अम्बे तू है जगदम्बे काली
नवरात्रि में गूँजने वाली माँ दुर्गा और माँ काली की भावपूर्ण आरती
'अम्बे तू है जगदम्बे काली' देवी की सबसे लोकप्रिय हिन्दी आरतियों में से है, जिसमें उन्हें अम्बा, जगदम्बा, काली और दुर्गा कहकर पुकारा गया है। एक टेक और चार छन्दों में उनके बल, मातृ-प्रेम और रक्षा का गान है। इसे मुख्यतः नवरात्रि, जगराते और शुक्रवार को, हर छन्द के बाद टेक के साथ एक बार गाया जाता है। इसके रचयिता अनिश्चित हैं।

इस आरती के बारे में
यह सरल, भावभरी हिन्दी में रची आधुनिक भक्ति-आरती है। द्रिक पंचांग इसे माँ दुर्गा की सबसे प्रसिद्ध आरती बताता है, जो देवी से जुड़े अधिकांश अवसरों पर गाई जाती है। नीचे दिया गया पाठ द्रिक पंचांग के अनुसार है और अमर उजाला (2025) में छपे पाठ से पंक्ति-दर-पंक्ति मेल खाता है। इसे भक्ति भारत के पाठ से भी मिलाया गया है, जिसमें थोड़ा अन्तर है (नीचे देखें)। एक स्पष्ट टंकण-त्रुटि ('सिहों' की जगह 'सिंहों') सुधारी गई है; बाकी वर्तनी स्रोत के अनुसार रखी गई है। हर छन्द दो भागों में दिया है: पहले तुकान्त दोहा-नुमा पंक्तियाँ, फिर वे पंक्तियाँ जो टेक की ओर ले जाती हैं।
टेक (मुखड़ा)
आरती इसी टेक से आरम्भ होती है, और इसकी अन्तिम पंक्ति 'ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती' हर छन्द के बाद लौटती है। बहुत से लोग छन्दों के बीच पूरी टेक दोहराते हैं।
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली, तेरे ही गुण गावें भारती, ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ।
ambe tū hai jagadambe kālī, jay durge khappar vālī, tere hī guṇ gāveṃ bhāratī, o maiyā ham sab utāre terī āratī |
अर्थ: हे अम्बे, तू ही जगदम्बा है, तू ही काली है; हे खप्पर धारण करने वाली दुर्गे, तेरी जय हो। सारा भारत तेरे ही गुण गाता है; हे मैया, हम सब तेरी आरती उतारते हैं।
छन्द 1: सिंहवाहिनी योद्धा
भक्तों पर संकट आने पर माँ को पुकारा जाता है कि वे सिंह पर सवार होकर बुराई की शक्तियों पर टूट पड़ें।
तेरे भक्त जनो पर माता भीर पड़ी है भारी । दानव दल पर टूट पड़ो माँ करके सिंह सवारी ॥
tere bhakt jano par mātā bhīr paṛī hai bhārī | dānav dal par ṭūṭ paṛo māṃ karake siṃh savārī ||
अर्थ: हे माता, तेरे भक्तों पर भारी संकट आ पड़ा है। हे माँ, सिंह पर सवार होकर दानवों की सेना पर टूट पड़ो।
सौ-सौ सिंहों से बलशाली, है अष्ट भुजाओं वाली, दुष्टों को तू ही ललकारती । ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ॥
sau-sau siṃhoṃ se balaśālī, hai aṣṭa bhujāoṃ vālī, duṣṭoṃ ko tū hī lalakāratī | o maiyā ham sab utāre terī āratī ||
अर्थ: तू सैकड़ों सिंहों से भी बलवान है, आठ भुजाओं वाली है; दुष्टों को तू ही ललकारती है। हे मैया, हम सब तेरी आरती उतारते हैं।
छन्द 2: सबसे निर्मल नाता
आरती की सबसे प्रसिद्ध पंक्तियाँ: सन्तान जैसी भी हो, माँ कभी निष्ठुर नहीं होती।
माँ-बेटे का है इस जग में बड़ा ही निर्मल नाता । पूत-कपूत सुने है पर ना माता सुनी कुमाता ॥
māṃ-beṭe kā hai is jag meṃ baṛā hī nirmal nātā | pūt-kapūt sune hai par nā mātā sunī kumātā ||
अर्थ: इस संसार में माँ और सन्तान का रिश्ता सबसे निर्मल है। कपूत (बुरे पुत्र) तो सुने हैं, पर कुमाता (बुरी माँ) कभी नहीं सुनी।
सब पे करूणा दर्शाने वाली, अमृत बरसाने वाली, दुखियों के दुखड़े निवारती । ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ॥
