पुराण
वे 'पुरातन कथाएँ' जो वेदों को हर घर तक पहुँचाती हैं: देवता, अवतार, तीर्थ और व्रत
पुराण पवित्र इतिहास के विशाल संस्कृत संग्रह हैं, जिनमें सृष्टि, देवता और उनके अवतार, ऋषि और राजा, तीर्थ, व्रत और उत्सव वर्णित हैं। परम्परा अठारह महापुराण मानती है, जिनके रचयिता वेदव्यास माने जाते हैं और जिनमें कुल चार लाख श्लोक बताए गए हैं, साथ ही अठारह उपपुराण भी। ये स्मृति हैं, और विष्णु, शिव, देवी, गणेश और श्रीकृष्ण की जो कथाएँ हिन्दू जानते हैं, उनमें से अधिकांश इन्हीं से आती हैं। विद्वान उपलब्ध ग्रन्थों को मुख्यतः लगभग तीसरी से दसवीं शताब्दी ईस्वी का मानते हैं, जिनमें बाद में भी जोड़ होते रहे।
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पुराण क्या हैं
पुराण का अर्थ है 'प्राचीन'। उपनिषदों में ही 'इतिहास-पुराण', यानी इतिहास और प्राचीन कथाओं के संग्रह, को पंचम वेद कहा गया है (छान्दोग्य उपनिषद् 7.1.2)। आज उपलब्ध पुराण विशाल ग्रन्थ हैं, जो प्रायः संवाद के रूप में कहे गए हैं: उग्रश्रवा जैसे सूत नैमिषारण्य में एकत्र ऋषियों को वह सुनाते हैं जो उन्होंने अपने पिता लोमहर्षण से सुना, और लोमहर्षण ने वेदव्यास से।
यदि वेद हिन्दू परम्परा की जड़ हैं, तो पुराण उसकी शाखाएँ और फूल हैं। गंगावतरण, ध्रुव की भक्ति, प्रह्लाद और नृसिंह, समुद्र-मन्थन, शिव-पार्वती विवाह, व्रज में श्रीकृष्ण की बाल-लीला और महिषासुर से देवी का युद्ध, ये सब पौराणिक कथाएँ हैं। मन्दिर-पूजा की विधि, व्रत-कथाएँ, पर्वों का पंचांग, और काशी, प्रयाग तथा ज्योतिर्लिंगों जैसे तीर्थों की महिमा भी अधिकतर पुराणों में ही वर्णित है।
पुराण के पाँच लक्षण
कई पुराण पाँच विषयों (पंचलक्षण) से पुराण की परिभाषा देते हैं: सर्ग (विश्व की सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय और पुनः सृष्टि), वंश (देवताओं और ऋषियों की वंशावलियाँ), मन्वन्तर (चौदह मनुओं के महान काल-खण्ड) और वंशानुचरित (सूर्य और चन्द्र राजवंशों का इतिहास)। व्यवहार में पुराण इससे कहीं आगे जाते हैं: उनमें धर्मशास्त्र, दर्शन, पूजा-विधि, तीर्थ-यात्रा, आयुर्वेद, वास्तु और विधि-विधान सब हैं। भागवत पुराण दस विषयों की लम्बी सूची देता है।
18 महापुराण
अठारह पुराणों की सूचियाँ थोड़ी भिन्न हैं: कुछ में शिव पुराण है, कुछ में वायु पुराण; देवीभागवत पुराण का स्थान भी विवादित है, कुछ ग्रन्थ इसे महापुराण और कुछ उपपुराण मानते हैं। नीचे का क्रम और श्लोक-संख्या भागवत पुराण 12.13.4–8 के अनुसार है। ये पारम्परिक आकार हैं; आज उपलब्ध मुद्रित पाठ प्रायः इनसे काफ़ी छोटे या बड़े हैं।
- ब्रह्म पुराण (10,000)
- सूचियों में प्रायः पहला, इसलिए आदि पुराण भी कहलाता है। सृष्टि, वंशावलियाँ, और तीर्थों, विशेषकर पुरुषोत्तम क्षेत्र (पुरी) और गोदावरी क्षेत्र, की महिमा।
- पद्म पुराण (55,000)
- दूसरा सबसे बड़ा। अनेक खण्डों वाला वैष्णव पुराण (खण्डों की संख्या पाठ-परम्परा के अनुसार भिन्न है), जिसमें तीर्थ-माहात्म्य, व्रत-कथाएँ, गीता-माहात्म्य और एकादशी-माहात्म्य हैं।
- विष्णु पुराण (23,000)
- छह अंशों में सुगठित, शास्त्रीय वैष्णव पुराण, जो पाँचों लक्षणों का निकट से पालन करता है: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी और लोक, राजवंश, और श्रीकृष्ण-चरित।
