27 नक्षत्र
चंद्रमा के सत्ताईस घर, उनके देवता और प्रतीक
नक्षत्र भारतीय खगोलविद्या के 27 'चांद्र गृह' हैं: चंद्रमा के मार्ग के 13°20′ के बराबर भाग, जिनका नाम किसी तारे या तारा-समूह पर रखा गया है। चंद्रमा लगभग रोज़ एक नक्षत्र पार करता है। हर नक्षत्र का एक वैदिक अधिष्ठाता देवता और एक पारंपरिक प्रतीक है, और पंचांग में पर्व, संस्कार और नामकरण का समय तय करने में नक्षत्रों का प्रयोग होता है।
नक्षत्र क्या है
कुछ रातें लगातार चंद्रमा को देखिए, तो वह तारों के बीच रोज़ लगभग तेरह अंश पूर्व की ओर खिसकता दिखेगा। प्राचीन भारतीय आकाश-दर्शकों ने उसके मार्ग को पड़ावों में बाँटा, लगभग हर रात के लिए एक, और हर पड़ाव का नाम रास्ते में पड़ने वाले किसी प्रमुख तारे या तारा-समूह पर रखा: कृत्तिका कृत्तिका-पुंज (प्लीयडीज़) है, रोहिणी एल्डेबरन, चित्रा स्पाइका और स्वाति आर्कटूरस।
विकसित पद्धति में आकाश-वृत्त को 13°20′ के 27 बराबर भागों में बाँटा गया, ताकि 27 नक्षत्र ठीक 360 अंश भर दें, और हर नौ नक्षत्र चार राशियों के बराबर हों। पंचांग में 'आज का नक्षत्र' वही भाग है जिससे चंद्रमा गुज़र रहा है, और व्यक्ति का जन्म नक्षत्र वह है जिसमें जन्म के समय चंद्रमा था।
तिथि, वार, योग और करण के साथ नक्षत्र पंचांग के पाँच अंगों में से एक है।
वेदों में मूल
नक्षत्र भारतीय खगोलविद्या के सबसे पुराने तत्वों में से हैं। अथर्ववेद (शौनक शाखा, सूक्त 19.7) में कृत्तिका से शुरू होकर अभिजित सहित 28 नक्षत्रों की सूची है। तैत्तिरीय संहिता और शतपथ ब्राह्मण 27 नक्षत्र मानते हैं। इन पुरानी सूचियों में कृत्तिका पहले आती है, शायद इसलिए कि कभी वही वर्ष के आरंभ का संकेत थी। बाद के खगोलशास्त्र ने गिनती अश्विनी से शुरू की, और आज यही क्रम चलता है।
नक्षत्रों के देवता ज़्यादातर वैदिक हैं: अग्नि, सोम, रुद्र, अदिति, बृहस्पति, मित्र, वरुण, इंद्र, अश्विनीकुमार, वसु और पितर। इनमें से कई की आज अलग से पूजा कम होती है, इसलिए नक्षत्रों की सूची पुराने वैदिक देव-मंडल की एक झलक भी सहेजे हुए है।
पुराण और महाकाव्य यही बात कथा के रूप में कहते हैं। नक्षत्र दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ हैं, जिनका विवाह चंद्रदेव से हुआ। चंद्रमा बाकी सबसे अधिक रोहिणी को चाहते थे, और दक्ष के शाप को चंद्रमा के घटने-बढ़ने का कारण बताया जाता है; यह कथा गुजरात तट के सोमनाथ से भी जुड़ी है। हर रात किसी एक 'पत्नी' के पास चंद्रमा का जाना, 27 नक्षत्रों से उसके गुज़रने का काव्यात्मक चित्र है।
सभी 27 नक्षत्र: देवता और प्रतीक
