यमुनोत्री मन्दिर
यमुना के उद्गम पर माँ यमुना का हिमालयी धाम, जहाँ से चार धाम यात्रा शुरू होती है
यमुनोत्री मन्दिर उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी ज़िले में बन्दरपूँछ पर्वत की ढलान पर, यमुना के उद्गम के पास, लगभग 3,293 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह छोटा चार धाम का सबसे पश्चिमी धाम है और परम्परा से हिमालयी यात्रा का पहला पड़ाव। श्रद्धालु जानकी चट्टी से लगभग 6 किलोमीटर चढ़कर सूर्यपुत्री और यमराज की बहन माँ यमुना की पूजा करते हैं, और सूर्य कुण्ड के खौलते जल में चावल पकाकर प्रसाद बनाते हैं। मन्दिर अक्षय तृतीया से भाई दूज तक खुला रहता है, और सर्दियों में माँ यमुना खरसाली में विराजती हैं।

इतिहास
ऋग्वेद से लेकर आगे तक यमुना को पवित्र नदी के रूप में पूजा गया है, और पुराण उसके जल को पापनाशक बताते हैं; उत्तराखण्ड के समाचारों में उद्धृत पद्म पुराण उसे दुःख हरने वाली और कल्याण करने वाली कहता है। गढ़वाल हिमालय में ऊँचाई पर स्थित इस नदी का उद्गम लम्बे समय से साधुओं और यमुना घाटी के लोगों का तीर्थ रहा है, और परम्परा इसे असित मुनि से जोड़ती है, जिन्होंने यहाँ निवास और तप किया।
यमुना का वास्तविक उद्गम कालिन्द पर्वत पर लगभग 4,421 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यमुनोत्री (चम्पासर) हिमनद है, जो मन्दिर से करीब एक किलोमीटर ऊपर है। वहाँ पहुँचना बहुत कठिन होने के कारण मन्दिर नीचे, ढलान की तलहटी में गर्म जल स्रोतों के पास बनाया गया, और श्रद्धालु वहीं पूजा करते हैं। विकिपीडिया के अनुसार वर्तमान मन्दिर बनने से पहले यहाँ एक छोटा देवस्थान था।
वर्तमान मन्दिर का इतिहास ठीक से दर्ज नहीं है और स्रोतों में मतभेद है। उत्तराखण्ड सरकार के चार धाम पंजीकरण पोर्टल के अनुसार इसे मूल रूप से टिहरी गढ़वाल के महाराजा प्रताप शाह ने बनवाया; विकिपीडिया 1839 का वर्ष और टिहरी के राजा सुदर्शन शाह का नाम भी देता है; और कई मार्गदर्शिकाएँ कहती हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में जयपुर की महारानी गुलेरिया ने इसका पुनर्निर्माण कराया। इतना स्पष्ट है कि टिहरी गढ़वाल के राजाओं ने इस धाम को संरक्षण दिया, और मन्दिर को एक से अधिक बार फिर से बनाना पड़ा — विकिपीडिया के अनुसार बर्फ़ और बाढ़ से यह दो बार नष्ट हुआ।
यमुनोत्री की पूजा खरसाली गाँव के उनियाल पुरोहित परिवार के हाथों में है; यही गाँव माँ यमुना का शीतकालीन निवास भी है। मन्दिर का प्रबन्ध स्थानीय श्री यमुनोत्री मन्दिर समिति करती है, जिसके पदाधिकारी हर वर्ष कपाट खुलने और बन्द होने की तिथियाँ घोषित करते हैं। 2019 में उत्तराखण्ड सरकार ने चार धाम के मन्दिरों को देवस्थानम प्रबन्धन बोर्ड के अधीन किया था, पर तीर्थ पुरोहितों के विरोध के बाद 2021 में यह क़ानून वापस ले लिया गया।
सड़कें बनने से पहले यात्री हनुमान चट्टी से पूरा रास्ता पैदल चलते थे। अब सड़क जानकी चट्टी तक जाती है, जिससे पैदल रास्ता लगभग 7 किलोमीटर कम हो गया, और अन्तिम 6 किलोमीटर पैदल, घोड़े, पालकी या डण्डी से तय होते हैं। इक्कीसवीं सदी में यात्रियों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है — आकाशवाणी के अनुसार 2025 के यात्राकाल में गंगोत्री और यमुनोत्री में मिलाकर 14 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुँचे — और अब उत्तराखण्ड सरकार के पास यात्रा पंजीकरण अनिवार्य है।
