मेरी श्रद्धा

हनुमान चालीसा

गोस्वामी तुलसीदास की चालीस चौपाइयों में श्रीराम के दूत का यशगान

हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी) द्वारा अवधी में रचित भक्ति-स्तोत्र है, जिसमें आरम्भ के दो दोहे, चालीस चौपाइयाँ और अन्त में एक दोहा है। इसमें हनुमानजी के बल, बुद्धि और रामभक्ति का गान है। करोड़ों श्रद्धालु इसका रोज़ पाठ करते हैं, विशेषकर मंगलवार और शनिवार को, एक, सात, ग्यारह या 108 बार।

हनुमान चालीसा
Suyash Dwivedi, devotees reciting the Hanuman Chalisa on Hanuman Jayanti, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 Wikimedia Commons

हनुमान चालीसा के बारे में

'चालीसा' शब्द 'चालीस' से बना है: इसमें चालीस चौपाइयाँ हैं, आरम्भ और अन्त के दोहों को छोड़कर। यह हनुमानजी की सबसे लोकप्रिय स्तुति है। रामायण में हनुमानजी श्रीराम के दूत, वीर योद्धा और निःस्वार्थ सेवा के आदर्श के रूप में पूजित हैं। बहुत से हिन्दुओं को यह कण्ठस्थ है और भारत तथा विदेशों में घरों, मन्दिरों और सत्संगों में इसका पाठ होता है।

नीचे दिया गया पाठ प्रचलित पाठ है, जो sanskritdocuments.org के संस्करण से लिया गया है और हर पंक्ति को जगद्गुरु रामभद्राचार्य के महावीरी टीका वाले समालोचनात्मक संस्करण (1983-84) से मिलाया गया है। स्पष्ट टंकण-त्रुटियाँ सुधारी गई हैं। जहाँ दोनों में शब्दों का अन्तर है (केवल वर्तनी का नहीं), वहाँ श्लोकों में प्रचलित पाठ रखा गया है और रामभद्राचार्य का पाठ 'पाठभेद' खण्ड में दिया गया है।

आरम्भ के दोहे

चालीसा दो दोहों से आरम्भ होती है। पहला दोहा 'श्रीगुरु चरन सरोज रज' तुलसीदास के रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड का भी आरम्भिक दोहा है। इसमें श्रीराम का यश गाने से पहले मन रूपी दर्पण को निर्मल करने की बात है। दूसरे दोहे में हनुमानजी से बल, बुद्धि और विद्या माँगी गई है।

  1. श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

    śrīguru carana saroja raja nija manu mukuru sudhāri | baranaum̐ raghubara bimala jasu jo dāyaku phala cāri ||

    अर्थ: श्री गुरुदेव के चरण-कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को निर्मल करके मैं श्री रघुवीर के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों फल देने वाला है।

  2. बुद्धिहीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार । बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥

    buddhihīna tanu jānikai sumirauṃ pavanakumāra | bala budhi bidyā dehu mohiṃ harahu kalesa bikāra ||

    अर्थ: स्वयं को बुद्धिहीन जानकर मैं पवनपुत्र हनुमान का स्मरण करता हूँ। हे प्रभु, मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए और मेरे क्लेश तथा विकार हर लीजिए।

चौपाई 1–10: हनुमानजी का स्वरूप और गुण

पहली दस चौपाइयों में हनुमानजी के नाम, माता-पिता, स्वर्ण-वर्ण रूप, बल, विद्या और लंका में उनके आरम्भिक पराक्रम का वर्णन है।

  1. जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥

    jaya hanumāna jñāna guna sāgara | jaya kapīsa tihum̐ loka ujāgara ||

    अर्थ: हे हनुमान, आपकी जय हो; आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं। हे कपीश, आपकी जय हो; आप तीनों लोकों में प्रकाशमान हैं।

