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गायत्री मन्त्र

बुद्धि को प्रकाशित करने वाला ऋग्वेद का महामन्त्र

गायत्री मन्त्र, जिसे सावित्री मन्त्र भी कहते हैं, ऋग्वेद के तीसरे मण्डल के 62वें सूक्त का दसवाँ मन्त्र है। इसके द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र और देवता सविता हैं। इसमें परमात्मा के दिव्य तेज का ध्यान करते हुए प्रार्थना की गई है कि वह हमारी बुद्धि को सत्प्रेरणा दे। संध्यावंदन, यज्ञोपवीत संस्कार और नित्य जप में इसका पाठ होता है, प्रायः माला पर 108 बार।

गायत्री मन्त्र
Mrs. S. C. Belnos, 'Gayatri japa', lithograph (1851), via NYPL Digital Collections / Wikimedia Commons, public domain Wikimedia Commons

मन्त्र

जप के समय गायत्री मन्त्र से पहले प्रणव 'ॐ' और तीन महाव्याहृतियाँ 'भूर्भुवः स्वः' बोली जाती हैं। तैत्तिरीय आरण्यक (2.11) में इसी क्रम का विधान है: पहले ॐ, फिर तीनों व्याहृतियाँ, फिर गायत्री। ऋग्वेद का मूल मन्त्र 'तत्सवितुर्' से आरम्भ होता है। नीचे दिया गया पाठ संस्कृत विकिस्रोत पर उपलब्ध ऋग्वेद 3.62 के अनुसार है, और हर पंक्ति का अर्थ अलग से समझाया गया है।

  1. ॐ भूर्भुवः स्वः ।

    oṃ bhūrbhuvaḥ svaḥ |

    अर्थ: ॐ। भूः, भुवः, स्वः — ये तीन 'महाव्याहृतियाँ' हैं, जो पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग (द्युलोक) का बोध कराती हैं। ये ऋग्वेद के मूल मन्त्र का अंश नहीं हैं, किन्तु जप के समय मन्त्र से पहले बोली जाती हैं।

  2. तत्सवितुर्वरेण्यं

    tatsaviturvareṇyaṃ

    अर्थ: सविता देव (सबको प्रेरित और उत्पन्न करने वाले सूर्य-स्वरूप परमेश्वर) का वह वरण करने योग्य, श्रेष्ठ …

  3. भर्गो देवस्य धीमहि ।

    bhargo devasya dhīmahi |

    अर्थ: … दिव्य तेज (भर्ग), जिसका हम ध्यान करते हैं।

  4. धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

    dhiyo yo naḥ pracodayāt ||

    अर्थ: वह (सविता देव) हमारी बुद्धियों को सत्प्रेरणा दे, उन्हें सही मार्ग पर चलाए।

ऋग्वेद में मन्त्र का मूल रूप

ऋग्वेद के सूक्त 3.62 में अलग-अलग देवताओं की स्तुति है: इन्द्र-वरुण, बृहस्पति, पूषा, सविता, सोम और मित्र-वरुण। इनमें मन्त्र 10 से 12 सविता देव के लिए हैं और गायत्री इस त्रिक का पहला मन्त्र है। सूक्त के साथ उद्धृत अनुक्रमणी के अनुसार इस सूक्त के ऋषि विश्वामित्र हैं। यही मन्त्र यजुर्वेद (वाजसनेयि संहिता 3.35, 22.9, 30.2 और 36.3, जहाँ यह व्याहृतियों सहित आता है), सामवेद और तैत्तिरीय संहिता में भी मिलता है।

  1. तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

    tatsaviturvareṇyaṃ bhargo devasya dhīmahi | dhiyo yo naḥ pracodayāt ||

    अर्थ: ऋग्वेद (3.62.10) में मन्त्र का मूल रूप, बिना ॐ और व्याहृतियों के। सायणाचार्य के अनुसार अर्थ: जो सविता देव हमारी बुद्धियों को धर्म आदि की ओर प्रेरित करते हैं, उन सर्वप्रेरक परमेश्वर के वरणीय, अविद्या का नाश करने वाले स्वयंप्रकाश तेज का हम ध्यान करते हैं।

शब्दों का अर्थ

'तत्' का अर्थ है 'वह', अर्थात् वह परम सत्ता जिसकी ओर संकेत तो किया जा सकता है पर जिसे पूरी तरह शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। 'सवितुः' का अर्थ है सविता का; यह शब्द 'सू' धातु से बना है, जिसका अर्थ है उत्पन्न करना या प्रेरित करना। सविता केवल आकाश का सूर्य नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो हर सुबह प्राणियों को जगाती है और संसार को कर्म में लगाती है। 'वरेण्यम्' का अर्थ है वरण करने योग्य, सबसे श्रेष्ठ और पूजनीय। 'भर्गः' वह तेज है जो दोषों को भून डालता है; सायणाचार्य इसे अविद्या और उसके कार्यों का नाश करने वाला स्वयंप्रकाश ब्रह्म-तेज बताते हैं। 'देवस्य' का अर्थ है देवता का, और 'धीमहि' का अर्थ है हम ध्यान करें या मन में धारण करें। अन्तिम पंक्ति में 'धियः' हमारी बुद्धियाँ हैं, 'यः' जो, 'नः' हमारी, और 'प्रचोदयात्' का अर्थ है प्रेरित करे, आगे बढ़ाए।