पौराणिक कथा
हिन्दू परम्परा में यमुना सूर्यदेव और उनकी पत्नी संज्ञा की पुत्री और मृत्यु के देवता यमराज की जुड़वाँ बहन हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि इसी सम्बन्ध के कारण यमुना में स्नान करने वाले को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। परम्परा के अनुसार यम द्वितीया (भाई दूज) के दिन यमराज अपनी बहन से मिलने आए और उन्हें वरदान दिया; इसीलिए उस दिन भाई-बहन साथ में यमुना स्नान करते हैं, और इसी पर्व पर हर वर्ष मन्दिर के कपाट बन्द होते हैं।
स्थानीय परम्परा असित मुनि की कथा सुनाती है, जो यमुनोत्री में रहते थे और प्रतिदिन गंगा और यमुना दोनों में स्नान करते थे। बुढ़ापे में जब वे गंगोत्री तक नहीं जा पाते थे, तब कहा जाता है कि उनके आश्रम के सामने गंगा की एक धारा प्रकट हुई, ताकि उनकी पूजा चलती रहे। मन्दिर के पास श्रद्धालु आज भी यह धारा दिखाते हैं।
धाम के ऊपर का पर्वत बन्दरपूँछ है। स्थानीय मान्यता है कि लंका दहन के बाद हनुमान जी ने इसी शिखर की एक झील में अपनी जलती पूँछ बुझाई थी। जिस कालिन्द पर्वत से नदी निकलती है, उसी से यमुना का दूसरा नाम 'कालिन्दी' पड़ा।
माँ यमुना के शीतकालीन निवास खरसाली में शनिदेव का एक पुराना मन्दिर है, जहाँ वे सोमेश्वर महाराज के रूप में पूजे जाते हैं; दोनों के सूर्यपुत्र होने के कारण उन्हें यमुना का भाई माना जाता है। हर वर्ष कपाट खुलने पर उनकी डोली यमुना की डोली के साथ धाम तक जाती है और कपाट बन्द होने पर साथ लौटती है — जैसे कोई भाई अपनी बहन को मायके से ससुराल और फिर वापस पहुँचाता है।
स्थापत्य कला
यमुनोत्री एक छोटा हिमालयी मन्दिर है, जो खड़ी ढलानों के बीच यमुना के बाएँ किनारे पर एक संकरी समतल जगह पर बना है। इसका गर्भगृह साधारण है और ऊपर स्तरों वाली पिरामिडनुमा छत है — मैदानों के विशाल पाषाण मन्दिरों से अलग, गढ़वाल की पहाड़ियों के देवस्थानों जैसा — और यह चटकीले रंगों से रंगा है। बर्फ़, भूस्खलन और बाढ़ के ख़तरे वाली इस जगह पर मन्दिर की कई बार मरम्मत और पुनर्निर्माण हुआ है।
गर्भगृह में माँ यमुना की काले पत्थर की प्रतिमा है (विकिपीडिया इसे काला संगमरमर बताता है)। परम्परा के अनुसार उनके पास माँ गंगा की प्रतिमा भी विराजमान है, ताकि श्रद्धालु दोनों नदी-देवियों की एक साथ पूजा कर सकें।
मन्दिर के आसपास के पवित्र स्थल भवन जितने ही महत्वपूर्ण हैं। सूर्य कुण्ड यहाँ के गर्म जल स्रोतों में सबसे गर्म है — इतना कि श्रद्धालु मलमल के कपड़े में चावल और आलू बाँधकर इसमें पकाते हैं और पका चावल प्रसाद के रूप में घर ले जाते हैं। इसके पास दिव्य शिला है, एक शिला-स्तम्भ, जिसकी पूजा मन्दिर में प्रवेश से पहले की जाती है। श्रद्धालु गर्म स्रोतों से भरे जमुना बाई कुण्ड में स्नान भी करते हैं।
दैनिक पूजा-अर्चना
प्रातःकालीन अभिषेक और आरती
भोर मेंदिन की शुरुआत उनियाल पुरोहितों द्वारा माँ यमुना के अभिषेक और आरती से होती है। सटीक समय हर यात्राकाल में मन्दिर समिति घोषित करती है; सरकारी पोर्टल के अनुसार दर्शन और आरती का समय 'जल्द घोषित' किया जाएगा।
दिव्य शिला पूजन
दर्शन से पहलेश्रद्धालु मन्दिर में प्रवेश से पहले सूर्य कुण्ड के पास स्थित पवित्र शिला-स्तम्भ, दिव्य शिला, की पूजा करते हैं।
सूर्य कुण्ड में प्रसाद पकाना
मलमल के कपड़े में बँधे चावल और आलू सूर्य कुण्ड के खौलते जल में डाले जाते हैं। पका चावल माँ को अर्पित कर प्रसाद के रूप में घर ले जाया जाता है।
