करवा चौथ
चंद्रोदय पर पूरा होने वाला दिन भर का व्रत, जीवनसाथी की लंबी आयु के लिए
करवा चौथ उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत में मुख्यतः विवाहित स्त्रियों द्वारा कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को रखा जाने वाला व्रत है, जो दीपावली से लगभग नौ-ग्यारह दिन पहले आता है। स्त्रियाँ सूर्योदय से प्रायः निर्जल व्रत रखती हैं, शाम को मिट्टी के करवे के साथ माता गौरी, शिव और गणेश की पूजा करती हैं, और चंद्रमा के दर्शन कर उसे अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं।

करवा चौथ कब आती है
करवा चौथ पूर्णिमा के बाद की चौथी तिथि को आती है, उस महीने में जिसे उत्तर भारत कार्तिक कहता है; पश्चिम और दक्षिण के अमांत पंचांग में यही रात आश्विन मास की होती है। यह प्रायः दीपावली से नौ-ग्यारह दिन पहले और अहोई अष्टमी से चार दिन पहले पड़ती है, जो माताएँ संतान के लिए रखती हैं।
व्रत चंद्र-दर्शन से खुलता है, इसलिए निर्णायक चंद्रोदय है: पंचांग वह दिन चुनते हैं जिसमें चंद्रोदय के समय चतुर्थी तिथि हो, और हर शहर के लिए संध्या पूजा का मुहूर्त व चंद्रोदय का अनुमानित समय देते हैं। कृष्ण चतुर्थी का चाँद अँधेरा होने के काफ़ी बाद निकलता है, उत्तर भारत में अक्सर रात आठ से नौ के बीच। यह रात संकष्टी चतुर्थी भी होती है, यानी कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का मासिक गणेश व्रत।
व्रत की कथाएँ
करवा चौथ किसी प्राचीन शास्त्र में विहित व्रत से अधिक एक लोक-व्रत है, और इसकी कथाएँ शाम की उस व्रत कथा में सुनाई जाती हैं जिसे स्त्रियाँ साथ बैठकर सुनती हैं।
वीरावती की कथा। सबसे प्रसिद्ध कथा रानी वीरावती की है, जो सात भाइयों की इकलौती बहन थी और जिसने अपना पहला करवा चौथ मायके में रखा। शाम होते-होते वह भूख-प्यास से बेहाल हो गई। भाइयों से यह देखा न गया; उन्होंने पेड़ के पीछे आग जलाकर छलनी से उसकी रोशनी दिखाई और कहा कि चाँद निकल आया है। वीरावती ने व्रत खोल लिया, और जल्द ही उसे पति की मृत्यु का समाचार मिला। शोक में डूबी वीरावती ने अगले वर्ष पूरी श्रद्धा से व्रत रखा, और देवी की कृपा से उसके पति को फिर जीवन मिला।
करवा की कथा। एक और कथा करवा नाम की पतिव्रता स्त्री की है, जिसके पति को नहाते समय मगरमच्छ ने पकड़ लिया। उसने कच्चे सूत से मगरमच्छ को बाँध दिया और यमराज से माँग की कि वे मगर को दंड दें और उसके पति को छोड़ दें। उसके सतीत्व के तेज से डरकर यमराज ने बात मान ली। व्रत का नाम उसी से भी जुड़ा माना जाता है और मिट्टी के करवे से भी।
कुछ कथाएँ इसे द्रौपदी से जोड़ती हैं, जिसने पांडवों के संकट में श्रीकृष्ण के कहने पर यह व्रत रखा, और कुछ सावित्री से, जिसने महाभारत में अपनी निष्ठा से यमराज से सत्यवान के प्राण वापस लिए।