  2. राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनिपुत्र पवनसुत नामा ॥

    rāma dūta atulita bala dhāmā | aṃjaniputra pavanasuta nāmā ||

    अर्थ: आप श्रीराम के दूत और अतुलनीय बल के धाम हैं; अंजनीपुत्र और पवनसुत आपके नाम हैं।

  3. महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥

    mahābīra bikrama bajaraṃgī | kumati nivāra sumati ke saṃgī ||

    अर्थ: हे महावीर, आप पराक्रमी और वज्र के समान अंगों वाले हैं; आप कुबुद्धि को दूर करते हैं और सद्बुद्धि वालों के साथी हैं।

  4. कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुंचित केसा ॥

    kaṃcana barana birāja subesā | kānana kuṃḍala kuṃcita kesā ||

    अर्थ: आपका रंग सोने जैसा है, आप सुन्दर वेश में सुशोभित हैं; कानों में कुण्डल और घुँघराले केश हैं।

  5. हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै । काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥

    hātha bajra au dhvajā birājai | kām̐dhe mūm̐ja janeū sājai ||

    अर्थ: आपके हाथों में वज्र (गदा) और ध्वजा शोभित है, और कन्धे पर मूँज का जनेऊ सजा है।

  6. संकर सुवन केसरीनंदन । तेज प्रताप महा जग बंदन ॥

    saṃkara suvana kesarīnaṃdana | teja pratāpa mahā jaga baṃdana ||

    अर्थ: आप शंकर के अंश (सुवन) और केसरी के नन्दन हैं; आपका तेज और प्रताप महान है, सारा जगत आपकी वन्दना करता है।

  7. विद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥

    vidyāvāna gunī ati cātura | rāma kāja karibe ko ātura ||

    अर्थ: आप विद्यावान, गुणवान और अत्यन्त चतुर हैं, और श्रीराम का कार्य करने को सदा तत्पर रहते हैं।

  8. प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥

    prabhu caritra sunibe ko rasiyā | rāma lakhana sītā mana basiyā ||

    अर्थ: आप प्रभु का चरित्र सुनने के रसिक हैं; श्रीराम, लक्ष्मण और सीता आपके हृदय में बसते हैं।

  9. सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥

    sūkṣma rūpa dhari siyahiṃ dikhāvā | bikaṭa rūpa dhari laṃka jarāvā ||

    अर्थ: आपने सूक्ष्म रूप धारण करके सीताजी को दर्शन दिए और विकराल रूप धारण करके लंका को जला दिया।

  10. भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचंद्र के काज सँवारे ॥

    bhīma rūpa dhari asura sam̐hāre | rāmacaṃdra ke kāja sam̐vāre ||

    अर्थ: आपने भीम (विशाल) रूप धारण करके असुरों का संहार किया और श्रीरामचन्द्र के कार्य पूरे किए।

चौपाई 11–20: रामकाज में पराक्रम

इन चौपाइयों में संजीवनी लाकर लक्ष्मणजी को जीवित करना, श्रीराम का आलिंगन और प्रशंसा, सुग्रीव और विभीषण पर उपकार, बचपन में सूर्य को निगलना और मुद्रिका लेकर समुद्र लाँघना वर्णित है।

  1. लाय सजीवन लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥

    lāya sajīvana lakhana jiyāye | śrīraghubīra haraṣi ura lāye ||

    अर्थ: आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मणजी को जीवित किया, जिससे प्रसन्न होकर श्री रघुवीर ने आपको हृदय से लगा लिया।

  2. रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥

    raghupati kīnhī bahuta baṛāī | tuma mama priya bharatahi sama bhāī ||

    अर्थ: श्री रघुनाथजी ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा: 'तुम मुझे भरत के समान प्रिय भाई हो।'

  3. सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥

    sahasa badana tumharo jasa gāvaiṃ | asa kahi śrīpati kaṃṭha lagāvaiṃ ||

    अर्थ: 'हज़ार मुखों वाले शेषनाग तुम्हारा यश गाएँ', ऐसा कहकर लक्ष्मीपति श्रीराम ने आपको गले लगा लिया।

  4. सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥

    sanakādika brahmādi munīsā | nārada sārada sahita ahīsā ||

    अर्थ: सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देवता, श्रेष्ठ मुनि, नारद, सरस्वती और शेषनाग …

  5. जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥

    jama kubera digapāla jahām̐ te | kabi kobida kahi sake kahām̐ te ||

    अर्थ: … यम, कुबेर और दिक्पाल भी जब आपका यश पूरा नहीं कह सकते, तो कवि और विद्वान कैसे कह सकेंगे?