इस प्रार्थना की विशेषता यह है कि इसमें धन, विजय या दीर्घायु नहीं माँगी गई। इसमें भीतर के प्रकाश की याचना है: बुद्धि जागे और सही दिशा में चले। इसीलिए गायत्री को 'सद्बुद्धि का मन्त्र' और वेदों का सार कहा गया है।

अलग-अलग विद्वानों ने इसका अनुवाद अपने ढंग से किया है। स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में: 'हम उस परमात्मा की महिमा का ध्यान करते हैं जिसने इस जगत् को रचा है; वह हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे।' सायणाचार्य ने इसके एक से अधिक अर्थ दिए हैं: सविता को सबके अन्तर्यामी परमेश्वर के रूप में भी लिया है और प्रत्यक्ष सूर्य के रूप में भी, जिसका तेजोमण्डल पापों को नष्ट करता है।

उत्पत्ति, छन्द और नाम

विद्वान ऋग्वेद के 'कुल मण्डलों' (मण्डल 2 से 7) को इसके सबसे प्राचीन अंशों में गिनते हैं। तीसरा मण्डल विश्वामित्र और उनके वंश से जुड़ा माना जाता है। मन्त्र का नाम 'गायत्री' उसके छन्द से पड़ा: आठ-आठ अक्षरों के तीन पाद, कुल चौबीस अक्षर। प्रचलित पाठ में पहला पाद 'तत् स वि तुर् व रेण् यम्' सात ही अक्षरों का है, इसलिए पाठ करने वाले प्रायः अन्तिम 'म्' को कुछ लम्बा खींचते हैं, और छन्दशास्त्री पुराना उच्चारण 'वरेणियम्' मानकर आठ अक्षर पूरे करते हैं। सविता को सम्बोधित होने के कारण इसे 'सावित्री' भी कहा जाता है।

कालान्तर में यह मन्त्र देवी गायत्री के रूप में पूजित हुआ, जिन्हें पाँच मुखों वाली, कमल पर विराजमान और 'वेदमाता' कहा जाता है। 'विद्महे… धीमहि… प्रचोदयात्' के इसी ढाँचे पर शिव, विष्णु, गणेश, दुर्गा आदि अनेक देवताओं के गायत्री मन्त्र भी बने।

जप-विधि और समय

परम्परा में गायत्री संध्यावंदन का केन्द्र है, जो प्रातः, मध्याह्न और सायं की संधि-वेला में किया जाता है। इसमें आचमन, प्राणायाम और सूर्य को अर्घ्य देने के बाद गायत्री का जप होता है, जिसे उँगलियों पर या माला पर गिना जाता है। जप की संख्या कुल और सम्प्रदाय की परम्परा के अनुसार बदलती है: बहुत से लोग हर संध्या में 10, 28 या 108 बार जप करते हैं, और तुलसी या रुद्राक्ष की माला पर 108 बार जप सबसे प्रचलित है। कुछ साधक गुरु के मार्गदर्शन में 24,000 या उससे अधिक जप का अनुष्ठान भी करते हैं।

सरल विधि:

1. स्नान करके या हाथ-पैर-मुँह धोकर, स्वच्छ आसन पर बैठें। प्रातः पूर्व की ओर और सायं उत्तर या पश्चिम की ओर मुख करना परम्परागत है। 2. सीधे बैठकर कुछ गहरी साँसें लें और उगते सूर्य या हृदय में स्थित ज्योति का ध्यान करें। 3. 'ॐ भूर्भुवः स्वः' और तीनों पंक्तियों का धीरे-धीरे, स्पष्ट उच्चारण करें: वाचिक (बोलकर), उपांशु (होंठ हिलाकर धीमे स्वर में) या मानसिक। बहुत से आचार्य मानसिक जप को श्रेष्ठ मानते हैं। 4. पंक्तियों के बीच हल्का विराम दें ताकि अर्थ मन में उतरे। माला पर हर जप के साथ एक मनका आगे बढ़ाएँ और सुमेरु (मुख्य मनका) को न लाँघें। 5. अन्त में कुछ क्षण मौन रहकर कृतज्ञता के साथ प्रार्थना करें।

परम्परा में शुद्ध उच्चारण पर बहुत बल दिया गया है, इसलिए मन्त्र को किसी आचार्य से या विश्वसनीय रिकॉर्डिंग से सीखना अच्छा है।