sab pe karūṇā darśāne vālī, amṛta barasāne vālī, dukhiyoṃ ke dukhaṛe nivāratī | o maiyā ham sab utāre terī āratī ||
अर्थ: तू सब पर करुणा दिखाने वाली और अमृत बरसाने वाली है; दुखियों के दुःख दूर करती है। हे मैया, हम सब तेरी आरती उतारते हैं।
छन्द 3: बस चरणों में एक कोना
ऐसी प्रार्थना जो कुछ भौतिक नहीं माँगती, केवल माँ का सान्निध्य माँगती है।
नहीं मांगते धन और दौलत, न चांदी न सोना । हम तो मांगें तेरे चरणों में छोटा सा कोना ॥
nahīṃ māṃgate dhan aur daulat, na cāṃdī na sonā | ham to māṃgeṃ tere caraṇoṃ meṃ choṭā sā konā ||
अर्थ: हम धन-दौलत नहीं माँगते, न चाँदी, न सोना। हम तो तेरे चरणों में बस एक छोटा-सा कोना माँगते हैं।
सबकी बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचाने वाली, सतियों के सत को संवारती । ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ॥
sabakī bigaṛī banāne vālī, lāj bacāne vālī, satiyoṃ ke sat ko saṃvāratī | o maiyā ham sab utāre terī āratī ||
अर्थ: तू सबकी बिगड़ी बात बनाने वाली और लाज बचाने वाली है; सतियों के सत (पवित्रता) की रक्षा करती है। हे मैया, हम सब तेरी आरती उतारते हैं।
छन्द 4: पूजा की थाली लिए
हाथ में आरती की थाली लिए भक्त माँ से आशीर्वाद और भक्ति से भरे हृदय की याचना करते हैं।
चरण शरण में खड़े तुम्हारी, ले पूजा की थाली । वरद हस्त सर पर रख दो माँ संकट हरने वाली ॥
caraṇ śaraṇ meṃ khaṛe tumhārī, le pūjā kī thālī | varad hast sar par rakh do māṃ saṃkaṭ harane vālī ||
अर्थ: हम पूजा की थाली लेकर तेरे चरणों की शरण में खड़े हैं। हे संकट हरने वाली माँ, अपना वरदायी हाथ हमारे सिर पर रख दो।
माँ भर दो भक्ति रस प्याली, अष्ट भुजाओं वाली, भक्तों के कारज तू ही सारती । ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती ॥
māṃ bhar do bhakti ras pyālī, aṣṭa bhujāoṃ vālī, bhaktoṃ ke kāraj tū hī sāratī | o maiyā ham sab utāre terī āratī ||
अर्थ: हे अष्टभुजा माँ, हमारा प्याला भक्ति-रस से भर दो; भक्तों के काम तू ही पूरे करती है। हे मैया, हम सब तेरी आरती उतारते हैं।
रचयिता कौन? पाठ और पाठभेद
आरती के पाठ में रचयिता का नाम नहीं है, और यह पुराने शास्त्रीय संग्रहों में नहीं मिलती। जून 2025 में अमर उजाला ने हाथरस (उत्तर प्रदेश) के कवियों और साहित्यकारों का यह दावा प्रकाशित किया कि इसे लगभग पचास वर्ष पहले शहर की सीकना पान गली में रहने वाले स्व. राजेंद्र कुमार शर्मा उर्फ़ 'रज्जो गुरु' ने लिखा था। उन्होंने रचनाकार को श्रेय दिलाने के लिए प्रशासन से माँग की, और समाचार के अनुसार आगे की प्रक्रिया से पहले इस दावे पर सार्वजनिक आपत्तियाँ आमंत्रित की जानी थीं। उसी समाचार के अनुसार अनुराधा पौडवाल के गायन से यह आरती घर-घर पहुँची, जिसका उल्लेख भक्ति भारत भी करता है। जब तक इस दावे की आगे जाँच न हो, रचयिता को अनिश्चित मानना ही उचित है।
पाठों में थोड़ा अन्तर है। भक्ति भारत में 'तेरे भक्त जनो पर…' वाला छन्द नहीं है, 'चरण शरण में…' को अतिरिक्त छन्द बताया गया है, 'उतारे' की जगह 'उतरें' है, और 'तेरे चरणों में' की जगह 'हम तो मांगे माँ तेरे मन मे, इक छोटा सा कोना' है।
भाव और संदेश