गर्म कुण्ड में स्नान
जानकी चट्टी से ठण्डी चढ़ाई के बाद बहुत से श्रद्धालु दर्शन से पहले गुनगुने जमुना बाई कुण्ड में स्नान करते हैं।
सायं आरती
शामदिन का समापन यमुना मैया की सायं आरती से होता है। अँधेरा होने के बाद मन्दिर प्रायः बन्द हो जाता है; यात्राकाल में समय बदलता रहता है।
खरसाली में शीतकालीन पूजा
भाई दूज से अक्षय तृतीया तककपाट बन्द होने के बाद माँ की उत्सव मूर्ति डोली में खरसाली (खुशीमठ) ले जाई जाती है, जहाँ पूरी सर्दी उनकी नित्य पूजा होती है और श्रद्धालु दर्शन कर सकते हैं।
समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।
पर्व-उत्सव
चैत्र शुक्ल षष्ठी (मार्च–अप्रैल)
यमुना जयन्ती और कपाट खुलने की घोषणा
यमुना जयन्ती माँ यमुना के धरती पर अवतरण का पर्व है। इसी दिन खरसाली में मन्दिर समिति कपाट खुलने की तिथि और मुहूर्त तय करती है।
अक्षय तृतीया (अप्रैल–मई)
डोली यात्रा और कपाटोद्घाटन
कपाट खुलने की सुबह ढोल-नगाड़ों और जयकारों के साथ माँ की डोली खरसाली से निकलती है; साथ में शनिदेव (सोमेश्वर महाराज) की डोली अपनी बहन को विदा करने आती है। घोषित मुहूर्त पर कपाट खुलते हैं और चार धाम यात्रा का मौसम शुरू हो जाता है।
दीपावली के दो दिन बाद (अक्टूबर–नवम्बर)
भाई दूज (यम द्वितीया) और कपाट बन्द
यम और यमुना के मिलन के दिन ही मन्दिर के कपाट बन्द होते हैं। विशेष पूजा के बाद घोषित मुहूर्त पर कपाट बन्द किए जाते हैं, और शनिदेव की डोली के साथ माँ यमुना की डोली सर्दियों के लिए खरसाली लौटती है।
कैसे पहुँचें
- हवाई मार्ग
- निकटतम हवाई अड्डा देहरादून का जॉली ग्रांट एयरपोर्ट है, जो सड़क से जानकी चट्टी से लगभग 200 किलोमीटर दूर है। यात्राकाल में देहरादून से हेलिकॉप्टर चार्टर खरसाली उतरते हैं, जो मन्दिर से लगभग 5–6 किलोमीटर दूर है।
- रेल मार्ग
- निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून (यमुनोत्री तक सड़क से लगभग 180 किलोमीटर), ऋषिकेश (लगभग 210 किलोमीटर) और हरिद्वार (लगभग 220 किलोमीटर) हैं। इन शहरों से बड़कोट और जानकी चट्टी के लिए बसें और टैक्सियाँ चलती हैं।
- सड़क मार्ग
- सड़क मसूरी या विकासनगर होते हुए बड़कोट और फिर यमुना घाटी में स्याना चट्टी व हनुमान चट्टी से होकर जानकी चट्टी तक जाती है, जो अन्तिम मोटर मार्ग है। जानकी चट्टी से मन्दिर तक लगभग 6 किलोमीटर (2–3 घण्टे) की खड़ी चढ़ाई है, जिसे पैदल या घोड़े, पालकी अथवा डण्डी से तय किया जाता है। उत्तरकाशी लगभग 125 किलोमीटर दूर है। उत्तराखण्ड सरकार के पोर्टल पर चार धाम यात्रा का पंजीकरण अनिवार्य है।
- दर्शन का सबसे अच्छा समय
- मन्दिर अक्षय तृतीया (अप्रैल–मई) से भाई दूज (अक्टूबर–नवम्बर) तक खुला रहता है। मई–जून और सितम्बर–अक्टूबर सबसे अच्छे महीने हैं। जुलाई–अगस्त के मानसून में सड़क और पैदल मार्ग पर भूस्खलन का ख़तरा रहता है, और नवम्बर से अप्रैल तक धाम बर्फ़ से ढका और बन्द रहता है, पर तब खरसाली में माँ के दर्शन किए जा सकते हैं।
तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव
- यात्रा से पहले उत्तराखण्ड सरकार के पोर्टल (registrationandtouristcare.uk.gov.in) पर चार धाम यात्रा का पंजीकरण कराएँ।
- जानकी चट्टी से 6 किलोमीटर की चढ़ाई सुबह जल्दी शुरू करें; रास्ता खड़ा है, इसलिए पानी, बरसाती और गर्म कपड़े साथ रखें, और ज़रूरत हो तो अधिकृत काउंटर से घोड़ा या पालकी लें।
