ॐ जय शिव ओंकारा आरती
शिवजी की सबसे प्रिय आरती, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक हैं
'ॐ जय शिव ओंकारा' भगवान शिव की सबसे लोकप्रिय हिन्दी आरती है। इसमें शिव को ओंकार, यानी पवित्र प्रणव ॐ का स्वरूप कहा गया है और बताया गया है कि ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव ॐ में एक हैं। इसके आठ मूल छन्द 'स्वामी शिवानन्द' की छाप के साथ पूरे होते हैं; बहुत से परिवार कैलास, गंगा और काशी विश्वनाथ के चार छन्द और जोड़ते हैं। शिव-पूजा के अन्त में इसे एक बार गाया जाता है।
आरती: आठ मूल छन्द
इस आरती के पाठ में स्रोतों के बीच अधिकांश आरतियों से ज़्यादा अन्तर है। नीचे दिया गया मूल पाठ भक्ति भारत के अनुसार है, जो द्रिक पंचांग से लगभग शब्दशः मेल खाता है, और हर पंक्ति को sanskritdocuments.org के आरती-संग्रह से मिलाया गया है। तीनों स्रोतों में वही आठ छन्द उसी क्रम में हैं, जो 'शिवानन्द स्वामी' की छाप पर पूरे होते हैं। शब्दों के मुख्य अन्तर आगे दिए गए हैं। गाते समय पहली पंक्ति का उत्तरार्ध प्रायः 'स्वामी' जोड़कर दोहराया जाता है और हर छन्द के बाद 'ॐ जय शिव ओंकारा' की टेक आती है।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा । ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥
oṃ jay śiv oṃkārā, svāmī jay śiv oṃkārā | brahmā viṣṇu sadāśiv, arddhāṃgī dhārā ||
अर्थ: हे ओंकार-स्वरूप शिव, आपकी जय हो! ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव आप ही हैं, और आप अर्धांगिनी पार्वती को अपने आधे अंग में धारण करते हैं।
एकानन चतुरानन पंचानन राजे । हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे ॥
ekānan caturānan paṃcānan rāje | haṃsāsan garūṛāsan vṛṣavāhan sāje ||
अर्थ: आप एक मुख वाले (विष्णु), चार मुख वाले (ब्रह्मा) और पाँच मुख वाले (शिव) रूपों में विराजते हैं; हंस, गरुड़ और नन्दी बैल आपके वाहन के रूप में सजते हैं।
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे । त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे ॥
do bhuj cār caturbhuj dasabhuj ati sohe | triguṇ rūp nirakhate tribhuvan jan mohe ||
अर्थ: दो भुजाओं, चार भुजाओं और दस भुजाओं वाले रूपों में आप अत्यन्त शोभित हैं; आपके त्रिगुणात्मक रूप को देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी । चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥
akṣamālā vanamālā muṇḍamālā dhārī | caṃdan mṛgamad sohai bhāle śaśidhārī ||
अर्थ: आप अक्षमाला, वनमाला और मुण्डमाला धारण करते हैं; चन्दन और कस्तूरी आप पर शोभित है, और ललाट पर चन्द्रमा है।
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे । सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥
śvetāmbar pītāmbar bāghambar aṃge | sanakādik garuṇādik bhūtādik saṃge ||
अर्थ: आपके अंगों पर श्वेत वस्त्र, पीताम्बर और बाघम्बर हैं; सनक आदि ऋषि, गरुड़ आदि और भूत-गण आपके साथ रहते हैं।
कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूलधारी । सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी ॥
kar ke madhy kamaṃḍal cakr triśūladhārī | sukhakārī dukhahārī jagapālan kārī ||
अर्थ: आपके हाथों में कमण्डलु, चक्र और त्रिशूल है; आप सुख देने वाले, दुःख हरने वाले और जगत का पालन करने वाले हैं।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका । प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका ॥
brahmā viṣṇu sadāśiv jānat avivekā | praṇavākṣar meṃ śobhit ye tīnoṃ ekā ||
