drikpanchang.com/festivals/ganesh-chaturthi/ganesh-chaturthi-date-time.html
- https://www.drikpanchang.com/calendars/hindu/hinducalendar.html?year=2027
- https://www.brut.media/in/articles/ganesh-chaturthi-was-once-mostly-a-private-celebration-who-took-it-to-the-streets-in-the-1890s
- https://en.wikipedia.org/wiki/Ganesh_Chaturthi
अंतिम शोध: 2026-10-29