- सूर्य कुण्ड में चावल का प्रसाद पकाने के लिए मलमल का छोटा कपड़ा साथ लाएँ, और खौलते पानी के पास सावधानी रखें।
- चढ़ाई से पहले शरीर को ऊँचाई का आदी बनाने के लिए बड़कोट या जानकी चट्टी में एक रात रुकें, और अँधेरे में चढ़ाई-उतराई से बचें।
- जानकी चट्टी के सामने, नदी पार, माँ के शीतकालीन निवास खरसाली गाँव और वहाँ के पुराने शनि मन्दिर के दर्शन करें।
इस यात्रा के लिए साथ रखें
- रेन पोंचोकेदारनाथ और वैष्णो देवी के रास्ते में पहाड़ी मौसम जल्दी बदलता है।Amazon पर दाम देखें
- ट्रेकिंग स्टिकलंबी खड़ी चढ़ाई पर घुटनों का बोझ कम करती है।Amazon पर दाम देखें
- थर्मल इनरवियरहिमालयी धामों में गर्मियों में भी रातें ठंडी होती हैं।Amazon पर दाम देखें
- 30 लीटर डे-पैकदर्शन के दिन पानी, प्रसाद, शॉल और कागज़ात के लिए।Amazon पर दाम देखें
Amazon Associate के रूप में मेरी श्रद्धा योग्य ख़रीद पर कमीशन पाती है। इससे आपको कोई अतिरिक्त ख़र्च नहीं होता और यह ज्ञान-कोष निःशुल्क बना रहता है।
श्रद्धालुओं के प्रश्न
यमुनोत्री मन्दिर की कथा क्या है?
माँ यमुना सूर्यदेव की पुत्री और मृत्यु के देवता यमराज की बहन हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि उनके जल में स्नान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। परम्परा के अनुसार असित मुनि ने यहाँ निवास और तप किया, और मन्दिर कालिन्द पर्वत पर यमुना के उद्गम के पास स्थित है।
यमुनोत्री के कपाट कब खुलते और बन्द होते हैं?
कपाट खुलने की तिथि यमुना जयन्ती पर खरसाली में तय होती है, और कपाट प्रायः अप्रैल या मई में अक्षय तृतीया को खुलते हैं। मन्दिर दीपावली के दो दिन बाद, भाई दूज पर, अक्टूबर या नवम्बर में बन्द होता है। सटीक समय हर वर्ष मन्दिर समिति घोषित करती है।
यमुनोत्री की पैदल यात्रा कितनी लम्बी है?
अन्तिम सड़क बिन्दु जानकी चट्टी से मन्दिर तक की चढ़ाई लगभग 6 किलोमीटर है और पैदल प्रायः 2–3 घण्टे लगते हैं। घोड़े, पालकी और डण्डी उपलब्ध रहते हैं।
यमुनोत्री मन्दिर कैसे पहुँचें?
विमान या ट्रेन से देहरादून, ऋषिकेश या हरिद्वार पहुँचें, फिर सड़क मार्ग से बड़कोट होते हुए जानकी चट्टी (लगभग 180–220 किलोमीटर) जाएँ। वहाँ से लगभग 6 किलोमीटर की चढ़ाई करके मन्दिर पहुँचते हैं। यात्राकाल में देहरादून से हेलिकॉप्टर चार्टर खरसाली उतरते हैं।
सर्दियों में माँ यमुना की पूजा कहाँ होती है?
सर्दियों में माँ की उत्सव मूर्ति जानकी चट्टी के पास खरसाली (खुशीमठ) गाँव ले जाई जाती है, जहाँ अक्षय तृतीया पर कपाट फिर खुलने तक उनकी नित्य पूजा होती है। शनिदेव की डोली उन्हें आते-जाते साथ देती है।
स्रोत
- https://en.wikipedia.org/wiki/Yamunotri_Temple
- https://en.wikipedia.org/wiki/Yamunotri
- https://uttarkashi.nic.in/tourist-place/yamunotri/
- https://registrationandtouristcare.uk.gov.in/dham_detail.php?dham=MQ==
- https://www.etvbharat.com/en/state/yamunotri-dham-to-open-doors-at-12-35-pm-on-april-19-on-akshaya-tritiya-enn26032402724
- https://www.etvbharat.com/en/!bharat/yamunotri-dham-doors-closed-for-winter-in-uttarakhand-enn24110302492
- https://www.newsonair.gov.in/shri-kedarnath-and-shri-yamunotri-temples-close-for-winter-on-bhaiya-dooj
- https://www.newsonair.gov.in/gangotri-dham-closed-for-winter-today-on-annakut-festival-idol-of-goddess-ganga-moved-to-mukhba