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श्री जगन्नाथ मन्दिर, पुरी

बंगाल की खाड़ी के तट पर जगत के नाथ का धाम, चार धाम का पूर्वी धाम

ओडिशा में बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित पुरी का श्री जगन्नाथ मन्दिर चार धाम का पूर्वी धाम और भारत के सबसे महत्वपूर्ण वैष्णव तीर्थों में से एक है। यहाँ भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के रूप जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा और सुदर्शन चक्र के साथ लकड़ी की प्रतिमाओं में पूजे जाते हैं, जिनका नवकलेवर में नवीकरण होता है। वर्तमान मन्दिर बारहवीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा अनन्तवर्मन चोडगंग ने बनवाना शुरू किया, और यहाँ की वार्षिक रथ यात्रा में दुनिया भर से श्रद्धालु आते हैं।

श्री जगन्नाथ मन्दिर, पुरी
चित्र: Wikimedia Commons

इतिहास

पुरी, जिसे प्राचीन ग्रन्थों में पुरुषोत्तम क्षेत्र, श्रीक्षेत्र और नीलाचल कहा गया है, वर्तमान मन्दिर बनने से बहुत पहले से पवित्र स्थान था। स्कन्द पुराण का 'पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य' इसी को समर्पित है, और नारद तथा मत्स्य पुराण भी इसे विष्णु का पवित्र क्षेत्र बताते हैं। ग्यारहवीं शताब्दी के नाटक 'प्रबोध चन्द्रोदय' में यहाँ पुरुषोत्तम के मन्दिर का उल्लेख है, और परम्परा के अनुसार आदि शंकराचार्य ने पुरी आकर अपने चार मठों में से एक, गोवर्धन मठ की स्थापना की।

श्री जगन्नाथ मन्दिर प्रशासन (एसजेटीए) के अनुसार वर्तमान मन्दिर पूर्वी गंग वंश के संस्थापक अनन्तवर्मन चोडगंग देव ने बारहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में बनवाया। इतिहासकार निर्माण की शुरुआत लगभग 1112 में इस क्षेत्र पर उनकी विजय के बाद मानते हैं, और 1134–35 का एक शिलालेख मन्दिर को उनके दान का उल्लेख करता है। एसजेटीए के अनुसार 1230 में अनंगभीम देव तृतीय ने मन्दिर पूरा कराया और विग्रहों की प्रतिष्ठा की। अनंगभीम ने अपना राज्य जगन्नाथ को समर्पित कर स्वयं को उनका सेवक (राउत) कहा, और उनके उत्तराधिकारियों के समय 'जगन्नाथ' नाम जन-जन में प्रचलित हुआ।

1435 से कपिलेन्द्र देव से शुरू हुए सूर्यवंशी गजपति राजाओं के समय यह मन्दिर ओडिशा के राज्य और संस्कृति का केन्द्र बन गया। पुरुषोत्तम देव ने इसकी पूजा-विधि पर 'नीलाद्रिनाथ पूजा विधि' ग्रन्थ लिखा, और प्रतापरुद्र देव (1497–1540) के शासनकाल में श्री चैतन्य महाप्रभु पुरी आए और 24 वर्ष यहीं रहे, जिससे यह गौड़ीय वैष्णव परम्परा का केन्द्र बना। रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य, वल्लभाचार्य और गुरु नानक देव समेत अनेक आचार्य और सन्त पुरी से जुड़े रहे।

मन्दिर पर बार-बार आक्रमण हुए। मन्दिर के इतिवृत्त 'मादला पांजी' और बाद के इतिहासकारों के अनुसार 1568 में अन्तिम स्वतन्त्र गजपति के पतन के बाद बंगाल सल्तनत के सेनापति कालापहाड़ ने पुरी पर आक्रमण कर ख़ज़ाना लूटा और लकड़ी के विग्रह जला दिए। मन्दिर की परम्परा के अनुसार भक्त बिसर महान्ति ने जगन्नाथ का पवित्र 'ब्रह्म' तत्व बचा लिया, और 1575 में खुर्दा के रामचन्द्र देव प्रथम ने नए विग्रह प्रतिष्ठित किए। मादला पांजी में कुल अठारह आक्रमण दर्ज हैं, जिनके दौरान सेवक अक्सर विग्रहों को चिलिका के आसपास और पहाड़ों में छिपा देते थे। अठारहवीं शताब्दी में मराठा शासन में मन्दिर को फिर संरक्षण मिला; सिंहद्वार के सामने खड़ा अरुण स्तम्भ उसी काल में कोणार्क सूर्य मन्दिर से यहाँ लाया गया।