अर्थ: अविवेकी लोग ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को अलग-अलग जानते हैं; प्रणव अक्षर ॐ में ये तीनों एक होकर शोभित हैं।
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे । कहत शिवानंद स्वामी सुख संपति पावे ॥
triguṇasvāmī jī kī ārati jo koi nar gāve | kahat śivānaṃd svāmī sukh saṃpati pāve ||
अर्थ: जो कोई त्रिगुणों के स्वामी की यह आरती गाता है, स्वामी शिवानन्द कहते हैं, वह सुख-सम्पत्ति पाता है।
प्रायः जोड़े जाने वाले चार छन्द
भक्ति भारत ये चार छन्द 'Addition' शीर्षक के नीचे देता है, और द्रिक पंचांग इन्हें अन्तिम छन्द से पहले रखता है। sanskritdocuments.org के पाठ में ये नहीं हैं। उत्तर भारत के घरों और मन्दिरों में ये खूब गाए जाते हैं।
लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा । पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा ॥
lakṣmī va sāvitrī pārvatī saṃgā | pārvatī arddhāṃgī, śivalaharī gaṃgā ||
अर्थ: लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती आपके संग हैं; पार्वती आपकी अर्धांगिनी हैं और गंगा शिव की लहर है।
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा । भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा ॥
parvat sohaiṃ pārvatī, śaṃkar kailāsā | bhāṃg dhatūr kā bhojan, bhasmī meṃ vāsā ||
अर्थ: पर्वत पर पार्वती शोभित हैं और शंकर कैलास पर; भाँग-धतूरा उनका भोजन है और भस्म में उनका वास है।
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला । शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला ॥
jaṭā meṃ gaṃg bahat hai, gal muṇḍan mālā | śeṣ nāg lipaṭāvat, oṛhat mṛgachālā ||
अर्थ: उनकी जटाओं में गंगा बहती है, गले में मुण्डमाला है; शेषनाग लिपटे हैं और वे मृगछाला ओढ़ते हैं।
काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी । नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी ॥
kāśī meṃ virāje viśvanāth, naṃdī brahmacārī | nit uṭh darśan pāvat, mahimā ati bhārī ||
अर्थ: काशी में विश्वनाथ विराजते हैं, साथ में ब्रह्मचारी नन्दी हैं; जो रोज़ उठकर उनके दर्शन करते हैं, उनकी महिमा अपार है।
पाठभेद
तीनों स्रोतों के प्रमुख अन्तर:
- टेक
- sanskritdocuments.org में 'ॐ जय शिव ॐकारा, स्वामी हर शिव ॐकारा' और 'अर्धांगी धारा' है।
- छन्द 4 की दूसरी पंक्ति
- भक्ति भारत और sanskritdocuments.org: 'चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी'। द्रिक पंचांग: 'त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी'।
- छन्द 5 की दूसरी पंक्ति
- sanskritdocuments.org में 'गरुणादिक' की जगह 'सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे' है।
- छन्द 6
- sanskritdocuments.org: 'कर में श्रेष्ठ कमण्डलु चक्र त्रिशूल धरता, जगकर्ता जगहर्ता जग पालन कर्ता'।
- छन्द 7 की दूसरी पंक्ति
- द्रिक पंचांग: 'प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका'।
- अन्तिम छन्द
- द्रिक पंचांग: '…कहत शिवानन्द स्वामी मनवान्छित फल पावे'। sanskritdocuments.org: 'निर्गुण शिव की आरती जो कोई नर गावे … मन वाँछित फल पावे'।
उत्पत्ति और रचयिता
आरती में कवि का नाम केवल छाप की पंक्ति 'कहत शिवानन्द स्वामी' में आता है। इन स्वामी शिवानन्द के बारे में इससे अधिक निश्चित जानकारी नहीं मिलती, और आरती का रचना-काल भी दर्ज नहीं है। यह 'ॐ जय जगदीश हरे' वाले हिन्दी आरती-परिवार की है और उसी छन्द और धुन में गाई जाती है। इन 'स्वामी शिवानन्द' को बीसवीं शताब्दी के ऋषिकेश वाले स्वामी शिवानन्द सरस्वती से नहीं जोड़ना चाहिए; ऐसा कोई सम्बन्ध प्रमाणित नहीं है।