- शिव पुराण (24,000)
- संहिताओं में विभक्त: शिव-महिमा, शिव-पार्वती विवाह, गणेश और कार्तिकेय का जन्म, और बारह ज्योतिर्लिंग। कुछ सूचियों में इसके स्थान पर वायु पुराण गिना जाता है।
- श्रीमद्भागवत पुराण (18,000)
- बारह स्कन्ध, जिनका शिखर दशम स्कन्ध है, जिसमें व्रज में श्रीकृष्ण की बाल-लीला और मथुरा-द्वारका का चरित है। अनेक वैष्णव परम्पराओं के लिए भक्ति का सर्वोच्च ग्रन्थ; सात दिन की भागवत सप्ताह कथा में इसका पाठ होता है।
- नारद (नारदीय) पुराण (25,000)
- विश्वकोश-जैसा वैष्णव पुराण: व्रत, धर्म, वेदांग, और अन्य पुराणों के सार।
- मार्कण्डेय पुराण (9,000)
- मार्कण्डेय ऋषि द्वारा कथित। इसी में देवी माहात्म्य है, जो दुर्गा सप्तशती या चण्डी पाठ के 700 श्लोकों के रूप में प्रसिद्ध है और विशेषकर नवरात्र में पढ़ा जाता है।
- अग्नि पुराण (15,400)
- अग्निदेव द्वारा वसिष्ठ को कहा गया। विश्वकोश के रूप में प्रसिद्ध: पूजा, मन्दिर-निर्माण और मूर्ति-विधान, राजनीति, आयुर्वेद, काव्यशास्त्र और व्याकरण।
- भविष्य पुराण (14,500)
- 'भविष्य का पुराण'। व्रत, उत्सव और सूर्योपासना; इसका उपलब्ध पाठ लम्बे समय तक संशोधित और विस्तारित होता रहा है।
- ब्रह्मवैवर्त पुराण (18,000)
- श्रीकृष्ण और राधा पर केन्द्रित चार खण्ड, जिनमें प्रकृति, यानी देवी, और उनके रूपों पर एक खण्ड है।
- लिंग पुराण (11,000)
- शिवलिंग का अर्थ और पूजा, जिसमें उस अनन्त ज्योति-स्तम्भ की कथा है जिसका आदि-अन्त ब्रह्मा और विष्णु नहीं खोज सके।
- वराह पुराण (24,000)
- वराह रूप में भगवान विष्णु द्वारा भूदेवी को कहा गया: व्रत, पूजा और तीर्थ, विशेषकर मथुरा।
- स्कन्द पुराण (81,100)
- सबसे बड़ा पुराण, कार्तिकेय (स्कन्द) के नाम पर। काशी, अवन्ती, प्रभास जैसे खण्डों में व्यवस्थित, यह तीर्थ-माहात्म्यों का विशाल संग्रह है; सत्यनारायण कथा परम्परागत रूप से इसी की मानी जाती है।
- वामन पुराण (10,000)
- वामन अवतार, जिन्होंने तीन पगों में लोक नाप लिए और राजा बलि का गर्व हरा, साथ में बहुत-सी शैव सामग्री।
- कूर्म पुराण (17,000)
- कूर्म (कछुआ) रूप में भगवान विष्णु द्वारा उपदिष्ट; इसमें ईश्वर गीता है, भगवद्गीता के ढंग का एक शैव उपदेश।
- मत्स्य पुराण (14,000)
- मत्स्य अवतार द्वारा प्रलय से मनु की रक्षा से आरम्भ; धर्म, मूर्ति-विधान और मन्दिर-वास्तु पर सामग्री, और पुराणों की सूचियाँ।
- गरुड़ पुराण (19,000)
- गरुड़ को भगवान विष्णु के उपदेश। इसका प्रेत खण्ड, जिसमें मृत्यु, जीव की यात्रा और दिवंगत के संस्कारों का वर्णन है, परम्परा से शोक के दिनों में पढ़ा जाता है।
- ब्रह्माण्ड पुराण (12,000)
- ब्रह्माण्ड (विश्व-अण्ड) के नाम पर। इसमें ललितोपाख्यान और ललिता सहस्रनाम हैं, और अध्यात्म रामायण को परम्परा से इसी का अंग माना जाता है।
रचयिता और काल: परम्परा और विद्वानों का मत
परम्परा के अनुसार आरम्भ में एक ही पुराण-संहिता थी। वेदव्यास ने उसे संकलित किया और अपने शिष्य सूत लोमहर्षण को सिखाया, जिनके शिष्यों ने अपनी-अपनी संहिताएँ बनाईं (विष्णु पुराण 3.6)। इस प्रकार वेदव्यास सभी अठारह महापुराणों के रचयिता माने जाते हैं, यद्यपि हर पुराण का अपना वक्ता भी है, जैसे विष्णु पुराण में पराशर और भागवत में शुकदेव।