  6. तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥

    tuma upakāra sugrīvahiṃ kīnhā | rāma milāya rāja pada dīnhā ||

    अर्थ: आपने सुग्रीव पर उपकार किया; उन्हें श्रीराम से मिलाकर राजपद दिलाया।

  7. तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना । लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥

    tumharo maṃtra bibhīṣana mānā | laṃkesvara bhae saba jaga jānā ||

    अर्थ: आपकी सलाह विभीषण ने मानी और वे लंका के राजा बने, यह सारा संसार जानता है।

  8. जुग सहस्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥

    juga sahasra jojana para bhānū | līlyo tāhi madhura phala jānū ||

    अर्थ: हज़ारों योजन दूर स्थित सूर्य को आपने मीठा फल समझकर निगल लिया था।

  9. प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥

    prabhu mudrikā meli mukha māhīṃ | jaladhi lām̐ghi gaye acaraja nāhīṃ ||

    अर्थ: प्रभु की अँगूठी मुँह में रखकर आप समुद्र लाँघ गए; इसमें कोई आश्चर्य नहीं।

  10. दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥

    durgama kāja jagata ke jete | sugama anugraha tumhare tete ||

    अर्थ: संसार के जितने भी कठिन कार्य हैं, वे सब आपकी कृपा से सरल हो जाते हैं।

चौपाई 21–30: रक्षा और कृपा

इक्कीसवीं चौपाई से वर्णन भक्त की ओर मुड़ता है: हनुमानजी की शरण, निर्भयता, रोग और संकट से मुक्ति, और मनोरथों की पूर्ति।

  1. राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥

    rāma duāre tuma rakhavāre | hota na ājñā binu paisāre ||

    अर्थ: आप श्रीराम के द्वार के रखवाले हैं; आपकी आज्ञा के बिना वहाँ कोई प्रवेश नहीं कर सकता।

  2. सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रच्छक काहू को डर ना ॥

    saba sukha lahai tumhārī saranā | tuma racchaka kāhū ko ḍara nā ||

    अर्थ: आपकी शरण में आने वाला सब सुख पाता है; जब आप रक्षक हैं तो किसी का डर नहीं।

  3. आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥

    āpana teja samhāro āpai | tīnoṃ loka hām̐ka teṃ kām̐pai ||

    अर्थ: अपने तेज को आप ही सँभाल सकते हैं; आपकी एक हाँक से तीनों लोक काँप उठते हैं।

  4. भूत पिसाच निकट नहिं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥

    bhūta pisāca nikaṭa nahiṃ āvai | mahābīra jaba nāma sunāvai ||

    अर्थ: जहाँ महावीर हनुमान का नाम लिया जाता है, वहाँ भूत-पिशाच निकट नहीं आते।

  5. नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥

    nāsai roga harai saba pīrā | japata niraṃtara hanumata bīrā ||

    अर्थ: वीर हनुमान का निरन्तर जप करने से रोग नष्ट होते हैं और सारी पीड़ा दूर होती है।

  6. संकट तें हनुमान छुड़ावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥

    saṃkaṭa teṃ hanumāna chuṛāvai | mana krama bacana dhyāna jo lāvai ||

    अर्थ: जो मन, कर्म और वचन से हनुमानजी का ध्यान करता है, उसे वे संकटों से छुड़ा देते हैं।