इतिहासकार और समाजशास्त्री दूसरे कारण भी बताते हैं: दूर युद्ध पर गए सैनिकों की पत्नियों की प्रार्थना, उन मिट्टी के करवों से जुड़ा फ़सल का अनुष्ठान जिनमें गेहूँ रखा जाता था, और नई बहू द्वारा ससुराल के गाँव में किसी स्त्री को जीवन भर की 'धर्म-बहन' बनाने की प्रथा, जिसके साथ करवे बदले जाते थे।
पूजा-विधि, क्रम से
पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में और परिवारों के बीच रीति अलग-अलग है। सामान्य क्रम:
- 1. भोर में सरगी
- सूर्योदय से पहले स्त्री सरगी खाती है, जो परंपरा से सास भेजती है: फल, मिठाई, मठरी, फेनियाँ और मेवे। इसके बाद व्रत शुरू होता है।
- 2. व्रत का दिन
- व्रत प्रायः निर्जल होता है, यानी न अन्न न जल। स्त्रियाँ मेहँदी लगाती हैं, दुल्हन जैसे या लाल-सुनहरे वस्त्र पहनती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं।
- 3. थाली और करवा तैयार करें
- पूजा की थाली में दीपक, रोली, अक्षत, मिठाई, छलनी और जल रखें। टोंटी वाला मिट्टी या धातु का करवा जल या अनाज से भरें। कुछ घरों में चंद्रमा सहित गौरी (चौथ माता) का चित्र बनाया या लगाया जाता है, या मिट्टी से शिव, पार्वती और गणेश की छोटी प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं।
- 4. संध्या पूजा और कथा
- दोपहर बाद या शाम को स्त्रियाँ घेरे में बैठकर गौरी और गणेश की पूजा करती हैं और किसी बुज़ुर्ग स्त्री या पुरोहित से करवा चौथ की कथा सुनती हैं।
- 5. थाली फेरना
- पंजाब और अन्य जगहों पर स्त्रियाँ पारंपरिक गीत गाते हुए अपनी थालियाँ घेरे में सात बार घुमाती हैं; उत्तर प्रदेश और राजस्थान में करवे बदले जाते हैं।
- 6. चंद्रोदय
- चाँद निकलने पर स्त्री छलनी से या जल में उसका प्रतिबिंब देखती है, करवे से अक्षत और फूल के साथ चंद्रमा को अर्घ्य देती है, और फिर छलनी से पति का चेहरा देखती है।
- 7. व्रत खोलना
- पति उसे पहला घूँट पानी और मिठाई का कौर देता है, और वह बड़ों के पैर छूती है। सास को मिठाई, वस्त्र और मेवे का 'बायना' दिया जाता है।
व्रत के नियम
पारंपरिक व्रत सूर्योदय से चंद्रोदय तक बिना अन्न-जल के रखा जाता है। आजकल बहुत-सी स्त्रियाँ, विशेषकर गर्भवती, स्तनपान कराने वाली, बुज़ुर्ग या अस्वस्थ स्त्रियाँ, दिन में जल, फल या दूध ले लेती हैं; डॉक्टर और धर्माचार्य दोनों ही व्रत को स्वास्थ्य के अनुसार ढालने की सलाह देते हैं। स्त्रियाँ प्रायः दिन में सोने, सिलाई या कैंची से काटने और झगड़े से बचती हैं। बादल होने पर परिवार पंचांग के चंद्रोदय समय पर भरोसा करते हैं या चाँद दिखने तक प्रतीक्षा करते हैं। अविवाहित कन्याएँ कभी-कभी भावी पति के लिए यह व्रत रखती हैं, और आजकल बहुत-से पति भी पत्नी के साथ व्रत रखते हैं।
प्रादेशिक रीतियाँ