विद्वान पुराणों को जीवित ग्रन्थ मानते हैं जो कई शताब्दियों में बढ़ते और बदलते रहे, और जिनमें ब्राह्मण-विद्या के साथ पुरानी सूत-परम्परा भी मिली है। अधिकांश विद्वान उपलब्ध पुराणों के पहले रूपों को लगभग तीसरी से दसवीं शताब्दी ईस्वी के बीच का मानते हैं, जिनकी बहुत-सी मूल सामग्री गुप्त काल में स्थिर हुई, और कुछ अंश दूसरी सहस्राब्दी तक संशोधित होते रहे। विष्णु और भागवत जैसे भली-भाँति अध्ययन किए गए पुराणों की भी प्रस्तावित तिथियों में बड़ा अन्तर है, और विद्वान लूडो रोशे सावधान करते हैं कि किसी पुराण को एक निश्चित तिथि नहीं दी जा सकती। उदाहरण के लिए, स्कन्द पुराण की नवीं शताब्दी की एक नेपाली पाण्डुलिपि आज छपने वाले स्कन्द पुराण से बहुत भिन्न है।
परम्परा अठारह पुराणों को तीन गुणों (सत्त्व, रज और तम) के अनुसार भी वर्गीकृत करती है, और प्रायः वर्गीकरण करने वाला अपने आराध्य देव के पुराणों को श्रेष्ठ बताता है। इसलिए अलग-अलग सम्प्रदाय अलग-अलग पुराणों पर बल देते हैं, और विद्वान ध्यान दिलाते हैं कि सबसे भक्ति-प्रधान पुराण भी सामान्यतः अन्य देवताओं का आदर करते हैं।
प्रसिद्ध श्लोक
संस्कृत पाठ संस्कृत विकिस्रोत के अनुसार है।
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंश्यानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥
sargaś ca pratisargaś ca vaṃśo manvantarāṇi ca | vaṃśyānucaritaṃ caiva purāṇaṃ pañcalakṣaṇam ||
अर्थ: मत्स्य पुराण 53.65: 'सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय और पुनः सृष्टि), वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित (राजवंशों के चरित): ये पुराण के पाँच लक्षण हैं।'
मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम् । अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक् ॥
madvayaṃ bhadvayaṃ caiva bratrayaṃ vacatuṣṭayam | anāpaliṃgakūskāni purāṇāni pṛthak pṛthak ||
अर्थ: देवीभागवत पुराण 1.3.2, अठारह पुराणों को याद रखने का श्लोक: 'म' से दो (मत्स्य, मार्कण्डेय), 'भ' से दो (भविष्य और भागवत), 'ब्र' से तीन (ब्रह्म, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मवैवर्त), 'व' से चार (वामन, वराह, विष्णु, वायु), और 'अ' (अग्नि), 'ना' (नारद), 'प' (पद्म), 'लिंग' (लिंग), 'ग' (गरुड़), 'कू' (कूर्म) तथा 'स्क' (स्कन्द) से एक-एक।
एवं पुराणसन्दोहः चतुर्लक्ष उदाहृतः । तत्राष्टदशसाहस्रं श्रीभागवतं इष्यते ॥
evaṃ purāṇasandohaś caturlakṣa udāhṛtaḥ | tatrāṣṭadaśasāhasraṃ śrībhāgavataṃ iṣyate ||
अर्थ: भागवत पुराण 12.13.9, हर पुराण का आकार बताने के बाद: 'इस प्रकार पुराणों का समस्त संग्रह चार लाख श्लोकों का कहा गया है; उनमें श्रीमद्भागवत अठारह हज़ार श्लोकों का माना गया है।'
आज पुराणों का पाठ
अधिकांश हिन्दुओं तक पुराण निजी अध्ययन से अधिक कथा के माध्यम से पहुँचते हैं। भागवत सप्ताह, यानी सात दिन तक भागवत पुराण का पाठ और व्याख्या, बड़ी संख्या में श्रोताओं को जोड़ता है, और शिव पुराण तथा देवीभागवत की कथाएँ भी। मार्कण्डेय पुराण की दुर्गा सप्तशती का पाठ दोनों नवरात्रों में होता है। मृत्यु के बाद के दिनों में गरुड़ पुराण में वर्णित जीव की यात्रा पढ़ने की परम्परा है। सत्यनारायण कथा और अनेक एकादशी-कथाओं सहित बहुत-सी व्रत-कथाएँ पुराणों से ली गई बताई जाती हैं।