  7. सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥

    saba para rāma tapasvī rājā | tina ke kāja sakala tuma sājā ||

    अर्थ: तपस्वी राजा श्रीराम सबसे श्रेष्ठ हैं, और उनके सब कार्य आपने ही सँवारे।

  8. और मनोरथ जो कोई लावै । सोई अमित जीवन फल पावै ॥

    aura manoratha jo koī lāvai | soī amita jīvana phala pāvai ||

    अर्थ: जो कोई अपनी कोई भी कामना लेकर आपके पास आता है, वह जीवन का असीम फल पाता है।

  9. चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥

    cāroṃ juga paratāpa tumhārā | hai parasiddha jagata ujiyārā ||

    अर्थ: चारों युगों में आपका प्रताप है; आपका प्रकाश सारे संसार में प्रसिद्ध है।

  10. साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥

    sādhu saṃta ke tuma rakhavāre | asura nikaṃdana rāma dulāre ||

    अर्थ: आप साधु-संतों के रक्षक, असुरों का नाश करने वाले और श्रीराम के दुलारे हैं।

चौपाई 31–40: भक्ति का फल

अन्तिम दस चौपाइयों में माता सीता के वरदान, राम-नाम रूपी रसायन, मोक्ष और स्वयं चालीसा-पाठ के फल का वर्णन है। चालीसवीं चौपाई में तुलसीदासजी अपना नाम लेकर हनुमानजी से हृदय में बसने की प्रार्थना करते हैं।

  1. अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ॥

    aṣṭa siddhi nau nidhi ke dātā | asa bara dīna jānakī mātā ||

    अर्थ: आप आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने वाले हैं; यह वरदान आपको माता जानकी ने दिया है।

  2. राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥

    rāma rasāyana tumhare pāsā | sadā raho raghupati ke dāsā ||

    अर्थ: आपके पास राम-नाम रूपी रसायन है; आप सदा श्री रघुनाथजी के दास बने रहें।

  3. तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

    tumhare bhajana rāma ko pāvai | janama janama ke dukha bisarāvai ||

    अर्थ: आपके भजन से श्रीराम की प्राप्ति होती है और जन्म-जन्मान्तर के दुःख भूल जाते हैं।

  4. अंत काल रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥

    aṃta kāla raghubara pura jāī | jahām̐ janma haribhakta kahāī ||

    अर्थ: अन्त समय में वह श्री रघुवीर के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म लेता है, हरिभक्त कहलाता है।

  5. और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥

    aura devatā citta na dharaī | hanumata sei sarba sukha karaī ||

    अर्थ: किसी अन्य देवता का ध्यान न करके भी, केवल हनुमानजी की सेवा से सब सुख प्राप्त होते हैं।

  6. संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥

    saṃkaṭa kaṭai miṭai saba pīrā | jo sumirai hanumata balabīrā ||

    अर्थ: जो बलवीर हनुमानजी का स्मरण करता है, उसके संकट कट जाते हैं और सारी पीड़ा मिट जाती है।

  7. जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरु देव की नाईं ॥

    jai jai jai hanumāna gosāīṃ | kṛpā karahu guru deva kī nāīṃ ||

    अर्थ: हे स्वामी हनुमानजी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप गुरुदेव की भाँति मुझ पर कृपा करें।

  8. जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ॥

    jo sata bāra pāṭha kara koī | chūṭahi baṃdi mahā sukha hoī ||

    अर्थ: जो कोई इसका सौ बार पाठ करता है, वह बन्धनों से छूट जाता है और उसे महान सुख मिलता है।

  9. जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥

    jo yaha paṛhai hanumāna cālīsā | hoya siddhi sākhī gaurīsā ||

    अर्थ: जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि प्राप्त होती है; इसके साक्षी स्वयं गौरीपति शिव हैं।

  10. तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥

    tulasīdāsa sadā hari cerā | kījai nātha hṛdaya maham̐ ḍerā ||

    अर्थ: तुलसीदास सदा श्रीहरि के सेवक हैं; हे नाथ, आप मेरे हृदय में निवास कीजिए।

अन्त का दोहा

चालीसा इस प्रार्थना के साथ पूरी होती है कि हनुमानजी श्रीराम, लक्ष्मण और सीता सहित हृदय में निवास करें।