पंजाब में शाम के घेरे में थालियाँ फेरते हुए गीत गाए जाते हैं, और बहू का पहला करवा चौथ परिवार का बड़ा उत्सव होता है। राजस्थान में जल अर्पित करते समय व्रती स्त्री से पूछा जाता है 'धापी कि न धापी?' (तृप्त हुईं?), और वह उत्तर देती है कि जल से तृप्त हूँ, पर सुहाग से कभी नहीं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में स्त्रियाँ दीवार पर गौरी, चंद्रमा, सूर्य और घर-गृहस्थी के चित्र बनाती हैं, और पिछली शाम दूध में सूत फेनी खाती हैं। हिमाचल और जम्मू में संध्या पूजा प्रायः स्थानीय मंदिर में होती है। आंध्र प्रदेश में इससे मिलता-जुलता स्त्रियों का पर्व 'अट्ला तद्दी' मनाया जाता है।
पकवान और रीति-रिवाज
दिन भर ऊर्जा बनाए रखने के लिए सरगी में दूध के साथ फेनियाँ या सूत फेनी, मठरी, फल और मेवे होते हैं। रात में व्रत परिवार की पसंद के भोजन से खुलता है, प्रायः पूरी, कचौरी, सब्ज़ी, खीर और हलवा। त्योहार से पहले के दिनों में बाज़ार करवों, छलनियों, चूड़ियों, मेहँदी लगाने वालों और पूजा की थालियों से भर जाते हैं। विवाहित बेटियों को प्रायः मायके से उपहार मिलते हैं, और सास को बायना दिया जाता है।
आज करवा चौथ का अर्थ
मूल रूप से करवा चौथ जीवनसाथी के प्रति प्रेम और परवाह का संकल्प है, जो संयम और प्रार्थना से निभाया जाता है। यह मोहल्ले की स्त्रियों को साझा पूजा, गीत और आपसी सहारे की एक शाम के लिए भी एकत्र करता है। जैसे-जैसे परिवार बदले हैं, यह पर्व भी बदला है: दंपती अधिक-से-अधिक साथ व्रत रखते हैं, बहुत-सी स्त्रियाँ स्वास्थ्य के लिए हल्का व्रत रखती हैं, और जो स्त्रियाँ इसे न मनाना चुनें, उनके निर्णय का भी सम्मान होता है। छलनी से दिखता वह चाँद, जो व्रत पूरा करता है, आज भी उत्तर भारत में दांपत्य-निष्ठा की सबसे प्रिय छवियों में से एक है।
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
करवा चौथ कब है? चाँद कितने बजे निकलेगा?
यह कार्तिक (पूर्णिमांत) कृष्ण चतुर्थी है, जो प्रायः दीपावली से नौ-ग्यारह दिन पहले आती है। द्रिक पंचांग के अनुसार 2027 में नई दिल्ली के लिए सोमवार, 18 अक्टूबर। चंद्रोदय का समय शहर के अनुसार बदलता है, स्थानीय पंचांग देखें।
सरगी क्या है?
भोर से पहले का भोजन, जो परंपरा से सास भेजती है, जिसमें मिठाई, फल, मठरी और फेनियाँ होती हैं, और जिसे व्रत शुरू होने से पहले खाया जाता है।
करवा चौथ पर छलनी से चाँद क्यों देखते हैं?
यह वीरावती की कथा से जुड़ी रीति है, जिसमें छलनी से नकली चाँद दिखाया गया था। स्त्रियाँ छलनी से असली चाँद और फिर पति को देखती हैं।
क्या करवा चौथ व्रत में पानी पी सकते हैं?
पारंपरिक व्रत निर्जल है, पर गर्भवती, स्तनपान कराने वाली, बुज़ुर्ग या अस्वस्थ स्त्रियाँ प्रायः जल या फल लेती हैं। व्रत अपने स्वास्थ्य के अनुरूप रखें।
करवा चौथ पर किसकी पूजा होती है?
माता गौरी (पार्वती, जिन्हें चौथ माता भी कहते हैं) की, शिव, गणेश और कार्तिकेय के साथ, और व्रत के अंत में चंद्रमा की।
स्रोत
- https://www.drikpanchang.com/calendars/hindu/hinducalendar.html?year=2027
- https://en.wikipedia.org/wiki/Karva_Chauth
अंतिम शोध: 2026-10-29