मेरी श्रद्धा

नवग्रह

सूर्य, चंद्र, पाँच ग्रह और छाया ग्रह राहु-केतु, व्यासजी के स्तोत्र के साथ

नवग्रह हिंदू परंपरा में पूजे जाने वाले नौ ग्रह हैं: सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि और चंद्रमा के दो पात, राहु और केतु। इन्हीं के नाम पर सप्ताह के दिन हैं, मंदिरों में इनकी एक साथ पूजा होती है, और व्यासजी के नाम से प्रसिद्ध नवग्रह स्तोत्र जैसे स्तोत्रों से इनका स्मरण किया जाता है।

नवग्रह
Navagraha panel, Bihar, 10th century, San Diego Museum of Art; photo by Daderot, CC0 (Wikimedia Commons) Wikimedia Commons

नवग्रह कौन हैं

'ग्रह' का अर्थ ठीक-ठीक 'प्लैनेट' नहीं है। यह शब्द 'ग्रह्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है पकड़ना या ग्रहण करना; ग्रह वह है जो पृथ्वी के जीवन को प्रभावित करता है। नौ ग्रहों में सूर्य और चंद्रमा, आँखों से दिखने वाले पाँच ग्रह (मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि), और राहु-केतु हैं। राहु और केतु कोई पिंड नहीं हैं, बल्कि वे दो बिंदु हैं जहाँ चंद्रमा का मार्ग सूर्य के मार्ग को काटता है। ग्रहण इन्हीं बिंदुओं पर होते हैं, इसलिए राहु-केतु को छाया ग्रह कहा जाता है।

भक्ति-परंपरा में हर ग्रह एक देवता है, जिसका अपना रूप, वाहन, रंग और कथा है। ज्योतिष परंपरा जन्म के समय ग्रहों की स्थिति और आकाश में उनकी चाल को जीवन पर प्रभाव के रूप में पढ़ती है। विवाह, गृह प्रवेश और दूसरे संस्कारों में परिवार प्रायः नवग्रह पूजा या ग्रह-शांति करवाते हैं, ताकि सभी नौ ग्रहों का सम्मान हो। यहाँ हम इसे वैसे ही रख रहे हैं जैसे परंपरा इसे समझती है: श्रद्धा और प्रार्थना के रूप में, भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

नौ ग्रह

सूर्य से शनि तक के सात ग्रहों के नाम पर सप्ताह के दिन हैं, रविवार से शनिवार तक। राहु और केतु का कोई अपना वार नहीं है।

सूर्य
रवि, आदित्य। रविवार। परंपरा में आत्मा, तेज और राजत्व के कारक; नवग्रह मंडप के केंद्र में।
चंद्र
सोम। सोमवार। मन और भावनाओं के कारक; शिवजी के मस्तक पर विराजमान।
मंगल
भौम, कुज, 'भूमिपुत्र'। मंगलवार। साहस और ऊर्जा; लाल वर्ण, हाथ में शक्ति।
बुध
सौम्य। बुधवार। बुद्धि और वाणी; पौराणिक वंशावली में चंद्रमा के पुत्र।
बृहस्पति / गुरु
गुरुवार। देवताओं के गुरु; परंपरा में ज्ञान, धर्म और आशीर्वाद के कारक।
शुक्र
भार्गव। शुक्रवार। असुरों के गुरु, संजीवनी विद्या के ज्ञाता; कला, सौंदर्य और सुख।
शनि
शनैश्चर, 'धीरे चलने वाले'। शनिवार। सूर्य और छाया के पुत्र; अनुशासन, न्याय और कर्मफल।
राहु
छाया ग्रह: चंद्रमा का आरोही पात (नोड), जहाँ ग्रहण होते हैं। कटे सिर के रूप में दर्शाए जाते हैं।
केतु
छाया ग्रह: चंद्रमा का अवरोही पात। सर्प-पूँछ वाले सिर-रहित धड़ के रूप में दर्शाए जाते हैं।