1803 में ओडिशा पर अंग्रेज़ों का अधिकार होने के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी ने मन्दिर का प्रबन्ध सँभाला और तीर्थयात्री कर जारी रखा; मिशनरियों के विरोध के बाद 1840 में यह कर समाप्त हुआ और प्रबन्ध खुर्दा (पुरी) के राजा के हाथ में गया। स्वतन्त्रता के बाद 'पुरी श्री जगन्नाथ मन्दिर (प्रशासन) अधिनियम, 1952' में सेवकों के अधिकार और कर्तव्य दर्ज किए गए, और 1960 से लागू 'श्री जगन्नाथ मन्दिर अधिनियम, 1955' ने मन्दिर को पुरी के गजपति महाराज की अध्यक्षता वाली प्रबन्ध समिति के अधीन किया। एसजेटीए के अनुसार 1975 में मन्दिर को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया और 1979 में इसका संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंपा गया।

हाल के वर्षों में जनवरी 2024 में मेघनाद पाचेरी के चारों ओर 75 मीटर चौड़ा 'श्री जगन्नाथ हेरिटेज कॉरिडोर' (श्रीमन्दिर परिक्रमा) खुला। 14 जुलाई 2024 को 1978 के बाद पहली बार भीतरी रत्न भण्डार को राज्य सरकार की समिति की देखरेख में मरम्मत और आभूषणों की सूची बनाने के लिए खोला गया।

पौराणिक कथा

पुराणों और ओड़िया परम्परा के अनुसार मालवा के राजा इन्द्रद्युम्न भगवान विष्णु के नील माधव रूप के दर्शन को व्याकुल थे — नीले पत्थर की वह प्रतिमा, जिसकी पूजा शबर मुखिया विश्वावसु वन में गुप्त रूप से करते थे। प्रतिमा के अन्तर्धान हो जाने पर भगवान ने राजा को स्वप्न में बताया कि वे पुरी के समुद्र में तैरते एक दारु (लकड़ी के लट्ठे) के रूप में आएँगे। राजा को वह दारु मिला, और स्कन्द पुराण के पुरुषोत्तम क्षेत्र माहात्म्य में उनके यज्ञ और भगवान के लिए बनवाए मन्दिर का वर्णन है।

कोई बढ़ई उस पवित्र लकड़ी को काट नहीं पाया, तब एक वृद्ध शिल्पी — विश्वकर्मा, या कई कथाओं में स्वयं भगवान विष्णु — विग्रह गढ़ने आए, इस शर्त पर कि काम पूरा होने तक कोई द्वार न खोले। कुछ दिन बाद भीतर से आवाज़ आनी बन्द हो गई, और चिन्तित रानी के आग्रह पर राजा ने द्वार खुलवा दिया। शिल्पी अदृश्य हो चुके थे, और जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह अधूरे हाथ-पैरों के साथ रह गए। आकाशवाणी हुई कि इन्हें इसी रूप में स्थापित किया जाए; श्रद्धालु मानते हैं कि बिना हाथों वाले प्रभु ही पूरे जगत को सँभाले हुए हैं।

शबर परम्परा से यह सम्बन्ध आज भी मन्दिर की पूजा में जीवित है। दइतापति सेवक, जिन्हें विश्वावसु के वंशज माना जाता है, अनसर और रथ यात्रा के समय विग्रहों की सेवा करते हैं और उन्हें झूमती 'पहण्डी' में ले जाते हैं। जिस वर्ष दो आषाढ़ मास पड़ते हैं, उस वर्ष नवकलेवर में वे विशेष चिह्नों वाले पवित्र नीम के वृक्ष खोजते हैं, नए विग्रह गढ़े जाते हैं और पुराने विग्रहों से 'ब्रह्म' तत्व गुप्त रूप से नए विग्रहों में स्थानान्तरित किया जाता है।