यह आरती साम्प्रदायिक भेद से ऊपर है। दूसरे छन्द में शिव को एकानन, चतुरानन और पंचानन, तथा हंस, गरुड़ और वृषभ पर सवार बताया गया है: ये विष्णु, ब्रह्मा और शिव के रूप और वाहन हैं। सातवाँ छन्द इसका निष्कर्ष देता है: अविवेकी ही इन तीनों को अलग मानते हैं, प्रणव ॐ में ये एक हैं। इसमें त्रिमूर्ति की और ॐ (अ-उ-म) में सृष्टि, स्थिति और लय के समाहित होने की प्राचीन धारणा झलकती है।
भाव और बिम्ब
आरती एक के बाद एक चित्र रचती है। शिव तीन मालाएँ पहनते हैं: तपस्वी की अक्षमाला, विष्णु से जुड़ी वनमाला और संहारक की मुण्डमाला; तीन प्रकार के वस्त्र: श्वेत, पीत और बाघम्बर; और हाथों में कमण्डलु, चक्र और त्रिशूल, जो फिर से ब्रह्मा, विष्णु और शिव के चिह्नों को जोड़ते हैं। उनके साथ सनक आदि ऋषि, गरुड़ और उनके अपने गण हैं। जोड़े गए छन्दों में चित्र और घरेलू हो जाता है: पर्वत पर पार्वती, कैलास पर भाँग-धतूरा खाते और भस्म में रमे शंकर, जटा में गंगा, गले में नाग, और काशी में नन्दी सहित विराजे विश्वनाथ। पूरी आरती उस एक शिव की स्तुति है जो सब कुछ हैं: भयंकर भी और कृपालु भी, तपस्वी भी और गृहस्थ भी।
आरती का समय और विधि
शिवजी की आरती शिव-पूजा के अन्त में सुबह-शाम गाई जाती है, विशेषकर सोमवार, प्रदोष, पूरे श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर, जब रात्रि के हर प्रहर की पूजा के बाद भी इसे गाया जा सकता है।
1. शिवलिंग का जल या दूध से अभिषेक करके और बिल्वपत्र चढ़ाकर, थाली में घी का दीपक या कपूर, फूल और धूप रखें। 2. घण्टी बजाते हुए शिवलिंग या प्रतिमा के सामने दीपक को दक्षिणावर्त घुमाएँ और आरती गाएँ। 3. आठ मूल छन्द गाएँ, और यदि आपके परिवार की परम्परा हो तो चार अतिरिक्त छन्द भी; हर छन्द के बाद टेक दोहराएँ। 4. सबको आरती दें, फिर प्रसाद चढ़ाकर 'ॐ नमः शिवाय' या क्षमा-प्रार्थना से समापन करें।
आरती एक बार पूरी गाई जाती है।
परम्परा में वर्णित फल
अन्तिम छन्द स्वयं फल बताता है: जो त्रिगुणस्वामी की यह आरती गाता है, उसे सुख-सम्पत्ति मिलती है, या दूसरे पाठ के अनुसार मनवांछित फल। भक्तों का यह भी विश्वास है कि श्रद्धा से इसे गाने पर शिव की रक्षा मिलती है, दुःख दूर होते हैं (वे 'सुखकारी दुखहारी' हैं) और मन ईश्वर की एकता की ओर मुड़ता है। ये श्रद्धा और परम्परा की बातें हैं।
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
'ॐ जय शिव ओंकारा' आरती किसने लिखी?
आरती के अन्तिम छन्द में 'स्वामी शिवानन्द' का नाम आता है ('कहत शिवानन्द स्वामी')। उनके बारे में इससे अधिक जानकारी नहीं मिलती, और रचना-काल भी दर्ज नहीं है।
'ॐ जय शिव ओंकारा' का अर्थ क्या है?
'ओंकार-स्वरूप शिव की जय हो।' आरती बताती है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव प्रणव ॐ में एक हैं।
शिवजी की आरती में कितने छन्द हैं?
आठ मूल छन्द, जो शिवानन्द की छाप पर पूरे होते हैं। बहुत से परिवार चार छन्द और जोड़ते हैं (लक्ष्मी-सावित्री-पार्वती, कैलास, गंगा और काशी विश्वनाथ वाले)।
शिवजी की आरती कब करनी चाहिए?
शिव-पूजा के अन्त में रोज़, और विशेषकर सोमवार, प्रदोष, श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर।
शिवजी की आरती में ब्रह्मा और विष्णु का उल्लेख क्यों है?
आरती शिव को उस एक प्रभु के रूप में देखती है जिनके रूपों में ब्रह्मा और विष्णु भी हैं, उनके वाहनों और चिह्नों सहित, और कहती है कि अविवेकी ही इन्हें अलग मानते हैं, क्योंकि ॐ में तीनों एक हैं।
स्रोत
- https://www.bhaktibharat.com/aarti/shri-shiv-shankar-bholenath
- https://www.drikpanchang.com/lyrics/aarti/lord-shiva/shiva-aarti.html
- https://sanskritdocuments.org/hindi/arati.html
अंतिम शोध: 2026-10-29