  1. पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप । राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥

    pavanatanaya saṃkaṭa harana maṃgala mūrati rūpa | rāma lakhana sītā sahita hṛdaya basahu sura bhūpa ||

    अर्थ: हे संकट हरने वाले पवनपुत्र, आप मंगल की मूर्ति हैं। हे देवराज, आप श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए।

रचयिता और इतिहास

हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी) माने जाते हैं, जिन्होंने रामचरितमानस की रचना की। वे वाराणसी में रहे और वहाँ के संकटमोचन हनुमान मन्दिर से उनका नाम जुड़ा है। यह मान्यता लम्बी परम्परा और चालीसवीं चौपाई की छाप 'तुलसीदास सदा हरि चेरा' पर आधारित है। चालीसा की रचना को तुलसीदासजी के जीवन की कुछ घटनाओं से जोड़ने वाली कथाएँ लोक-श्रद्धा का अंग हैं, प्रमाणित इतिहास नहीं।

विद्वान बताते हैं कि तुलसीदास की ग्रन्थावली के आरम्भिक मुद्रित संस्करणों में चालीसा शामिल नहीं थी, और रामभद्राचार्य के अनुसार 1980 के दशक से पहले इस पर कोई टीका नहीं लिखी गई थी। उनकी 'महावीरी' टीका (1983) सबसे विस्तृत टीकाओं में गिनी जाती है और उसमें कुछ पाठ प्रचलित पाठ से भिन्न हैं (नीचे देखें)।

पाठभेद

चालीसा मुख्यतः मौखिक परम्परा से चली आई है, इसलिए वर्तनी के छोटे अन्तर (गुन/गुण, कपीस/कपीश) आम हैं। शब्दों के प्रमुख अन्तर ये हैं:

चौपाई 6: 'संकर सुवन केसरीनंदन'
जगद्गुरु रामभद्राचार्य 'शंकर स्वयं केसरीनंदन' पाठ मानते हैं, अर्थात् स्वयं शंकर ही केसरीनन्दन के रूप में हैं; यह हनुमानजी को शिव का अवतार मानने वाली परम्परा के अनुरूप है।
चौपाई 5: 'हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै … जनेऊ साजै'
रामभद्राचार्य के पाठ में 'अरु ध्वजा' और 'जनेऊ छाजै' है; अर्थ वही है।
चौपाई 27: 'सब पर राम तपस्वी राजा'
रामभद्राचार्य का पाठ 'सब पर राम राय सिरताजा' है (राजा राम सबके सिरमौर हैं)।
चौपाई 28: 'सोई अमित जीवन फल पावै'
रामभद्राचार्य का पाठ 'तासु अमित जीवन फल पावै' है।
चौपाई 32: 'सदा रहो रघुपति के दासा'
रामभद्राचार्य का पाठ 'सादर हो रघुपति के दासा' है (आप आदरपूर्वक रघुपति के दास हैं)।
चौपाई 31: 'अस बर दीन जानकी माता'
कुछ संस्करणों में, रामभद्राचार्य के संस्करण सहित, 'दीन' की जगह 'दीन्ह' छपा है; दोनों का अर्थ 'दिया' है।
दूसरा दोहा: 'बल बुधि बिद्या'
कुछ संस्करणों में 'बल बुद्धि बिद्या' है; अर्थ एक ही है।

पाठ-विधि और समय

मंगलवार और शनिवार परम्परा से हनुमानजी के दिन माने जाते हैं, और इन दिनों घरों और मन्दिरों में चालीसा का पाठ होता है; हनुमान जयंती प्रमुख पर्व है। बहुत से भक्त रोज़ सुबह या शाम भी पाठ करते हैं।