कौन जप करे: परम्परा और परिवर्तन

शास्त्रीय परम्परा में बालक को उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार के समय आचार्य उसके कान में गायत्री मन्त्र का उपदेश देते हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इसे उपनयन का सार कहा, और इसे 'गायत्री दीक्षा' भी कहा जाता है। प्राचीन गृह्यसूत्रों में ऋग्वेद 3.62.10 का यह मन्त्र दीक्षित ब्राह्मण के लिए बताया गया है और अन्य वर्णों के लिए सविता के दूसरे मन्त्रों का विधान है।

उन्नीसवीं शताब्दी से इसका प्रचार व्यापक हुआ। राजा राममोहन राय ने 1827 में गायत्री पर एक ग्रन्थ लिखा और यह ब्रह्म समाज की उपासना का अंग बना; स्वामी दयानन्द सरस्वती के आर्य समाज और आगे पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के गायत्री परिवार ने इसे स्त्री-पुरुष सबके लिए सुलभ किया। आज यह भारत और विदेशों में घरों, विद्यालयों और मन्दिरों में गाया जाता है। कुछ परम्परागत समुदाय अब भी मानते हैं कि इसे गुरु से दीक्षा लेकर ही ग्रहण करना चाहिए। दोनों मत श्रद्धा से माने जाते हैं, और परिवार अपनी परम्परा के अनुसार चलते हैं।

परम्परा में वर्णित फल

हिन्दू ग्रन्थों में गायत्री की महिमा बहुत ऊँचे शब्दों में गाई गई है। मनुस्मृति सावित्री-जप को पवित्र करने वाला बताती है, भगवद्गीता (10.35) में श्रीकृष्ण कहते हैं कि छन्दों में मैं गायत्री हूँ, और बृहदारण्यक (5.14) सहित उपनिषदों में इसकी गूढ़ व्याख्या मिलती है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि नियमित और ध्यानपूर्वक जप से:

- मन शान्त और स्थिर होता है और बुद्धि तीव्र होती है, जो इस मन्त्र की मूल प्रार्थना ही है; - पूर्व के दोषों का शमन होता है, इसीलिए प्रायश्चित्त के रूप में गायत्री-जप का विधान है; - वेदमाता गायत्री की कृपा और रक्षा प्राप्त होती है; - यह समस्त वैदिक अध्ययन और कर्मकाण्ड की नींव है।

ये श्रद्धा और परम्परा की बातें हैं, किसी निश्चित फल की गारंटी नहीं। बहुत से लोग अनुभव करते हैं कि सूर्योदय के समय कुछ मिनट शान्ति से गायत्री का जप पूरे दिन को स्पष्टता और सुकून से भर देता है।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

गायत्री मन्त्र का अर्थ क्या है?

अर्थ है: 'हम सृष्टि को प्रेरित करने वाले सविता देव के उस श्रेष्ठ, वरणीय तेज का ध्यान करते हैं; वह हमारी बुद्धि को सत्प्रेरणा दे।' यह सद्बुद्धि और आन्तरिक प्रकाश की प्रार्थना है।

गायत्री मन्त्र किसने लिखा?

यह ऋग्वेद (3.62.10) का मन्त्र है, जिसके द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र हैं। परम्परा के अनुसार वेद अपौरुषेय (श्रुति) हैं और ऋषि वे हैं जिन्होंने मन्त्र का 'दर्शन' किया।

गायत्री मन्त्र का जाप कितनी बार करना चाहिए?

माला पर 108 बार सबसे प्रचलित है। नित्य संध्यावंदन में बहुत से परिवार हर संध्या में 10, 28 या 108 बार जप करते हैं। संख्या से अधिक महत्व एकाग्रता और श्रद्धा का है।

गायत्री मन्त्र का जाप कब करें?

परम्परा में दिन की तीन संधियाँ, सूर्योदय, मध्याह्न और सूर्यास्त, उत्तम मानी गई हैं, विशेषकर ब्रह्ममुहूर्त और सूर्योदय। मानसिक जप किसी भी समय किया जा सकता है।

क्या महिलाएँ गायत्री मन्त्र का जाप कर सकती हैं?

इस पर परम्पराएँ भिन्न हैं। कुछ परम्परागत कुल इसे उपनयन-दीक्षित लोगों के लिए मानते हैं, जबकि आर्य समाज और गायत्री परिवार जैसे आन्दोलन इसे सबको सिखाते हैं, और आज स्त्री-पुरुष दोनों बड़ी संख्या में इसका जप करते हैं। परिवार प्रायः अपनी परम्परा का पालन करते हैं।

मन्त्र से पहले 'ॐ भूर्भुवः स्वः' क्यों बोला जाता है?

ये तीन महाव्याहृतियाँ हैं, जो पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग का बोध कराती हैं। तैत्तिरीय आरण्यक और यजुर्वेद में मन्त्र से पहले ॐ और इन व्याहृतियों का विधान है, और यही जप का प्रचलित रूप बन गया।

स्रोत

अंतिम शोध: 2026-10-29

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