राहु, केतु और समुद्र मंथन

राहु-केतु की सबसे प्रसिद्ध कथा पुराणों में वर्णित समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब अमृत निकला, तो भगवान विष्णु मोहिनी रूप में देवताओं को अमृत बाँटने लगे। स्वर्भानु नाम का असुर वेश बदलकर देवताओं के बीच बैठ गया, पर सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया। अमृत उसके गले से नीचे उतरे, इससे पहले ही विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया। अमृत चख लेने के कारण दोनों भाग जीवित रहे: सिर राहु बना और धड़ केतु। सूर्य और चंद्रमा से उनकी शत्रुता को ग्रहण का पारंपरिक कारण बताया जाता है, जब राहु कुछ देर के लिए उन्हें 'ग्रस' लेता है।

नवग्रह स्तोत्र में भी यही चित्र है: राहु 'आधे शरीर वाले' और 'चंद्र-सूर्य को ग्रसने वाले' हैं, जो स्वर्भानु की माता सिंहिका से उत्पन्न हुए।

नवग्रह स्तोत्र

नौ ग्रहों का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला स्तोत्र 'जपाकुसुमसंकाशं' से शुरू होने वाला नवग्रह स्तोत्र है। इसकी अंतिम पंक्तियाँ व्यासजी को इसका रचयिता बताती हैं। इसमें पारंपरिक क्रम से हर ग्रह के लिए एक श्लोक है: सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु। हर श्लोक उस ग्रह का छोटा-सा चित्र खींचता है: उसका रंग, उसकी उत्पत्ति और उसकी भूमिका। बहुत-से भक्त इसे रोज़, या किसी विशेष ग्रह के वार पर पढ़ते हैं। नीचे का पाठ sanskritdocuments.org के संस्करण के अनुसार है।

  1. जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् । तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥ १॥

    japākusumasaṃkāśaṃ kāśyapeyaṃ mahādyutim | tamo'riṃ sarvapāpaghnaṃ praṇato'smi divākaram || 1 ||

    अर्थ: सूर्य: जपाकुसुम (गुड़हल) के समान लाल, कश्यप के पुत्र, महान तेज वाले, अंधकार के शत्रु और सब पापों का नाश करने वाले दिवाकर को मैं प्रणाम करता हूँ।

  2. दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसंभवम् । नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ॥ २॥

    dadhiśaṅkhatuṣārābhaṃ kṣīrodārṇavasaṃbhavam | namāmi śaśinaṃ somaṃ śambhor mukuṭabhūṣaṇam || 2 ||

    अर्थ: चंद्र: दही, शंख और हिम के समान श्वेत, क्षीरसागर से उत्पन्न, शम्भु के मुकुट के आभूषण, शशि (खरगोश-चिह्न वाले) सोम को मैं नमन करता हूँ।

  3. धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् । कुमारं शक्तिहस्तं तं मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥ ३॥

    dharaṇīgarbhasaṃbhūtaṃ vidyutkāntisamaprabham | kumāraṃ śaktihastaṃ taṃ maṅgalaṃ praṇamāmy aham || 3 ||

    अर्थ: मंगल: पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न, बिजली की चमक के समान प्रभा वाले, हाथ में शक्ति (भाला) धारण करने वाले कुमार मंगल को मैं प्रणाम करता हूँ।

  4. प्रियङ्गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् । सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ॥ ४॥

    priyaṅgukalikāśyāmaṃ rūpeṇāpratimaṃ budham | saumyaṃ saumyaguṇopetaṃ taṃ budhaṃ praṇamāmy aham || 4 ||

    अर्थ: बुध: प्रियंगु की कली के समान श्याम, अनुपम रूप वाले, सौम्य और सौम्य गुणों से युक्त बुध को मैं प्रणाम करता हूँ।