1. स्नान करके या हाथ-मुँह धोकर, हनुमानजी (या राम दरबार) के चित्र के सामने स्वच्छ आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। 2. घी या सरसों के तेल का दीपक जलाएँ और फूल चढ़ाएँ; लाल या केसरिया फूल और सिन्दूर हनुमानजी को प्रिय माने जाते हैं। 3. बहुत से लोग पहले राम-नाम लेते हैं, जैसे 'श्रीराम जय राम जय जय राम', क्योंकि हनुमानजी राम-नाम से प्रसन्न होते हैं। 4. दोनों दोहे, चालीस चौपाइयाँ और अन्तिम दोहा बिना जल्दबाज़ी के पढ़ें। 5. अन्त में आरती और छोटी-सी प्रार्थना करें।

पाठ की संख्या संकल्प के अनुसार बदलती है। रोज़ एक पाठ आम है; 3, 7 या 11 पाठ भी प्रचलित हैं। चालीसा स्वयं कहती है कि 'जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई', इसलिए विशेष अवसरों पर सौ या 108 पाठ के आयोजन होते हैं।

परम्परा में वर्णित फल

अन्तिम चौपाइयाँ स्वयं फल बताती हैं: संकट और पीड़ा से मुक्ति (36), बन्धन से छुटकारा (38) और सिद्धि, जिसके साक्षी शिव हैं (39)। भक्तों का विश्वास है कि नियमित पाठ से:

- साहस बढ़ता है और भय दूर होता है, भूत-पिशाच का डर भी (24); - रोग और कठिनाइयों में सहारा मिलता है (25-26); - बल, बुद्धि और विद्या मिलती है, जैसा आरम्भ के दोहे में माँगा गया है; - शनि से जुड़े कष्ट कम होते हैं, इसीलिए शनिवार को पाठ का विशेष चलन है; - श्रीराम के प्रति भक्ति गहरी होती है, जिसे चालीसा सबसे बड़ा फल बताती है (33-34)।

ये श्रद्धा और परम्परा की बातें हैं, किसी निश्चित परिणाम का वादा नहीं। बहुत से लोगों के लिए चालीसा रोज़ का साथी है: कुछ मिनट उस बल का स्मरण, जो भलाई की सेवा में लगा।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

हनुमान चालीसा किसने लिखी?

गोस्वामी तुलसीदास ने, जिन्होंने रामचरितमानस की भी रचना की। चालीसवीं चौपाई में उनका नाम आता है: 'तुलसीदास सदा हरि चेरा'।

हनुमान चालीसा का अर्थ क्या है?

यह हनुमानजी के स्वरूप, बल, बुद्धि और रामभक्ति की स्तुति है, जिसमें श्रीराम के लिए किए गए उनके कार्यों का वर्णन और उनसे रक्षा तथा हृदय में राम के निवास की प्रार्थना है। ऊपर हर दोहे और चौपाई का अर्थ दिया गया है।

हनुमान चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

चालीस चौपाइयाँ, साथ में आरम्भ के दो दोहे और अन्त का एक दोहा: कुल 43 छन्द।

हनुमान चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

कभी भी पढ़ी जा सकती है, पर मंगलवार, शनिवार, सुबह-शाम और हनुमान जयंती परम्परागत रूप से विशेष हैं। बहुत से लोग रोज़ पाठ करते हैं।

हनुमान चालीसा कितनी बार पढ़नी चाहिए?

रोज़ एक बार आम है; 3, 7, 11 या 108 बार भी पढ़ी जाती है। चालीसा स्वयं सौ बार ('सत बार') पाठ का फल बताती है।

क्या महिलाएँ हनुमान चालीसा पढ़ सकती हैं?

हाँ। चालीसा लोकभाषा का भक्ति-स्तोत्र है और स्त्री-पुरुष दोनों इसका पाठ करते हैं। कुछ परिवारों की अपनी परम्पराएँ हैं, जिनका सम्मान किया जाता है।

स्रोत

अंतिम शोध: 2026-10-29

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