पतंजलि के योगसूत्र
195 संक्षिप्त सूत्र, जो चंचल मन से आन्तरिक मुक्ति तक का मार्ग दिखाते हैं
महर्षि पतंजलि के योगसूत्र योग दर्शन का मूल ग्रन्थ हैं, जो हिन्दू दर्शन के छह आस्तिक सम्प्रदायों में से एक है। चार पादों में लगभग 195 छोटे सूत्रों में वे योग को चित्त की वृत्तियों का निरोध बताते हैं और उन आठ अंगों (अष्टांग) का वर्णन करते हैं जो समाधि और कैवल्य, यानी मुक्ति, तक ले जाते हैं। परम्परा पतंजलि को आदिशेष का अवतार मानती है; विद्वान इस ग्रन्थ को लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के बीच का मानते हैं, और अनेक विद्वान चौथी–पाँचवीं शताब्दी ईस्वी की तिथि को अधिक उचित मानते हैं।

योगसूत्र क्या हैं
सूत्र का अर्थ है 'धागा': एक अत्यन्त छोटा वाक्य, जिसे कण्ठस्थ किया जाता है और फिर गुरु या भाष्य उसका विस्तार करते हैं। योगसूत्र संस्कृत के सबसे संक्षिप्त ग्रन्थों में से हैं; बहुत-से सूत्र केवल दो-तीन शब्दों के हैं। फिर भी मिलकर वे मन, दुःख के कारणों और मुक्ति की ओर ले जाने वाली साधनाओं का पूरा मानचित्र देते हैं।
योगसूत्र उन छह शास्त्रीय दर्शनों में से एक के मूल ग्रन्थ हैं जो वेदों का प्रामाण्य स्वीकार करते हैं: न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त। ये श्रुति नहीं हैं; ये एक सुव्यवस्थित शास्त्र हैं, जिसे परम्परा वेदों के अनुकूल मानती है। इनका दर्शन सांख्य के निकट है, जो पुरुष (शुद्ध चेतना) और प्रकृति (मन सहित समस्त जड़ जगत्) में भेद करता है, पर योग इसमें ईश्वर को जोड़ता है: एक विशेष पुरुष, जो क्लेश और कर्म से अछूता है, और जिसका वाचक प्रणव (ॐ) है (1.23–1.27)।
संरचना: चार पाद
ग्रन्थ में चार पाद (अध्याय) हैं। नीचे दी गई सूत्र-संख्या संस्कृत विकिस्रोत के पाठ के अनुसार है, जिसमें कुल 195 सूत्र हैं; बी. के. एस. अयंगर जैसे कुछ संस्करण तीसरे पाद के एक सूत्र को दो में बाँटकर 196 गिनते हैं।
- 1. समाधिपाद (51 सूत्र)
- योग की परिभाषा 'चित्तवृत्तिनिरोध', पाँच प्रकार की वृत्तियाँ, अभ्यास और वैराग्य, ईश्वर और प्रणव, साधना के विघ्न, और समाधि के स्तर।
- 2. साधनपाद (55 सूत्र)
- क्रियायोग (तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान), अविद्या से आरम्भ होने वाले पाँच क्लेश, कर्म और दुःख का सिद्धान्त, और अष्टांग योग के पहले पाँच अंग।
- 3. विभूतिपाद (55 सूत्र)
- धारणा, ध्यान और समाधि, जिन्हें मिलाकर संयम कहा जाता है, और उससे उत्पन्न मानी जाने वाली विभूतियाँ (सिद्धियाँ), इस चेतावनी के साथ कि वे मुक्ति में बाधा बन सकती हैं।
- 4. कैवल्यपाद (34 सूत्र)
- चित्त का स्वरूप, कर्म और संस्कार, और कैवल्य, यानी शुद्ध चेतना की स्वतन्त्रता, जिस पर ग्रन्थ समाप्त होता है।
रचयिता और काल: परम्परा और विद्वानों का मत
हिन्दू परम्परा पतंजलि को आदिशेष का अवतार मानती है, वह दिव्य नाग जिस पर भगवान विष्णु शयन करते हैं, जो उपदेश देने के लिए पृथ्वी पर आए। एक प्रसिद्ध पारम्परिक श्लोक पतंजलि की वन्दना करता है कि उन्होंने योग से चित्त का, व्याकरण से वाणी का और आयुर्वेद से शरीर का मल दूर किया; इस प्रकार वह योगसूत्रकार को पाणिनि के व्याकरण पर 'महाभाष्य' लिखने वाले वैयाकरण पतंजलि से अभिन्न मानता है। सबसे प्राचीन भाष्य, योगभाष्य, परम्परा से वेदव्यास का माना जाता है।
विद्वान अधिक सावधानी बरतते हैं। वैयाकरण पतंजलि का समय लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है, पर शैली और विषय के अन्तर के कारण अनेक विद्वान सन्देह करते हैं कि उन्होंने ही योगसूत्र लिखे। योगसूत्रों के लिए प्रस्तावित तिथियाँ 500 ईसा पूर्व से लगभग 450 ईस्वी तक हैं, और बाद की तिथियाँ अधिक स्वीकार्य मानी जाती हैं। भारतविद फ़िलिप ए. मास पाण्डुलिपियों के अध्ययन के आधार पर तर्क देते हैं कि सूत्र और भाष्य एक ही ग्रन्थ, 'पातंजल योगशास्त्र', के रूप में लगभग 400 ईस्वी में एक साथ रचे गए। विद्वान यह भी बताते हैं कि यह ग्रन्थ पुराने सांख्य विचारों पर आधारित है और उस समय के बौद्ध चिन्तन से कई शब्द साझा करता है। ये प्रश्न अभी खुले हैं।