पौराणिक कथाएँ मन्दिर-कला, शास्त्रीय नृत्य, लोक-नाट्य, कैलेण्डर-चित्रों और आधुनिक टीवी धारावाहिकों को भी आकार देती हैं, और तीर्थ-माहात्म्य आज भी यात्रियों को पूरे भारत के तीर्थों तक ले जाते हैं।
पढ़ना कहाँ से शुरू करें
गीता प्रेस, गोरखपुर प्रमुख पुराणों को मूल संस्कृत और हिन्दी अनुवाद सहित, या हिन्दी संक्षेप में, प्रकाशित करता है, और उसके 'कल्याण' के विशेषांकों ने अनेक पुराण हिन्दी पाठकों तक पहुँचाए हैं। भक्ति-भाव से पढ़ने के लिए श्रीमद्भागवत स्वाभाविक पहला चुनाव है; पुराण के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए विष्णु पुराण सबसे अच्छा संक्षिप्त परिचय है। अंग्रेज़ी में एच. एच. विल्सन का 1840 का विष्णु पुराण अनुवाद सार्वजनिक डोमेन में है, मोतीलाल बनारसीदास की 'Ancient Indian Tradition and Mythology' शृंखला अनेक पुराणों का पूरा अनुवाद देती है, और एडविन ब्रायन्ट की 'Krishna: The Beautiful Legend of God' (पेंगुइन) भागवत के दशम स्कन्ध का अनुवाद है।
बच्चों वाले परिवारों के लिए सचित्र पुनर्कथाएँ अच्छा सेतु हैं, पर जो वयस्क पाठक गहराई चाहते हैं, उन्हें किसी एक पुराण का पूरा अनुवाद धीरे-धीरे पढ़ना चाहिए, जैसा परम्परा चाहती है, और हो सके तो किसी प्रतिष्ठित कथावाचक की कथा भी सुननी चाहिए।
इस पूजा और पाठ के लिए
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
पुराण कितने हैं?
परम्परा अठारह महापुराण और अठारह उपपुराण मानती है। सूचियों में थोड़ा अन्तर है; कुछ सूचियों में शिव पुराण के स्थान पर वायु पुराण है।
पुराण किसने लिखे?
परम्परा के अनुसार सभी अठारह महापुराणों के रचयिता वेदव्यास हैं, जिन्होंने इन्हें सूत लोमहर्षण को सिखाया। विद्वान इन्हें कई शताब्दियों में, मुख्यतः लगभग तीसरी से दसवीं शताब्दी ईस्वी के बीच विकसित ग्रन्थ मानते हैं।
सबसे बड़ा पुराण कौन-सा है?
स्कन्द पुराण, जिसमें परम्परा के अनुसार 81,100 श्लोक हैं। उसके बाद पद्म पुराण (55,000) है।
पुराण श्रुति हैं या स्मृति?
पुराण स्मृति हैं। उनका प्रामाण्य वेदों पर आधारित है, पर वे कथाओं के माध्यम से वैदिक सत्य समझाने वाले माने जाते हैं, और इतिहास-ग्रन्थों के साथ उन्हें 'पंचम वेद' कहा जाता है।
मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण क्यों पढ़ा जाता है?
इसका प्रेत खण्ड मृत्यु के बाद जीव की यात्रा और दिवंगत के संस्कारों का वर्णन करता है, इसलिए बहुत-से परिवार शोक-काल में, प्रायः तेरह दिनों तक, इसका पाठ करते हैं।
दुर्गा सप्तशती किस पुराण में है?
दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) मार्कण्डेय पुराण का अंग है।
स्रोत
- https://sa.wikisource.org/wiki/मत्स्यपुराणम्/अध्यायः_५३
- https://sa.wikisource.org/wiki/देवीभागवतपुराणम्/स्कन्धः_०१/अध्यायः_०३
- https://sa.wikisource.org/wiki/श्रीमद्भागवतपुराणम्/स्कन्धः_१२/अध्यायः_१३
- https://en.wikipedia.org/wiki/Puranas
- https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Page_of_Text,_Folio_from_a_Bhagavata_Purana_(Ancient_Stories_of_the_Lord)_LACMA_M.82.62.1_(1_of_2).jpg
अंतिम शोध: 2026-10-29