  5. देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसंनिभम् । बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥ ५॥

    devānāṃ ca ṛṣīṇāṃ ca guruṃ kāñcanasaṃnibham | buddhibhūtaṃ trilokeśaṃ taṃ namāmi bṛhaspatim || 5 ||

    अर्थ: बृहस्पति: देवताओं और ऋषियों के गुरु, स्वर्ण के समान कांति वाले, बुद्धि-स्वरूप, तीनों लोकों के स्वामी बृहस्पति को मैं नमन करता हूँ।

  6. हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् । सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥ ६॥

    himakundamṛṇālābhaṃ daityānāṃ paramaṃ gurum | sarvaśāstrapravaktāraṃ bhārgavaṃ praṇamāmy aham || 6 ||

    अर्थ: शुक्र: हिम, कुंद पुष्प और कमलनाल के समान उज्ज्वल, दैत्यों के परम गुरु, सब शास्त्रों के व्याख्याता भार्गव (शुक्र) को मैं प्रणाम करता हूँ।

  7. नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् । छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥ ७॥

    nīlāñjanasamābhāsaṃ raviputraṃ yamāgrajam | chāyāmārtaṇḍasaṃbhūtaṃ taṃ namāmi śanaiścaram || 7 ||

    अर्थ: शनि: नीले अंजन (काजल) के समान आभा वाले, सूर्यपुत्र, यम के बड़े भाई, छाया और मार्तंड (सूर्य) से उत्पन्न शनैश्चर को मैं नमन करता हूँ।

  8. अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम् । सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥ ८॥

    ardhakāyaṃ mahāvīryaṃ candrādityavimardanam | siṃhikāgarbhasaṃbhūtaṃ taṃ rāhuṃ praṇamāmy aham || 8 ||

    अर्थ: राहु: आधे शरीर वाले, महापराक्रमी, चंद्रमा और सूर्य को ग्रसने वाले, सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।

  9. पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् । रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥ ९॥

    palāśapuṣpasaṃkāśaṃ tārakāgrahamastakam | raudraṃ raudrātmakaṃ ghoraṃ taṃ ketuṃ praṇamāmy aham || 9 ||

    अर्थ: केतु: पलाश के फूल के समान लाल, तारों और ग्रहों में शिरोमणि, रौद्र, रौद्र स्वभाव वाले और भयंकर केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।

  10. इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत्सुसमाहितः । दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति ॥ १०॥

    iti vyāsamukhodgītaṃ yaḥ paṭhet susamāhitaḥ | divā vā yadi vā rātrau vighnaśāntir bhaviṣyati || 10 ||

    अर्थ: फलश्रुति: व्यासजी के मुख से गाए गए इस स्तोत्र को जो दिन में या रात में एकाग्र मन से पढ़ता है, उसके विघ्न शांत होते हैं। (यह स्तोत्र की अपनी पारंपरिक फलश्रुति है।)

ग्रहों के साथ प्रातः-स्मरण

कई घरों में प्रिय एक और श्लोक वामन पुराण में प्रातःकाल की प्रार्थना (सुप्रभातम्) के रूप में आता है। इसमें त्रिदेव और सूर्य से शनि तक के ग्रहों से दिन की शुभ शुरुआत की प्रार्थना है। बहुत-से परिवार इसे जागते ही पढ़ते हैं।

  1. ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्रः सह भानुजेन कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्।। १४.२३

    brahmā murāris tripurāntakārī bhānuḥ śaśī bhūmisuto budhaś ca | guruś ca śukraḥ saha bhānujena kurvantu sarve mama suprabhātam || 14.23 ||

    अर्थ: ब्रह्मा, मुरारि (विष्णु) और त्रिपुरारि (शिव), सूर्य, चंद्रमा, भूमिपुत्र (मंगल) और बुध, गुरु और शुक्र, सूर्यपुत्र (शनि) के साथ, सभी मेरी सुबह को मंगलमय करें। (वामन पुराण 14.23)