मन्दिर की रसोई से जुड़ी भी कई मान्यताएँ हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि स्वयं माता लक्ष्मी महाप्रसाद के बनने की देखरेख करती हैं, और भोग पहले जगन्नाथ को और फिर परिसर में शक्तिपीठ के रूप में पूजित माँ विमला को अर्पित होने के बाद ही महाप्रसाद बनता है। रथ यात्रा में पीछे छूटी माता लक्ष्मी हेरा पंचमी पर रूठकर रथ तक आती हैं; लौटने पर जगन्नाथ को उन्हें मनाना पड़ता है — परम्परा में रसगुल्ला भेंट करके — तब जाकर नीलाद्रि बिजे पर वे उन्हें भीतर आने देती हैं।

स्थापत्य कला

जगन्नाथ मन्दिर ओडिशा का सबसे ऊँचा मन्दिर और कलिंग शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह 37,000 वर्ग मीटर से अधिक में फैले परकोटे के बीच एक ऊँचे चबूतरे पर खड़ा है, जिसमें सौ से अधिक छोटे मन्दिर और देवस्थान हैं। बाहरी दीवार 'मेघनाद पाचेरी' लगभग 6 मीटर ऊँची है, और भीतरी दीवार 'कूर्म बेढ़ा' मुख्य मन्दिर को घेरती है। बाहरी दीवार में चार द्वार हैं — पूर्व में बड़ दाण्ड की ओर सिंहद्वार, और उत्तर, दक्षिण व पश्चिम में हाथी, व्याघ्र और अश्व द्वार।

एसजेटीए के अनुसार पूर्व-पश्चिम धुरी पर मन्दिर के चार मुख्य भाग हैं — विमान या बड़ देउळ (गर्भगृह), जगमोहन (सभा मण्डप), नाट मण्डप और भोग मण्डप। विमान पंचरथ योजना पर बना वक्र रेखा देउळ है, जो विकिपीडिया के अनुसार लगभग 65 मीटर ऊँचा है; जगमोहन सीढ़ीदार पिरामिडनुमा छतों वाला पीढ़ा देउळ है। बाहरी दीवारों पर हाथियों, घोड़ों और योद्धाओं की पट्टियाँ, लघु मन्दिर, सुन्दर नारी आकृतियाँ और विष्णु के चौबीस रूप उकेरे गए हैं, और मुख्य आलों में क्लोराइट पत्थर की वराह, त्रिविक्रम और नृसिंह प्रतिमाएँ हैं।

शिखर पर अष्टधातु से बना, लगभग 3.5 मीटर ऊँचा, आठ अरों वाला नील चक्र है, जिस पर प्रतिदिन 'पतित पावन' ध्वजा बदली जाती है। गर्भगृह में विग्रह रत्न सिंहासन पर विराजते हैं। सिंहद्वार के सामने सोलह पहलुओं वाला एकाश्म अरुण स्तम्भ खड़ा है, और 22 सीढ़ियों वाली 'बाईसी पहाच' मन्दिर तक ले जाती है। परिसर में विमला मन्दिर, लक्ष्मी मन्दिर, विद्वान ब्राह्मणों की सभा का मुक्ति मण्डप और विशाल रसोई (रोषघर) भी है, जहाँ लकड़ी की आग पर मिट्टी के बर्तनों में महाप्रसाद पकता है।

दैनिक पूजा-अर्चना

  • द्वारफिटा और मंगल आरती

    कपाट लगभग सुबह 4:30–5:00; मंगल आरती लगभग 5:30

    भोर से पहले मन्दिर के द्वार खोले जाते हैं (द्वारफिटा) और दिन का पहला दीप-अर्पण, मंगल आरती, होता है। एसजेटीए के अनुसार हर नीति को निर्धारित समय पर ठीक-ठीक करना सामान्यतः सम्भव नहीं होता।

  • मैलम, अबकाश और बेश

    लगभग सुबह 6:00–7:00

    पिछली रात के वस्त्र और फूल उतारे जाते हैं (मैलम), विग्रहों की सफ़ाई और प्रतीकात्मक स्नान (अबकाश) होता है, और दिन के लिए नए वस्त्र व फूलों के आभूषण पहनाए जाते हैं। इसके बाद सूर्य पूजा और द्वारपाल पूजा होती है।

  • गोपाल वल्लभ भोग और सकाल धूप

    लगभग सुबह 8:30 और 9:00–10:00

    मिठाई, दही, नारियल और फलों का जलपान भोग (गोपाल वल्लभ) अर्पित होता है, फिर सुबह का भोग 'सकाल धूप', जिसमें एंडुरी पीठा जैसे पारम्परिक व्यंजन होते हैं।