नीचे की सूची अश्विनी से शुरू होने वाले आधुनिक क्रम में है। अलग-अलग ग्रंथों में प्रतीक अलग मिलते हैं, इसलिए कई जगह एक से अधिक प्रतीक दिए गए हैं। 'स्वामी ग्रह' ज्योतिष की विंशोत्तरी परंपरा में हर नक्षत्र को दिया गया ग्रह है, जिसमें नौ ग्रह तीन बार क्रम से आते हैं। विस्तार भारतीय (निरयण) राशिचक्र के अनुसार है।
- 1. अश्विनी
- देवता: अश्विनीकुमार, देवताओं के जुड़वाँ वैद्य। प्रतीक: घोड़े का सिर। पारंपरिक स्वामी ग्रह: केतु। विस्तार: 0°–13°20′ मेष।
- 2. भरणी
- देवता: यम (धर्मराज)। प्रतीक: योनि। पारंपरिक स्वामी ग्रह: शुक्र। विस्तार: 13°20′–26°40′ मेष।
- 3. कृत्तिका
- देवता: अग्नि। प्रतीक: छुरा या भाला। पारंपरिक स्वामी ग्रह: सूर्य। विस्तार: 26°40′ मेष–10° वृषभ।
- 4. रोहिणी
- देवता: ब्रह्मा (प्रजापति)। प्रतीक: रथ/गाड़ी, मंदिर या वटवृक्ष। पारंपरिक स्वामी ग्रह: चंद्र। विस्तार: 10°–23°20′ वृषभ।
- 5. मृगशिरा
- देवता: सोम (चंद्र)। प्रतीक: हिरण का सिर। पारंपरिक स्वामी ग्रह: मंगल। विस्तार: 23°20′ वृषभ–6°40′ मिथुन।
- 6. आर्द्रा
- देवता: रुद्र। प्रतीक: आँसू की बूँद, हीरा या मनुष्य का सिर। पारंपरिक स्वामी ग्रह: राहु। विस्तार: 6°40′–20° मिथुन।
- 7. पुनर्वसु
- देवता: अदिति, देवमाता। प्रतीक: धनुष और तरकश। पारंपरिक स्वामी ग्रह: गुरु (बृहस्पति)। विस्तार: 20° मिथुन–3°20′ कर्क।
- 8. पुष्य
- देवता: बृहस्पति, देवगुरु। प्रतीक: गाय का थन, कमल, या बाण और वृत्त। पारंपरिक स्वामी ग्रह: शनि। विस्तार: 3°20′–16°40′ कर्क।
- 9. आश्लेषा
- देवता: नाग (सर्प देवता)। प्रतीक: सर्प। पारंपरिक स्वामी ग्रह: बुध। विस्तार: 16°40′–30° कर्क।
- 10. मघा
- देवता: पितर। प्रतीक: राजसिंहासन। पारंपरिक स्वामी ग्रह: केतु। विस्तार: 0°–13°20′ सिंह।
- 11. पूर्वा फाल्गुनी
- देवता: भग, सौभाग्य के देवता। प्रतीक: पलंग के आगे के पाये, झूला, अंजीर का वृक्ष। पारंपरिक स्वामी ग्रह: शुक्र। विस्तार: 13°20′–26°40′ सिंह।
- 12. उत्तरा फाल्गुनी
- देवता: अर्यमा, मैत्री और वचन के देवता। प्रतीक: पलंग के पीछे के पाये, झूला। पारंपरिक स्वामी ग्रह: सूर्य। विस्तार: 26°40′ सिंह–10° कन्या।
- 13. हस्त
- देवता: सविता (सूर्य)। प्रतीक: हाथ या मुट्ठी। पारंपरिक स्वामी ग्रह: चंद्र। विस्तार: 10°–23°20′ कन्या।
- 14. चित्रा
- देवता: त्वष्टा या विश्वकर्मा, दिव्य शिल्पी। प्रतीक: चमकता रत्न या मोती। पारंपरिक स्वामी ग्रह: मंगल। विस्तार: 23°20′ कन्या–6°40′ तुला।
- 15. स्वाति
- देवता: वायु। प्रतीक: अंकुर, मूँगा। पारंपरिक स्वामी ग्रह: राहु। विस्तार: 6°40′–20° तुला।
- 16. विशाखा