मूल शिक्षाएँ
चित्त और उसकी वृत्तियाँ। चित्त निरन्तर पाँच प्रकार की वृत्तियों से चलायमान रहता है: प्रमाण, विपर्यय (भ्रम), विकल्प (कल्पना), निद्रा और स्मृति (1.6)। योग इन्हें शान्त करना है, ताकि द्रष्टा, यानी शुद्ध चेतना, अपने स्वरूप में स्थित हो सके।
दुःख के कारण। पाँच क्लेश, अविद्या, अस्मिता ('मैं यही हूँ' का भाव), राग, द्वेष और अभिनिवेश (जीवन से चिपके रहना), कर्म को प्रेरित करते हैं और जन्म-मृत्यु का चक्र चलाते रहते हैं (2.3)। अनित्य को नित्य और अशुद्ध को शुद्ध मान लेने वाली अविद्या ही बाकी सबकी जड़ है।
अभ्यास और वैराग्य। लम्बे समय तक, निरन्तर और श्रद्धा से किया गया अभ्यास और तृष्णा से मुक्ति, ये मार्ग के दो पंख हैं (1.12–1.16)।
ईश्वर-प्रणिधान। ईश्वर के प्रति समर्पण को समाधि का सीधा मार्ग (1.23) भी बताया गया है और दैनिक क्रियायोग का अंग (2.1) भी। प्रणव (ॐ) का जप और उसके अर्थ का चिन्तन करने की सलाह दी गई है (1.28)।
अष्टांग योग। ग्रन्थ का सबसे प्रसिद्ध भाग अष्टांग योग है, आठ अंग जो नैतिक आचरण से आरम्भ होकर गहन समाधि तक ले जाते हैं।
अष्टांग योग के आठ अंग
सूत्र-संख्या संस्कृत विकिस्रोत के पाठ के अनुसार है।
- यम
- पाँच नैतिक संयम (2.30): अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संग्रह न करना)। जब ये बिना किसी अपवाद के पाले जाएँ, तो 'महाव्रत' कहलाते हैं (2.31)।
- नियम
- पाँच पालनीय नियम (2.32): शौच (पवित्रता), सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण)।
- आसन
- स्थिर और सुखद बैठने की स्थिति (2.46)।
- प्राणायाम
- आसन सिद्ध होने के बाद श्वास और प्रश्वास की गति का नियमन (2.49)।
- प्रत्याहार
- इन्द्रियों का अपने विषयों से हटकर भीतर की ओर मुड़ना (2.54)।
- धारणा
- चित्त को एक स्थान पर बाँधना (3.1)।
- ध्यान
- उस विषय की ओर ज्ञान का अविच्छिन्न प्रवाह (3.2)।
- समाधि
- जब केवल ध्येय ही प्रकाशित रहे और ध्याता का अपना रूप मानो शून्य हो जाए (3.3)।
प्रसिद्ध सूत्र
संस्कृत पाठ संस्कृत विकिस्रोत के अनुसार है।
अथ योगानुशासनम् ॥ १.१ ॥ योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ १.२ ॥ तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ १.३ ॥
atha yogānuśāsanam || 1.1 || yogaś cittavṛttinirodhaḥ || 1.2 || tadā draṣṭuḥ svarūpe'vasthānam || 1.3 ||
अर्थ: 1.1–1.3: 'अब योग का अनुशासन (उपदेश) आरम्भ होता है। चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।' ये तीन सूत्र पूरे ग्रन्थ का उद्देश्य बता देते हैं।
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १.१२ ॥
abhyāsavairāgyābhyāṃ tannirodhaḥ || 1.12 ||
अर्थ: 1.12: 'अभ्यास और वैराग्य से उनका (वृत्तियों का) निरोध होता है।' यही जोड़ी भगवद्गीता (6.35) में चंचल मन को वश में करने के उपाय के रूप में आती है।
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि ।। २.२९ ।।
yamaniyamāsanaprāṇāyāmapratyāhāradhāraṇādhyānasamādhayo'ṣṭāv aṅgāni || 2.29 ||
अर्थ: 2.29: 'यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, ये आठ अंग हैं।' 'अष्टांग योग' नाम का आधार यही सूत्र है।
स्थिरसुखं आसनं ।। २.४६ ।।
sthirasukham āsanam || 2.46 ||
अर्थ: 2.46: 'जो स्थिर और सुखद हो, वही आसन है।' आसन के बारे में योगसूत्र लगभग इतना ही कहते हैं: उद्देश्य ऐसा स्थिर और सहज आसन है जिसमें ध्यान हो सके।
आज योगसूत्रों का अध्ययन