मंदिरों में नवग्रह

भारत के अधिकांश मंदिरों में, विशेषकर शिव मंदिरों में, नवग्रहों का एक मंडप होता है। सामान्य व्यवस्था में सूर्य बीच में होते हैं और बाकी आठ ग्रह उनके चारों ओर, हर एक अलग दिशा में मुख किए, ताकि कोई दो ग्रह आमने-सामने न हों। भक्त मंडप की दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) परिक्रमा करते हैं, प्रायः नौ बार, और दीप, फूल या अनाज चढ़ाते हैं। दक्षिण भारत के कई शैव मंदिरों में सभी नौ ग्रह एक पंक्ति में मुख्य गर्भगृह की ओर मुख किए खड़े होते हैं।

तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा में कुंभकोणम के लगभग 100 किलोमीटर के दायरे में नौ मंदिरों की प्रसिद्ध यात्रा है, जिनमें हर मंदिर एक ग्रह से जुड़ा है। तीर्थयात्री अक्सर एक ही यात्रा में सभी नौ के दर्शन करते हैं। इन मंदिरों की वर्तमान पत्थर की संरचनाएँ अधिकतर मध्यकालीन चोल काल की हैं।

इतिहास: वेदों से नवग्रह तक

विद्वान नवग्रह-समूह का विकास धीरे-धीरे हुआ मानते हैं। ऋग्वेद और अथर्ववेद सूर्य, चंद्रमा और तारों का सम्मान करते हैं, पर नौ ग्रह-देवताओं का कोई समूह नहीं बताते। छांदोग्य उपनिषद में ग्रहण के संदर्भ में राहु का उल्लेख मिलता है। पाँच ग्रह और सात दिनों का सप्ताह भारतीय खगोलशास्त्र में ईसवी सन् की आरंभिक शताब्दियों में स्थापित हुए, जब यूनानी और बेबीलोनी खगोलविद्या से संपर्क रहा, और लगभग 8वीं–9वीं शताब्दी तक राहु-केतु छाया ग्रहों के रूप में पूरी तरह स्थापित हो गए। मध्यकालीन भारत के नवग्रह शिलापट्ट, जैसे यहाँ दिखाया गया बिहार का 10वीं शताब्दी का पट्ट, सभी नौ ग्रहों को देवताओं के एक समूह के रूप में दिखाते हैं।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

नवग्रहों के नाम क्या हैं?

सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति (गुरु), शुक्र, शनि, राहु और केतु।

नवग्रह मंत्र कौन-सा है?

सबसे प्रसिद्ध 'जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्' से शुरू होने वाला नवग्रह स्तोत्र है, जो व्यासकृत माना जाता है और जिसमें हर ग्रह का एक श्लोक है। पूरा पाठ अर्थ सहित ऊपर दिया गया है।

क्या राहु और केतु सच में ग्रह हैं?

नहीं। ये वे दो बिंदु हैं जहाँ चंद्रमा की कक्षा सूर्य के आभासी मार्ग को काटती है और जहाँ ग्रहण होते हैं। परंपरा इन्हें छाया ग्रह कहती है।

मंदिर में नवग्रह की परिक्रमा कैसे करें?

भक्त प्रायः नवग्रह मंडप की घड़ी की दिशा में, अक्सर नौ बार, परिक्रमा करते हैं और दीप या फूल चढ़ाते हैं। हर मंदिर की अपनी रीति हो सकती है, इसलिए पुजारी के मार्गदर्शन का पालन करें।

किस वार का कौन-सा ग्रह है?

रविवार सूर्य का, सोमवार चंद्र का, मंगलवार मंगल का, बुधवार बुध का, गुरुवार बृहस्पति का, शुक्रवार शुक्र का और शनिवार शनि का। राहु-केतु का कोई वार नहीं है।

स्रोत

अंतिम शोध: 2026-10-29

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