- देवता: इंद्र और अग्नि (इंद्राग्नि)। प्रतीक: विजय-तोरण, कुम्हार का चाक। पारंपरिक स्वामी ग्रह: गुरु (बृहस्पति)। विस्तार: 20° तुला–3°20′ वृश्चिक।
- 17. अनुराधा
- देवता: मित्र। प्रतीक: तोरण, कमल। पारंपरिक स्वामी ग्रह: शनि। विस्तार: 3°20′–16°40′ वृश्चिक।
- 18. ज्येष्ठा
- देवता: इंद्र, देवराज। प्रतीक: गोल ताबीज़, छत्र या कुंडल। पारंपरिक स्वामी ग्रह: बुध। विस्तार: 16°40′–30° वृश्चिक।
- 19. मूल
- देवता: निर्ऋति। प्रतीक: जड़ों का गुच्छा, अंकुश। पारंपरिक स्वामी ग्रह: केतु। विस्तार: 0°–13°20′ धनु।
- 20. पूर्वाषाढ़ा
- देवता: आपः (जल देवता)। प्रतीक: हाथी दाँत, पंखा, सूप। पारंपरिक स्वामी ग्रह: शुक्र। विस्तार: 13°20′–26°40′ धनु।
- 21. उत्तराषाढ़ा
- देवता: विश्वेदेव। प्रतीक: हाथी दाँत, छोटा पलंग। पारंपरिक स्वामी ग्रह: सूर्य। विस्तार: 26°40′ धनु–10° मकर।
- 22. श्रवण
- देवता: विष्णु। प्रतीक: कान, या तीन पदचिह्न। पारंपरिक स्वामी ग्रह: चंद्र। विस्तार: 10°–23°20′ मकर।
- 23. धनिष्ठा
- देवता: अष्ट वसु। प्रतीक: मृदंग/ढोल या बाँसुरी। पारंपरिक स्वामी ग्रह: मंगल। विस्तार: 23°20′ मकर–6°40′ कुंभ।
- 24. शतभिषा
- देवता: वरुण। प्रतीक: खाली वृत्त; सहस्र पुष्प या तारे। पारंपरिक स्वामी ग्रह: राहु। विस्तार: 6°40′–20° कुंभ।
- 25. पूर्वा भाद्रपद
- देवता: अज एकपाद। प्रतीक: तलवारें, अर्थी के आगे के पाये, दो मुख वाला पुरुष। पारंपरिक स्वामी ग्रह: गुरु (बृहस्पति)। विस्तार: 20° कुंभ–3°20′ मीन।
- 26. उत्तरा भाद्रपद
- देवता: अहिर्बुध्न्य, गहराई का नाग। प्रतीक: जुड़वाँ, अर्थी के पीछे के पाये, जल में सर्प। पारंपरिक स्वामी ग्रह: शनि। विस्तार: 3°20′–16°40′ मीन।
- 27. रेवती
- देवता: पूषा, यात्रियों और पशुओं के रक्षक। प्रतीक: मछली या मछलियों का जोड़ा, ढोल। पारंपरिक स्वामी ग्रह: बुध। विस्तार: 16°40′–30° मीन।
पद और नामकरण की परंपरा
हर नक्षत्र 3°20′ के चार भागों में बँटा है, जिन्हें पद या चरण कहते हैं। सत्ताईस नक्षत्र गुणा चार पद, यानी 108। यही संख्या जपमाला के 108 मनकों और कई देवताओं के 108 नामों में भी मिलती है।
परंपरा हर पद को एक अक्षर देती है, और बहुत-से परिवारों में बच्चे के नाम का पहला अक्षर उसी पद से चुना जाता है जिसमें जन्म के समय चंद्रमा था। नामकरण संस्कार के समय कुल-पुरोहित जन्म की सही तारीख, समय और स्थान से इसकी गणना करते हैं। बहुत-से परिवार इस रीति को मानते हैं, और बहुत-से अपनी पसंद से नाम रखते हैं; दोनों ही जीवित परंपरा के हिस्से हैं।
पर्व और संस्कारों में नक्षत्र