सदियों तक योगसूत्रों का अध्ययन मुख्यतः भाष्यों के सहारे हुआ: व्यास का योगभाष्य, वाचस्पति मिश्र की तत्त्ववैशारदी, राजा भोज की राजमार्तण्ड वृत्ति और विज्ञानभिक्षु का योगवार्तिक। विद्वान बताते हैं कि मध्यकाल के उत्तरार्ध में, जब हठयोग के ग्रन्थ अधिक प्रभावशाली हुए, इस ग्रन्थ का अध्ययन अपेक्षाकृत कम हुआ। स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक 'राजयोग' (1896) ने अनुवाद और व्याख्या के साथ इसे विश्व के सामने रखा, और टी. कृष्णमाचार्य की परम्परा के आचार्यों, जैसे बी. के. एस. अयंगर और टी. के. वी. देसिकाचार ने इसे आधुनिक योग-शिक्षा का केन्द्र बना दिया।
आज योग विद्यालयों में सूत्रों का सस्वर पाठ होता है, और बहुत-से शिक्षक-प्रशिक्षण इन्हीं से आरम्भ होते हैं। 2015 से हर वर्ष 21 जून को मनाए जाने वाले अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस ने भी इस ग्रन्थ में रुचि बढ़ाई है। एक पारम्परिक बात याद रखने योग्य है: आसन केवल एक अंग है, और योगसूत्र मुख्यतः मन के मार्गदर्शक हैं।
पढ़ना कहाँ से शुरू करें
ऐसा संस्करण चुनें जिसमें मूल संस्कृत, शब्दार्थ और भाष्य हो। गीता प्रेस, गोरखपुर हिन्दी व्याख्या सहित 'पातंजल योगदर्शन' प्रकाशित करता है, और स्वामी हरिहरानन्द आरण्य का भाष्य सहित योगदर्शन एक सम्मानित क्लासिक है। अंग्रेज़ी पाठकों के लिए एडविन एफ़. ब्रायन्ट की 'The Yoga Sutras of Patanjali' (नॉर्थ पॉइंट प्रेस, 2009) पारम्परिक भाष्यों का गहन सर्वेक्षण करती है, जबकि स्वामी सच्चिदानन्द और बी. के. एस. अयंगर की 'Light on the Yoga Sutras of Patanjali' साधकों में लोकप्रिय हैं। मूल संस्कृत पाठ संस्कृत विकिस्रोत पर निःशुल्क उपलब्ध है।
धीरे पढ़ें: भाष्य के साथ रोज़ एक या दो सूत्र, यही पारम्परिक गति है। समाधिपाद के पहले सोलह सूत्रों से शुरू करें, फिर साधनपाद पढ़ें, और उसके बाद ही अधिक तकनीकी तीसरा और चौथा पाद।
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
पतंजलि के योगसूत्र में कितने सूत्र हैं?
व्यास-भाष्य के अनुसार अधिकांश पारम्परिक संस्करणों में 195; बी. के. एस. अयंगर सहित कुछ संस्करणों में 196। ये चार पादों में बँटे हैं: समाधि, साधन, विभूति और कैवल्य।
योगसूत्र में योग की परिभाषा क्या है?
सूत्र 1.2: 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', यानी चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
योग के आठ अंग कौन-से हैं?
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि (योगसूत्र 2.29)। इन्हें मिलाकर अष्टांग योग कहते हैं।
पतंजलि कौन थे?
परम्परा उन्हें आदिशेष का अवतार मानती है और प्रायः महाभाष्य लिखने वाले वैयाकरण पतंजलि से अभिन्न मानती है। विद्वानों में इस पर मतभेद है, और वे योगसूत्रों को लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के बीच का मानते हैं।
क्या योगसूत्र हिन्दू धर्मग्रन्थ है?
यह योग दर्शन का मूल ग्रन्थ है, जो हिन्दू दर्शन के छह शास्त्रीय सम्प्रदायों में से एक है। यह श्रुति नहीं, शास्त्र है, और इसमें ईश्वर और प्रणव (ॐ) का वर्णन है।
क्या योगसूत्र मुख्यतः आसनों के बारे में है?
नहीं। आसन पर केवल कुछ ही सूत्र हैं (2.46–2.48)। ग्रन्थ मुख्यतः मन, ध्यान और मुक्ति के बारे में है।
स्रोत
- https://sa.wikisource.org/wiki/योगसूत्रम्/पादः_१
- https://sa.wikisource.org/wiki/योगसूत्रम्/पादः_२
- https://sa.wikisource.org/wiki/योगसूत्रम्/पादः_३
- https://sa.wikisource.org/wiki/योगसूत्रम्/पादः_४
- https://en.wikipedia.org/wiki/Yoga_Sutras_of_Patanjali
- https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Yogasutra_with_Patanjali's_bhasya,_Sanskrit,_Devanagari_script,_random_sample_pages_f1v_f2r_f3v.jpg
अंतिम शोध: 2026-10-29