यह आरती देवी के दो रूपों को जोड़ती है। टेक और पहले छन्द में वे योद्धा काली और दुर्गा हैं: खप्पर धारण किए, अष्टभुजा, सैकड़ों सिंहों से बलवान, और भक्तों पर संकट आने पर सिंह पर सवार होकर दानवों पर टूट पड़ने वाली। दूसरे छन्द से वे सबसे बढ़कर माँ हैं। प्रसिद्ध पंक्ति 'पूत-कपूत सुने है पर ना माता सुनी कुमाता' आदि शंकराचार्य के देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र की प्रसिद्ध उक्ति 'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति' की याद दिलाती है: पुत्र भटक सकता है, पर माँ कभी सन्तान के विरुद्ध नहीं होती। तीसरा छन्द निष्काम प्रार्थना का आदर्श है: न चाँदी, न सोना, बस चरणों में एक छोटा-सा कोना। अन्तिम छन्द भक्तों को पूजा की थाली लिए माँ के सामने खड़ा करता है, जो वरद हस्त और भक्ति-रस से भरा प्याला माँगते हैं।
आरती का समय और विधि
यह आरती दोनों नवरात्रियों (चैत्र और शारदीय) में सुबह-शाम, दुर्गा पूजा में, रात भर के जगरातों और माता की चौकी में, और शुक्रवार तथा मंगलवार को, जो परम्परा से देवी के दिन माने जाते हैं, गाई जाती है।
1. थाली में घी का दीपक या कपूर, लाल फूल, कुमकुम, धूप और हलवा, चना या फल का भोग रखें। 2. दीपक जलाकर, घण्टी बजाते हुए देवी के सामने दक्षिणावर्त घुमाएँ और आरती गाएँ। 3. पहले टेक, फिर हर छन्द गाएँ और हर छन्द के बाद 'ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती' दोहराएँ। 4. सबको आरती दें, फिर भोग लगाकर प्रसाद बाँटें।
प्रायः इसे एक बार पूरा गाया जाता है, और अक्सर इसके बाद देवी की पुरानी आरती 'जय अम्बे गौरी' भी गाई जाती है।
परम्परा में वर्णित फल
आरती स्वयं बताती है कि भक्त माँ से क्या चाहते हैं: संकट में रक्षा, दुखियों के दुःख का निवारण, बिगड़ी बात का बनना, लाज की रक्षा, और सबसे बढ़कर भक्ति। भक्तों का विश्वास है कि प्रेम से, विशेषकर नवरात्रि में, यह आरती गाने से देवी की कृपा और कठिन समय में साहस मिलता है। ये श्रद्धा की बातें हैं; बहुत से परिवारों के लिए यह आरती घर में नवरात्रि की पहचान है।
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
'अम्बे तू है जगदम्बे काली' आरती किसने लिखी?
रचयिता अनिश्चित हैं। हाथरस के साहित्यकारों का दावा है कि इसे लगभग पचास वर्ष पहले स्व. राजेंद्र कुमार शर्मा 'रज्जो गुरु' ने लिखा था (अमर उजाला, 2025)। अनुराधा पौडवाल के गायन से यह बहुत लोकप्रिय हुई।
यह दुर्गा जी की आरती है या काली माँ की?
दोनों की: इसमें देवी को अम्बा, जगदम्बा, काली और दुर्गा कहा गया है, और इसे माँ दुर्गा तथा माँ काली की आरती के रूप में गाया जाता है।
यह आरती कब गाई जाती है?
विशेषकर चैत्र और शारदीय नवरात्रि, दुर्गा पूजा और जगरातों में, तथा शुक्रवार और मंगलवार को देवी-पूजा के अन्त में।
'पूत-कपूत सुने है पर ना माता सुनी कुमाता' का अर्थ क्या है?
'कपूत (बुरे पुत्र) तो सुने हैं, पर कुमाता (बुरी माँ) कभी नहीं सुनी।' यह जगदम्बा के निःस्वार्थ प्रेम की अभिव्यक्ति है; यही भाव शंकराचार्य के देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र में भी है।
'अम्बे तू है' और 'जय अम्बे गौरी' में क्या अन्तर है?
दोनों देवी की हिन्दी आरतियाँ हैं। 'जय अम्बे गौरी' पुरानी, लम्बी आरती है जो 'ॐ जय जगदीश' की शैली में है; 'अम्बे तू है जगदम्बे काली' नई, गीत-शैली की आरती है। बहुत से परिवार दोनों गाते हैं।
स्रोत
- https://www.drikpanchang.com/lyrics/aarti/durga-mata/durga-mata-aarti.html?lang=hi
- https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/hathras/creator-of-ambey-tu-hai-jagadambe-kali-aarti-2025-06-03
- https://www.bhaktibharat.com/aarti/maa-durga-maa-kali
- https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Durga_puja_sandhya_aarti_at_Graham_Bazar,_Dibrugarh_01.jpg
अंतिम शोध: 2026-10-29