  • भोग मण्डप और मध्याह्न धूप

    लगभग सुबह 11:30 से

    भोग मण्डप में तीर्थयात्रियों और मठों के लिए बड़ा भोग चढ़ता है, फिर दोपहर का भोग। अर्पित भोजन महाप्रसाद बन जाता है, जो परिसर के आनन्द बाज़ार में मिलता है।

  • सन्ध्या आरती और सन्ध्या धूप

    लगभग शाम 6:00; धूप 6:30–8:00

    सायंकालीन दीप-अर्पण के बाद शाम का भोग चढ़ता है। इसके बाद विग्रहों पर चन्दन का लेप (चन्दन लागि) होता है।

  • बड़ सिंहार बेश और पहुड़

    लगभग रात 9:00–11:30

    रात के लिए विग्रहों को फूलों के आभूषण और रेशमी वस्त्र पहनाए जाते हैं (बड़ सिंहार बेश) और दिन का अन्तिम भोग चढ़ता है। शय्या बिछाने (खटसेज लागि) के बाद एसजेटीए के अनुसार लगभग 11:30 बजे प्रभु के विश्राम (पहुड़) के लिए द्वार बन्द होते हैं।

समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।

पर्व-उत्सव

अक्षय तृतीया, वैशाख (अप्रैल–मई)

चन्दन यात्रा

21-21 दिनों के दो चरणों में 42 दिन चलने वाला उत्सव, जिसमें विग्रहों की प्रतिनिधि मूर्तियाँ सजी नावों में नरेन्द्र सरोवर में विहार करती हैं। अक्षय तृतीया से ही रथ यात्रा के रथों का निर्माण शुरू होता है।

ज्येष्ठ पूर्णिमा (जून)

स्नान यात्रा और अनसर

विग्रहों को बाहर लाकर 108 घड़ों के जल से स्नान कराया जाता है और गजानन बेश पहनाया जाता है। मान्यता है कि इसके बाद वे अस्वस्थ हो जाते हैं और लगभग दो सप्ताह अनसर में एकान्त में रहते हैं, जहाँ केवल दइतापति सेवक उनकी सेवा करते हैं; इस बीच श्रद्धालु ब्रह्मगिरि में आलारनाथ के दर्शन करते हैं।

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया (जून–जुलाई)

रथ यात्रा

जगन्नाथ (नन्दिघोष), बलभद्र (तालध्वज) और सुभद्रा (दर्पदलन) हर साल नए बनने वाले तीन विशाल रथों पर बड़ दाण्ड पर लगभग 3 किलोमीटर दूर गुण्डिचा मन्दिर जाते हैं। 'छेरा पहँरा' में गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथ बुहारते हैं। बाहुड़ा यात्रा में लौटकर रथों पर सुना बेश (स्वर्ण श्रृंगार) और अधर पणा होता है, और नीलाद्रि बिजे पर विग्रह मन्दिर में लौटते हैं।

फाल्गुन पूर्णिमा (फ़रवरी–मार्च)

दोल यात्रा (दोल पूर्णिमा)

श्रीदेवी और भूदेवी के साथ दोलगोविन्द को दोल वेदी पर ले जाकर झूले पर विराजमान किया जाता है और सबको दर्शन होते हैं — यह पुरी की होली है।

अधिक आषाढ़ वाले वर्ष में (लगभग 12–19 वर्ष में एक बार)

नवकलेवर

'नए शरीर' का अनुष्ठान, जिसमें पवित्र नीम के वृक्षों से नए विग्रह गढ़े जाते हैं और पुराने विग्रह कोइली वैकुण्ठ में समाधिस्थ किए जाते हैं। पिछला नवकलेवर 2015 में हुआ था, जिसमें लाखों श्रद्धालु आए।