कई पर्व तिथि के बजाय नक्षत्र से तय होते हैं। केरल का ओणम चिंगम मास के तिरुवोणम (श्रवण) नक्षत्र को मनाया जाता है; तिरुवातिरा आर्द्रा नक्षत्र पर शिवजी का उत्सव है; और चैत्र, वैशाख, कार्तिक जैसे चांद्र महीनों के नाम भी उसी नक्षत्र से आए हैं जिसके पास उस महीने पूर्णिमा होती है।
विवाह, गृह प्रवेश और दूसरे संस्कारों का मुहूर्त सुझाते समय भी पंचांग नक्षत्र देखता है, और कई समुदायों में विवाह से पहले वर-वधू के जन्म नक्षत्र मिलाए जाते हैं। ज्योतिष परंपरा में जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र से व्यक्ति की ग्रह-दशा की गणना की जाती है। ये आस्था और रीति की परंपराएँ हैं; ये बताती हैं कि परंपरा आकाश को कैसे पढ़ती है, किसी निश्चित परिणाम की गारंटी नहीं देतीं।
अभिजित: अट्ठाईसवाँ नक्षत्र
पुरानी सूचियों में एक अट्ठाईसवाँ नक्षत्र अभिजित भी है, जिसे लायरा तारामंडल के चमकीले तारे वेगा से पहचाना जाता है। जब आकाश को 27 बराबर भागों में बाँटा गया, तो 13°20′ के 27 भागों से सीमाएँ साफ़ बनती थीं, इसलिए अभिजित को अलग भाग नहीं मिला। फिर भी मुहूर्त-परंपरा में यह बचा रहा, और कुछ पंचांग आज भी अभिजित के छोटे-से समय को शुभ बताते हैं।
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
नक्षत्र कितने होते हैं?
नक्षत्र 27 हैं, हर एक आकाश के 13°20′ में फैला। अथर्ववेद 19.7 जैसी कुछ पुरानी सूचियाँ अभिजित जोड़कर 28 गिनती हैं।
27 नक्षत्रों के नाम क्रम से क्या हैं?
अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती।
मेरा नक्षत्र कैसे पता करें?
आपका जन्म नक्षत्र वह है जिसमें आपके जन्म के क्षण चंद्रमा था। इसकी गणना जन्म की सही तारीख, समय और स्थान से होती है, प्रायः पुरोहित या पंचांग की मदद से।
किस नक्षत्र के देवता कौन हैं?
हर नक्षत्र के एक अधिष्ठाता देवता हैं, जैसे कृत्तिका के अग्नि, रोहिणी के ब्रह्मा, आर्द्रा के रुद्र और श्रवण के विष्णु। पूरी सूची ऊपर दी गई है।
नक्षत्र का पद या चरण क्या है?
हर नक्षत्र के 3°20′ के चार भाग (पद) होते हैं, कुल 108। हर पद का एक पारंपरिक अक्षर है, जिससे अक्सर बच्चे के नाम का पहला अक्षर चुना जाता है।
वैदिक सूची कृत्तिका से और आज की सूची अश्विनी से क्यों शुरू होती है?
पुरानी वैदिक सूचियाँ कृत्तिका से शुरू होती थीं, शायद इसलिए कि वह कभी वर्ष के आरंभ का संकेत थी। बाद के खगोलशास्त्र ने गिनती अश्विनी से शुरू की।
स्रोत
- https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_Nakshatras
- https://en.wikipedia.org/wiki/Nakshatra
- https://en.wikipedia.org/wiki/Panchangam
- https://en.wikipedia.org/wiki/Astronomical_basis_of_the_Hindu_calendar
अंतिम शोध: 2026-10-29