कैसे पहुँचें

हवाई मार्ग
निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर का बीजू पटनायक अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो पुरी से लगभग 60 किलोमीटर (सड़क से करीब डेढ़ घण्टा) दूर है और देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा है।
रेल मार्ग
पूर्व तट रेलवे का टर्मिनस पुरी रेलवे स्टेशन मन्दिर से लगभग 2–3 किलोमीटर दूर है, और यहाँ कोलकाता, दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई आदि से सीधी ट्रेनें आती हैं। भुवनेश्वर और खुर्दा रोड जंक्शन भी विकल्प हैं।
सड़क मार्ग
पुरी भुवनेश्वर से लगभग 60 किलोमीटर और कोणार्क से 35 किलोमीटर दूर है, और अच्छे राजमार्गों पर लगातार बसें व टैक्सियाँ चलती हैं। मन्दिर के पास, ख़ासकर त्योहारों में, वाहनों का प्रवेश सीमित रहता है; बड़ दाण्ड पर पैदल चलकर सिंहद्वार पहुँचें।
दर्शन का सबसे अच्छा समय
अक्टूबर से मार्च सबसे आरामदायक समय है, जब समुद्र किनारे मौसम ठण्डा रहता है। रथ यात्रा (जून–जुलाई) पुरी आने का सबसे भव्य अवसर है, पर तब भीड़ बहुत अधिक होती है और ठहरने की बुकिंग महीनों पहले करनी पड़ती है। अप्रैल–जून में गर्मी और उमस रहती है, और मानसून (जुलाई–सितम्बर) में भारी बारिश होती है।

तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव

  • मन्दिर में केवल हिन्दुओं को प्रवेश की अनुमति है; अन्य धर्मों के लोग बाहर से या हेरिटेज कॉरिडोर से नील चक्र और शिखर के दर्शन कर सकते हैं।
  • मोबाइल फ़ोन, कैमरा, चमड़े की वस्तुएँ, छाता और जूते-चप्पल अन्दर ले जाना मना है; द्वारों के पास निःशुल्क जमा काउंटर का उपयोग करें।
  • एसजेटीए की सलाह के अनुसार स्नान करके साफ़, शालीन वस्त्र पहनकर ही प्रवेश करें; भीतर शान्ति रखें और दर्शन के लिए कतार व्यवस्था का पालन करें।
  • आनन्द बाज़ार में महाप्रसाद ग्रहण करें, और परिसर में विमला तथा लक्ष्मी मन्दिर के दर्शन भी करें।
  • एसजेटीए की चेतावनी के अनुसार भीड़ में जेबकतरों और बन्दरों से सावधान रहें।
  • यात्रा में गुण्डिचा मन्दिर, गोवर्धन मठ, स्वर्गद्वार तट और कोणार्क सूर्य मन्दिर को भी शामिल करें।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

पुरी के जगन्नाथ मन्दिर की कथा क्या है?

परम्परा के अनुसार भगवान विष्णु ने राजा इन्द्रद्युम्न को पुरी के समुद्र में तैरते एक पवित्र दारु तक पहुँचाया। एक रहस्यमय शिल्पी ने इस शर्त पर विग्रह गढ़े कि उन्हें बीच में न टोका जाए, पर द्वार समय से पहले खुल गया और जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह अधूरे हाथों के साथ रह गए। आकाशवाणी ने राजा से इन्हें इसी रूप में पूजने को कहा।

पुरी का जगन्नाथ मन्दिर किसने बनवाया?

एसजेटीए और इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान मन्दिर पूर्वी गंग वंश के राजा अनन्तवर्मन चोडगंग देव ने बारहवीं शताब्दी के आरम्भ में बनवाना शुरू किया, और अनंगभीम देव तृतीय ने इसे पूरा कर 1230 में विग्रहों की प्रतिष्ठा की। इससे पहले भी पुरी में पुरुषोत्तम का मन्दिर था।

जगन्नाथ मन्दिर पुरी के दर्शन का समय क्या है?

द्वार भोर से पहले, लगभग 4:30–5 बजे खुलते हैं, लगभग 5:30 बजे मंगल आरती होती है, और रात लगभग 11:30 बजे पहुड़ के बाद बन्द होते हैं। भोग के समय दर्शन रुकते हैं और त्योहारों पर समय बदल जाता है, इसलिए एसजेटीए का 'Today in the Temple' पेज देख लें।

क्या ग़ैर-हिन्दू जगन्नाथ मन्दिर में जा सकते हैं?

नहीं। जगन्नाथ मन्दिर में प्रवेश केवल हिन्दुओं के लिए है। अन्य धर्मों के लोग मन्दिर, शिखर और नील चक्र को बाहर से देख सकते हैं, और रथ यात्रा में बड़ दाण्ड पर दर्शन कर सकते हैं, जब प्रभु सबके लिए बाहर आते हैं।

पुरी की रथ यात्रा कब होती है?

रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को, प्रायः जून या जुलाई में होती है। विग्रह गुण्डिचा मन्दिर जाते हैं और लगभग नौ दिन बाद बाहुड़ा यात्रा में लौटते हैं।

स्रोत

चार धाम